ग्राम स्वराज का काला सच | Tehelka Hindi

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ग्राम स्वराज का काला सच

उत्तर प्रदेश के हालिया पंचायत चुनावों में हुए भ्रष्टाचार और हिंसा ने यह सवाल खड़ा किया है कि आखिर गांधी के सपनों को आधार बनाकर शुरू किया गया सत्ता के विकेंद्रीकरण का लक्ष्य समाज के विभाजन का कारण व भ्रष्टाचार का अड्डा तो नहीं बनता जा रहा है

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पत्नी के चुनाव हारने पर पति ने किया मर्डर, प्रत्याशी की गोली मार कर हत्या, भाई के हारने पर ताऊ को मार डाला, प्रत्याशी के भतीजे को मारी गोली, प्रधानी का चुनाव हारने पर समर्थक को मारी गोली. ये उत्तर प्रदेश में पंचायत और स्थानीय निकाय के चुनाव नतीजे आने के पहले और बाद अखबारों में रोजाना आई चंद सुर्खियां हैं. वैसे भी राज्य में पंचायत चुनावों के नतीजे भले आ गए हों लेकिन हिंसा की घटनाओं में कोई कमी नहीं दिख रही. बीते दिनों मिर्जापुर जिले में चुनाव जीतने वाली एक महिला की नाबालिग बेटी से सामूहिक दुष्कर्म करने का मामला सामने आया है. महिला के विरोधियों की प्रताड़ना से तंग आकर उस लड़की ने खुदकुशी कर ली. राज्य में चुनाव परिणाम आने के बाद हुई हिंसा में अब तक ​करीब दो दर्जन लोगों की मौत हो चुकी है और 50 से ज्यादा लोग घायल हैं.

पंचायत चुनाव में हुई भारी हिंसा यह बात सोचने पर मजबूर कर रही है कि आखिर गांधी के सपनों को आधार बनाकर शुरू किया गया सत्ता के विकेंद्रीकरण का लक्ष्य कहीं अपने उद्देश्य से भटक तो नहीं गया है. इस पर वरिष्ठ चिंतक बद्री नारायण कहते हैं, ‘जब पंचायती राज कानून बना था, तो इसकी मूल आत्मा इस उम्मीद पर केंद्रित थी कि इस कानून के जरिये सत्ता का विस्तार कमजोर और निर्बल तबकों तक होगा. लोकतंत्र में निर्बल लोगों की सहभागिता बढ़ेगी. लेकिन अभी जो दिखाई दे रहा है, उससे लगता है कि ग्रामीण क्षेत्र के शक्तिवान और अभिजात्य लोगों ने सत्ता-विस्तार की इस प्रक्रिया को भी अपने कब्जे में कर लिया है. मंत्रियों, सरकारी अधिकारियों और शक्तिवानों का जो तबका सत्ता-संस्थानों में शीर्ष पर काबिज है, वही आधार तल पर सत्ता के प्रसार की प्रक्रिया व उसके संसाधनों को भी अपने कब्जे में लेने की कोशिश में जुट गया है. बेशक इससे ‘ग्राम स्वशासन’ या ‘स्थानीय स्वराज’ की मूल भावनाओं पर प्रश्नचिह्न लग गया है, पर हकीकत यही है. यह देखने में आ रहा है कि भारतीय समाज में लोकतंत्र के प्रसार के साथ हिंसा और भ्रष्टाचार की प्रवृत्तियों में भी इजाफा हो रहा है. सत्ता का विकेंद्रीकरण तो हो रहा है, लेकिन इसके साथ भ्रष्टाचार का भी विकेंद्रीकरण और फैलाव हो रहा है. हिंसा की बढ़ती घटनाएं तात्कालिक रूप से ​तो समाज के लिए विभाजनकारी हैं, लेकिन मुझे लगता है लंबे समय में यह फलदायी होंगी. क्योंकि लोग अब धीरे-धीरे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रहे हैं. धीरे-धीरे चुनावों में हिंसा अप्रासंगिक हो जाएगी.’ हालांकि यह एक पक्ष है. चुनाव में हिंसा और अपराध की घटनाओं का बढ़ना समाज में बढ़ती हिंसा को परिलक्षित कर रहा है. अब पंचायत चुनावों में विधायक और सांसदों के चुनाव की तरह बढ़े पैमाने पर पैसा खर्च किया जा रहा है. चुनाव की पूरी प्रक्रिया का खर्चीला होना भी हिंसा के बढ़ने का एक कारण है.

वरिष्ठ पत्रकार शीतला प्रसाद सिंह कहते हैं, ‘हमारे समाज अपराध का बोलबाला में बढ़ रहा है. घर, परिवार में हिंसा की घटनाएं बढ़ रही हैं. यही पंचायत और स्थानीय निकायों के चुनावों में दिख रहा है. इसके अलावा हमारा आर्थिक विकास का ढांचा ऐसा है, जिससे अपराध को बढ़ावा मिलता है. अब देखिए प्रधान पद के लिए चुनाव खर्च की सीमा 75 हजार रुपये थी, लेकिन मेरी जानकारी में आया है कि लोगों ने 5 से 10 लाख रुपये तक खर्च किए हैं. अब अगर चुनाव में इतना पैसा लगाया जाएगा तो निश्चित ही अपराध को भी बढ़ावा मिलेगा.’ ​

‘इस बार के चुनाव ने हमें यह भी बताया है कि जनतंत्र ताकत व साधनों के प्रसारण की प्रक्रिया के साथ भ्रष्टाचार और हिंसा का प्रसार भी करता है’

कुछ ऐसा ही मानना वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक चिंतक अरुण कुमार त्रिपाठी का है. वे कहते हैं, ‘राजनीतिशास्त्र अपराधशास्त्र की ही एक शाखा है. मध्यवर्ग ने अपनी सुविधा के हिसाब से उसे बहुत गौरवपूर्ण बनाने की कोशिश की है. तरह-तरह के आदर्श जोड़े और संस्थाएं बनाई. इसके बावजूद आज भी राजनीतिशास्त्र की जो कार्यप्रणाली है उसमें अपराध अंतर्निहित है. यह बहुत ही दुखद बात है. इन चुनावों में हिंसा जाति, धर्म आदि कई रूपों में देखने को मिल रही है. सबसे खराब बात यह है कि इसे रोकने के लिए न तो किसी के पास कोई विचार है, न ही संस्था के स्तर पर ही कोई प्रयास किया जा रहा है.’ हालांकि चुनाव में आवश्यकता से अधिक खर्च करने की बात आम तौर पर होती है, लेकिन जब इस बारे में इलाहाबाद के असिस्टेंट डिस्ट्रिक्ट इलेक्शन ऑफिसर दिनेश कुमार तिवारी से बात की तो उन्होंने बताया कि इस पूरे पंचायत चुनाव के दौरान जिले में उन्हें तय सीमा से अधिक खर्च की कोई शिकायत नहीं आई. इसलिए इसपर उन्होंने कोई कदम नहीं उठाया.

वैसे अगर देखा जाए तो पंचायती राज संस्थाओं के गठन के पीछे का मूल उद्देश्य सुदूरवर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तक विकास योजनाओं को पहुंचाना था. महात्मा गांधी ने कहा था, ‘सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए बीस व्यक्ति नहीं चला सकते, वो तो नीचे हर गांव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए. सत्ता के केंद्र बिंदु जो अभी दिल्ली, कलकत्ता या बंबई जैसे बड़े शहरों में है, मैं उसे भारत के सात लाख गांवों में बांटना चाहूंगा.’ इसी को ध्यान में रखते हुए ग्राम पंचायतों को पंचायती राज कानून ने महत्वपूर्ण वित्तीय शक्तियां दी हैं. 73वें संविधान संशोधन के बाद पंचायती राज की विकेंद्रित व्यवस्था में ग्राम पंचायतों के पास अनेक कार्य आ गए हैं. इनमें पंचायती राज के अलावा सर्व शिक्षा अभियान, मिड डे मील, साफ सफाई, हैंडपंपों का रखरखाव, वृद्धावस्था, विधवा, गरीब पेंशन, छात्रवृत्ति वितरण, राशन कार्ड तथा अन्य अनेक योजनाओं के लाभार्थियों का चयन एवं क्रियान्वयन शामिल है. इसके अलावा गांव में सड़क, खड़ंजा, नाली बनवाने का काम भी प्रधान के जिम्मे है. इन सबके इतर मनरेगा के तहत कराए जा रहे कार्य भी प्रधान पद के दायित्वों के अंतर्गत आते हैं.

सरकार अपने संसाधनों के एक महत्वपूर्ण भाग का वितरण आधार तल पर पंचायत प्रधानों के माध्यम से करती है. छोटी से छोटी ग्राम सभा में भी पांच साल में खर्च करने के लिए न्यूनतम 20 लाख रुपये आते हैं. बड़ी ग्राम सभाओं में यह राशि 50 लाख रुपये तक भी हो जाती है. यह पैसा प्रधान के खाते में सीधे आता है. इस कारण लोकतंत्र की संभावना के साथ भ्रष्टाचार की नई आशंका भी जन्म लेती है. इसीलिए ग्राम पंचायतों के चुनाव में न सिर्फ गलाकाट स्पर्धा दिखने लगी है, बल्कि यह लगातार बढ़ भी रही है. बद्री नारायण कहते हैं, ‘सत्ता से आने वाले इस धन को हड़पने की बढ़ती होड़ ने इस बार पंचायत चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंसा को जन्म दिया है. हत्या, अपहरण, धमकी, बूथ कब्जा अनेक तरह से शक्तियों के विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया का अपहरण कर लिया गया है. हमारे यहां राज्य और जनतंत्र के प्रसार का इतिहास हमें बताता है कि भ्रष्टाचार और हिंसा का चोली दामन का संबंध है. इस चुनाव ने हमें यह भी बताया है कि जनतंत्र अपने साथ ताकत व साधनों के प्रसारण की प्रक्रिया के साथ भ्रष्टाचार और हिंसा का प्रसार भी करता है. यहां एक नैतिक प्रश्न भी खड़ा होता है कि जो लोग जनता के इस धन पर बुरी नजर के साथ ही चुनाव में आ रहे हैं, वे इसका सही इस्तेमाल करेंगे कैसे? मांस वितरण करने के लिए अगर गिद्ध को दे दिया जाए तो क्या वह लोगों तक पहुंच पाएगा? गिद्ध मांस को खुद ही खा जाएगा. संभव है इन चुने गए पंचायत प्रधानों का एक वर्ग विकास को जमीन तक ले जाना चाहता हो, लेकिन फिर भी यह शंका बनी हुई है कि जनतंत्र के प्रसार की इस प्रक्रिया में हम अब तक कितना जनतांत्रिक बन पाए हैं.’

हालांकि इस दौरान सबसे खराब बात यह रही कि सामाजिक रूप से हिंसा और भ्रष्टाचार को स्वीकृति मिल गई. गांवों में इसे लेकर कोई विरोध नहीं रहा, जो लोग चुनाव लड़ रहे थे वे खुलेआम पैसा बांटने से लेकर दूसरे अनैतिक कामों में लगे रहे. अरुण त्रिपाठी कहते हैं, ‘चुनावों के दौरान पूरे समाज का भ्रष्ट हो जाना बहुत खतरनाक है. पंचायत चुनावों में खूब पैसा खर्च किया गया है. खिलाना-पिलाना, दारू-मुर्गा जैसी बातें अब सामान्य हो गई है. खुले तौर पर मतदाताओं को खरीदने की होड़ मची हुई थी. पता चलता था कि एक मतदाता को किसी प्रत्याशी ने हजार रुपये दिए, तो दूसरे ने आकर दो हजार रुपये दिए. सबसे दुखद यह रहा कि मतदाता ने आखिर में वोट उसे दिया जिसने ज्यादा पैसे दिए. मतदाताओं ने अपनी प्राथमिकता में प्रत्याशी के चरित्र, उसकी पढ़ाई-लिखाई, उसके सामाजिक जीवन, उसकी सोच को रखा ही नहीं. वह सिर्फ आखिरी समय में प्रत्याशी द्वारा खर्च किए गए पैसे पर सिमटे रहे. इसके चलते पंचायत को बनाने की असली मंशा पर सवाल उठ रहे हैं.’ पंचायत चुनाव जीतकर आए लोगों की कुल संपत्ति पर गौर किया जाए तो यह बात भी समझ आती है. उप्र चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार नवनिर्वाचित ग्राम प्रधानों में से 78 फीसदी लखपति हैं. इनके पास पांच लाख से अधिक की चल या अचल संपत्ति है.

पंचायत चुनावों में 44 प्रतिशत महिला उम्मीदवारों ने जीत हासिल की है. एकबारगी इस आंकड़े को देखकर राहत महसूस होती हैं, लेकिन अगर गौर से देखें तो यह कहानी दूसरी ही नजर आती हैं. प्रदेश में प्रधान पति, प्रधान पुत्र जैसे कई नए पद सृजित हो गए हैं. इसकी बानगी चुनाव प्रचार के लिए चौक-चौराहों पर चिपके पोस्टरों में ही दिख जाती है. पोस्टरों में महिला उम्मीदवारों की तस्वीर की जगह उनके पति, पिता, ससुर, बेटों की तस्वीरें लगाई गई थीं. अगर कुछ पोस्टरों में महिलाओं की तस्वीरें लगी भी थीं तो वो घर के पुरुष मुखिया की फोटो के बाद ही लगी थी. यहां तक कि पोस्टरों में दिए गए मोबाइल नंबर भी घर के पुरुषों के थे. यही हाल तब भी दिखा जब महिलाएं जीत कर आईं. जीतीं तो महिलाएं लेकिन फूलमाला पतियों के गले में डाली गई. बधाई भी उन्हें ही दी गई. महिलाएं उनके बगल कठपुतली बनकर खड़ी दिखाई दे रही थीं. ये बातें संदेह पैदा करती हैं कि इन 44 प्रतिशत महिलाओं में कितनी महिलाएं वास्तविकता में अपने गांव की सरकार चला पाएंगी?

बद्री नारायण कहते हैं, ‘देशभर के स्थानीय निकायों के चुनावों में महिलाएं बड़ी तादाद में चुनी जा रही हैं जो अच्छा संकेत है. इस बार उत्तर प्रदेश में प्रधानी का पर्चा भरने वाली महिलाओं का प्रतिशत 44.79 था, जिसमें 43.86 प्रतिशत ने चुनाव जीता. यानी 33 प्रतिशत महिला सुरक्षित क्षेत्र के अतिरिक्त महिलाओं ने 10 प्रतिशत पुरुष या सामान्य क्षेत्र में भी जीत हासिल की है. इतना ही नहीं, मुस्लिम बहुल जिलों में भी मुस्लिम महिलाओं ने पंचायत चुनाव में शिरकत कर जीत हासिल की है.

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भारतीय समाज विशेषकर उत्तर भारतीय समाज में परिवार की बुनावट ऐसी है, जिसमें महिलाओं की निर्णय क्षमता पर अभी पुरुष प्रभावी हैं. देखना यह है कि ये महिलाएं कैसे अपने पतियों को प्रधान पति बनने से रोक पाती हैं. परिवार के पिता, भाई, पति से संबंध रखते हुए भी खुद निर्णय लेकर विकास नीचे तक पहुंचा पाती हैं. राज्य की नौकरशाही, भ्रष्टाचार से जूझते तंत्र, कानूनी दांवपेंच वगैरह से भी उलझते हुए महिलाओं को अपनी क्षमता साबित करनी होगी. इन शंकाओं और समस्याओं के बावजूद यह आधी आबादी, अगर आधे जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी कर पाती है तो भारतीय जनतंत्र का भविष्य संभावनाओं से भरा होगा.’

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