‘पुरस्कार लौटाकर खामोशी तोड़ने की कोशिश’

आप देखेंगे कि साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी, एफटीआईआई आदि संस्थाएं आजादी के बाद बनाई गई थीं. लंबे प्रयास के बाद इनमें एक परंपरा कायम हुई. जवाहर लाल नेहरू प्रधानमंत्री के रूप में ऐसे शख्स थे, जिनके देश में और विदेश में तमाम लेखकों कलाकारों से निजी रिश्ते थे. वे कला और साहित्य के महत्व और सरोकार समझते थे. अब इन संस्थाओं में चुन-चुन कर ऐसे लोगों को बिठाया जा रहा है, जो इसे नष्ट कर दें. शिक्षा, इतिहास, कला, साहित्य के संस्थानों को मिटाने का बाकायदा अभियान चलाया जा रहा है. पिछले सालों में वेंडी डोनिगर समेत कई लेखकों की किताबें प्रतिबंधित करना और लेखकों को प्रताड़ित करना इसी अभियान का हिस्सा था. हालत यह है कि आज यदि कोई लेखक प्रचलित धारणाओं और विचारों के खिलाफ अपने विचार व्यक्त करता है, तो उस पर हमले किए जाएंगे, उसकी किताबें जलाई जाएंगी और उसे देशद्रोही घोषित किया जाएगा. मशहूर लेखक यूआर अनंतमूर्ति ने चुनावों से पहले प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी को लेकर अपनी नापसंदगी जाहिर कर दी तो उनके खिलाफ पब्लिक ट्रायल किया गया, उन्हें अपमानित किया गया. उनके साथ ऐसा व्यवहार हुआ जैसे वे गंभीर किस्म के अपराधी हैं, उन्हें पाकिस्तान भेज दिए जाने की धमकी दी गई. यह सब बेहद स्तब्ध करने वाला है.

जो चीजें अभी तक इस समाज की अच्छाइयां थी, उनका मजाक बनाया जा रहा है. बौद्धिकता को हाशिये पर किया जा रहा है. धर्मनिरपेक्ष, वामपंथ, समाजवाद, लोकतंत्र आदि शब्द गाली की तरह इस्तेमाल किए जा रहे हैं. यानी नेहरू की विरासत पर व्यवस्थित तरीके से हमले हो रहे हैं. इस देश की लोकतांत्रिक परंपरा पर ऐसे हमले कभी नहीं हुए. राम मनोहर लोहिया नेहरू के आलोचक थे, पर वे इस तरह के हमले के बारे में सोच नहीं सकते थे. अटल बिहारी वाजपेयी ने भी नेहरू को लेकर ऐसे हमले कभी नहीं किए. उनके समय में यह भाषा भी नहीं इस्तेमाल हुई थी जो आजकल विरोधियों या आलोचकों के लिए इस्तेमाल हो रही है.

एक देश के रूप में भारत में ऐसा कभी नहीं था कि लोकतांत्रिक मूल्यों को हतोत्साहित किया जाए. भारत हमेशा से विचारों के लिए एक लोकतांत्रिक स्पेस आजादी कराने वाला देश रहा है. हमने उन लेखकों को भी प्रश्रय दिया जो अपने देशों से बाहर किए गए. तस्लीमा नसरीन और सलमान रुश्दी जैसे लेखकों को यहां जगह दी गई और उनके अभिव्यक्ति के अधिकार और विचारों की रक्षा की गई.

एक समय था जब हमारे लेखकों का सम्मान होता था, उनकी एक गरिमा थी. लेकिन आज अगर आप राजनीतिक, सांस्कृतिक या सामाजिक मसलों पर तार्किक आलोचना करते हैं, तो लोग उसे बर्दाश्त नहीं करते. वे हिंसात्मक होकर आपको प्रताड़ित करते हैं. हर चीज का सांप्रदायिकरण हो रहा है, कला जगत भी इससे अछूता नहीं है. अब हालात पाकिस्तान या बांग्लादेश जैसे हो चुके हैं. बांग्लादेश में भी कट्टरपंथियों द्वारा लेखकों की हत्या कर दी जाती है.

इस सांस्कृतिक-सामाजिक पतन के लिए मौजूदा सरकार जिम्मेदार है. नेतृत्व की ओर से लोगों को कोई ऐसा संदेश नहीं दिया जा रहा है कि वे सहिष्णु हो सकें. हर घटना पर, हर चीज पर बोलने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हालिया घटनाओं पर मौन हैं, चाहे वह लेखकों की हत्या का मामला हो या फिर दादरी में घटी जघन्य घटना. अपराधियों को सुरक्षा देने वाले देश में लेखकों की हालत यह  है कि कोई भी आकर उन्हें मार सकता है. लेखक अकेलेपन में जी रहा है.

रवींद्र नाथ टैगोर ने कहा था, ‘हम मानवता का महासागर हैं.’ हमारे पास एक महान विरासत है. तमाम भाषाएं, संस्कृतियां हैं, लोगों की अपनी आदतें और पसंद-नापसंद है. हम इन सब विभिन्नताओं के बावजूद एक साथ रहते हैं. इस सहिष्णुता के कारण ही हमारे पास महान विरासत है. अब उसी सहिष्णुता पर हमले किए जा रहे हैं. हालांकि, इन सबके बावजूद, मेरा अब तक यह विश्वास है कि भारत की जनता असहिष्णुता बर्दाश्त नहीं करेगी. वह उन प्रवृत्तियों को नकार देगी, जो हमारी परंपरा को चोट पहुंचाती हैं.

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

2 COMMENTS

  1. अपने समय की सत्ता और शासन प्रतिष्ठान से सीधे सीधे लोहा लेने और टकराने की क्षमता के रखने वाले उदय प्रकाश जी ने इस बार फिर साहित्य अकादमी पुरस्कार वापस करे एक नई पहल की। हिन्दी साहित्येतिहास की यह एक अभूतपूर्व और अश्रुतपूर्व घटना है । यह अलग बात है कि अब हिन्दी और अन्य भाषाओं के lलेखकों ने भी उनका अनुसरण किया , किन्तु शुरुआत मे तो उनका तो विरोध हुआ ही है , हम जैसे उनके छोटे प्रशंसकों को प्रताड़ित किया गया और छींटाकशी कि गई । खैर उदय सर के इस जज्बे को सलाम……..

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