होना ही जिनका अपराध है

4 मार्च, 2010 को रमादेवी संध्या को घर पर अकेला छोड़ अपने पति के साथ मजदूरी करने खेत पर गई थीं. लगभग शाम चार बजे, संध्या घर के पीछे वाले कमरे में खटिया पर आराम कर रही थी. तभी आंगन की दीवार फांद कर चार लोग उसके घर में घुस आए और उसके साथ बलात्कार का प्रयास किया. ‘पहले तो उन्होंने मेरी लड़की के साथ जबरजस्ती करी और जब उसने विरोध किया तो उसे हमारे ही घर के एक स्टूल पर बैठा दिया. दो लोगों ने उसे पकड़ा, तीसरे ने मिट्टी का तेल डाला और चौथे ने माचिस से उसे जला दिया. संध्या ने चिल्ला चिल्लाकर चारों के नाम सबको बताए. उसने कहा था कि उसे दीपक, रमाकांत, अशोक और हीरालाल ने जला दिया. पर फिर भी सबको छोड़ दिया साहेब.’ दर्द भरी आवाज में रमादेवी बताती हैं. दीपक के अलावा बाकी तीनों आरोपित भी चंद्रपाल नायक के ही रिश्तेदार हैं. घटना की खबर मिलते ही संध्या के माता-पिता उसे छतरपुर जिला अस्पताल ले गए. वहां तहसीलदार, टाउन इंस्पेक्टर और डॉक्टरों ने उसके बयान लिए. संध्या ने अपने मृत्यु पूर्व बयान में चारों अभियुक्तों के नाम लेकर दस्तखत भी किए थे.

छतरपुर जिला अदालत ने दीपक,अशोक और हीरालाल को ‘संदेह का लाभ’ देते हुए बरी कर दिया जबकि चौथा आरोपित रमाकांत आज तक फरार है. असल में संध्या के बयान में जिला अस्पताल के डॉक्टर ने यह टीप नहीं लगाई थी कि संध्या बयान देने के लिए मानसिक रूप से स्वस्थ है या नहीं. इसलिए कोर्ट ने उसे वैध मानने से इनकार कर दिया. रमादेवी के अनुसार पुलिस और डॉक्टरों ने उनकी बेटी के बयान को गंभीरता से लिया ही नहीं. ‘वो सब वहीं खड़े थे और मेरी लड़की चिल्ला-चिल्ला के कह रही थी कि उसे किसने जलाया. पर न तो पुलिस ने ध्यान दिया और न डाक्टरों ने. सब पैसे का कमाल है. हमारे गवाह भी अदालत में पेश नहीं होने दिए गए. सिर्फ उन्हीं के गवाह आए. वो बहुत पैसे वाले लोग है इसलिए डाक्टर, पुलिस , वकील…सब उन्ही के हाथ में है.’ एडिशनल सेशन जज पीके शर्मा का निर्णय पढ़ने पर मालूम होता है कि पुलिस ने जांच और उसके दस्तावेजीकरण में कई गलतियां कीं, जैसे मृत्युपूर्व बयान जैसे निर्णायक सबूत को सावधानी से नहीं बनवाना. डॉक्टरों के पक्ष की भी कई विरोधाभासी बातें इस निर्णय से पता चलती हैं. अस्पताल प्रभारी डॉक्टर लखन तिवारी ने संध्या का कथन लेते समय उसकी मानसिक स्थिति पर नोट नहीं लगाया था. इसी वजह से कोर्ट में विरोधी पक्ष ने यह साबित कर दिया कि संध्या सौ प्रतिशत जल चुकी थी और ‘डेलेरियम’ की स्थिति में थी. इस स्थिति में रक्त का सीरम जलकर बाहर आ जाता है और दिमाग तक ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती. ऐसे में मरीज अपने पूरे होश में नहीं रहता. इसीलिए ऐसी मानसिक अवस्था में दिए गए बयान को मान्य नहीं किया जा सकता.

अदालत से अपनी बेटी को न्याय न दिलवा पाने के बाद, अब रमादेवी की निराशा की कोई सीमा नहीं है. ‘पहले उसे जला दिया और फिर उसके बयान को इसलिए नहीं माना, क्यूंकि वह जल चुकी थी? यह कहां का इंसाफ हुआ. जिसने हमारी बेटी को मारा, वो हमारे सामने ही रहता है. हम गरीब लोग क्या कर सकते हैं? दूसरे बच्चों के लिए भी डर लगता है की कहीं उन्हें भी न मार डालें ये लोग’ निराशा और दुख में डूबी रमादेवी तहलका को बताती हैं.

उधर गांव वाले उनके परिवार का हुक्का पानी बंद करने की धमकी देते हैं. ‘वो कहते हैं कि हम पर हत्या लग गई है. जब तक अपनी बेटी के नाम पर सारे गांव को खाना नहीं खिलाएंगे, हम उनके साथ उठ-बैठ नहीं सकते.’ अदालत की पेचीदगियां रमादेवी की समझ से परे हैं. मगर वे यह नहीं समझ पा रही हैं कि आखिर कैसे उनकी बेटी को जलाने वाले बाहर घूम रहे हैं और वे पीड़ित होकर भी समाज से बहिष्कृत हैं.

03 : ‘पूरा गांव राजीनामा करवाने पर जोर दे रहा है’

करीब छह महीने पहले तक दमोह की नोहाटा तहसील स्थित मुग्दापुरा गांव के नौनिलाल पटेल, आम लोगों की तरह हंसते-मुस्कुराते थे. लेकिन 19 अक्टूबर, 2010 की सुबह उनकी भूरी आंखों वाली मासूम बच्ची वसुंधरा को उसी के गांव के पांच लोगों ने मिट्टी का तेल डालकर जला दिया. वजह सिर्फ यह थी कि नौनिलाल अपनी बेटी के साथ हुए बलात्कार की शिकायत दर्ज कराने घटना की रात को ही उसे लेकर स्थानीय थाने गए थे. उनकी इस ‘जुर्रत’ से गुस्साया बलात्कार का आरोपित सौरभ पटेल, अपने परिवार के अन्य सदस्यों के साथ उनके घर जा पहुंचा और वसुंधरा को आग के हवाले कर दिया. तब से नौनिलाल मुस्कुराना भूल गए हैं. वे कहते हैं, ‘पूरा गांव राजीनामा करवाने पर जोर दे रहा है. हमारी बच्ची के साथ खराब काम किया. उसे हमारे ही घर में जला दिया. वे बड़े लोग हैं. उनकी भोपाल तक में बहुत पहुंच है इसलिए सारा गांव उन्हीं के साथ है.’

17 वर्षीया वसुंधरा, नौनिलाल की इकलौती बेटी थी और वे उसके भविष्य के लिए बड़े सपने देख रहे थे. बुंदेलखंड के एक पिछड़े गांव में रहते हुए भी उन्होंने वसुंधरा का दाखिला गांव से सात किलोमीटर दूर स्थित उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में करवाया था. वसुंधरा होनहार थी. नौनिलाल नहीं चाहते थे कि उनकी बिटिया सिर्फ लड़की होने की वजह से पीछे रहे. लेकिन परंपराओं के नाम पर चल रही पाशविक सामाजिक प्रवृत्तियों के सामने वसुंधरा और उसका परिवार हार गया.

18 अक्टूबर, 2010 को नौनिलाल के गांव में भंडारा था. गांव के ज्यादातर लोग भंडारे में व्यस्त थे. त्योहार की वजह से वसुंधरा के स्कूल की भी छुट्टी थी. शाम करीब पांच बजे वह अपने घर के सामने वाले अरहर के खेत की तरफ टहलने के लिए निकली थी. तभी सौरभ पटेल ने उसे अकेला पाकर उसके साथ बलात्कार किया. वसुंधरा की मां ज्ञानवती बताती हैं, ‘लड़की की चीख-पुकार सुनकर उसका भाई गगन खेतों की ओर दौड़ा. पर तब तक सौरभ भाग निकला. हम लड़की को घर ले आए.’ नौनिलाल कहते हैं, ‘पर मोड़ी चुप ही नहीं हो रही थी. रोए-चिल्लाए जा रही थी. फिर रात करीब आठ बजे हम उसे गाड़ी में बिठाकर तेजगड़ थाने ले गए. पर थानेवालों ने रिपोर्ट लिखने के लिए हमसे 1000 रु मांगे. हमारे पास 300 ही थे सो हमने उन्हें दे दिए. फिर उन्होंने मुझे और मेरे भाई को बाहर बिठा दिया और मेरी रोती लड़की से रात के ढाई बजे तक पूछताछ करी. रिपोर्ट लिखी या नहीं, यह तो पता नहीं पर हम रात ढाई बजे अपनी लड़की को लेकर गांव वापस आ गए.’

पीड़ित परिवार के मुताबिक रात को ही गांव में यह बात फैल गई थी कि वसुंधरा के बापू पुलिस में रिपोर्ट करने गए हैं. सिसकियों के साथ वसुंधरा की मां ज्ञानवती बताती हैं, ‘सौरभ पटेल का परिवार बहुत संपन्न और शक्तिशाली है. उन्हें यह बात गवारा नहीं हुई होगी कि कोई उनके लड़के की शिकायत दर्ज कराने जाए. अगले दिन लगभग सुबह सात बजे की बात है. मैं खेत पर गई थी और वसुंधरा के बापू दालान में बैठे थे. लड़की भीतर थी. तभी सौरभ अपने परिवार के चार अन्य लोगों के साथ बीच वाले दरवाज़े से घुसकर अंदर आया और मेरी लड़की का मुंह दबाकर उस पर मिट्टी का तेल डाल दिया. फिर उस पर आग लगाकर वे लोग भाग गए. जब तक हम लोग पहुंचे, मोड़ी बहुत जल गई थी.’

अपनी तड़पती बच्ची को लेकर वसुंधरा के माता-पिता सीधा दमोह जिला अस्पताल पहुंचे. जिले के पुलिस अधीक्षक और स्थानीय मीडियाकर्मी भी सूचना मिलने पर अस्पताल पहुंचे. पर तब तक वसुंधरा की हालत बिगड़ चुकी थी. वह 95 फीसदी से भी अधिक जल चुकी थी. मौत से पहले उसने बयान दिया और उस पर दस्तखत भी किए. ज्ञानवती कहती हैं, ‘उसने नाम भी गिनवाए थे. नन्नू, पुरुषोत्तम, सीताराम, टीकाराम और सौरभ पटेल. उसने पुलिस वाले साहेब को भी बताया था कि इन पांचों ने उस पर मिट्टी का तेल डाला और उसे जला दिया. मीडियावालों ने भी देखा. फिर भी आज तक उन लोगों को सजा नहीं हुई.’

जिला अस्पताल से तुरंत वसुंधरा को जबलपुर रेफर कर दिया गया, पर उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया. घटना के लगभग 45 दिन बाद पुलिस ने पांच में से चार मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार तो कर लिया पर उन्हें ज्यादा दिन जेल में नहीं रख सकी. नन्नू पटेल जमानत पर रिहा हो चुका है. दो अन्य आरोपितों की भी जमानत होने वाली है जबकि मुख्य आरोपित सौरभ पटेल का मामा टीकाराम, आज भी फरार है. सुनवाई शुरू होने से पहले ही आरोपित को जमानत मिल जाने से वसुंधरा के परिवार की निराशा और बढ़ गई है. नौनिलाल कहते हैं, ‘उसके परिवारवाले हमसे बार-बार कहते हैं कि केस वापस ले लो. हम तो करोड़ों रु खर्च करके भी सबको बचा ले जाएंगे. बोलते हैं कि सागवान के ट्रक में लदवाकर तुझे भी जंगल में मरवा देंगे, किसी को पता नहीं चलेगा. मेरा एक लड़का बचा है, उसे भी मारने की धमकी देते हैं. उनके पास  पैसा और ताकत है. पुलिस, प्रशासन, डाक्टर और न्याय, सब उन्हीं के पक्ष में हैं.’

अदालत में जारी मामले के बारे में नौनिलाल पटेल और उसके परिवार को ज्यादा जानकारी नहीं है. पुलिस ने पीड़ित परिवार को एफआईआर की एक प्रति देने की भी जहमत नहीं उठाई. मौत से पूर्व दिए गए बयान की प्रति तो दूर की बात है. स्थानीय थाने में मामले पर बात करने के लिए कोई अधिकारी मौजूद नहीं था. बहुत पूछताछ करने पर तेजगड़ थाने के एक सिपाही ने एफआईआर की प्रति दिखाई. आरोपित इतनी देर से क्यों पकड़े गए, परिस्थितिजन्य साक्ष्यों का क्या हुआ, इन सवालों के जवाब पुलिस के पास नहीं हंै.

वसुंधरा पटेल हत्याकांड के सरकारी वकील को ढूंढ़ने पर देवी सिंह का नाम सामने आया. उनसे जानकारी मिली कि एडिशनल सेशन जज की अदालत में मामला लंबित है. वे कहते हैं, ‘अभी चार्जशीट कमिट करी जाएगी और फिर आरोप पर बहस के बाद आरोप की धाराएं तय होंगी. तब केस आगे बढे़गा.’ सिंह  का मानना है कि ऐसे मामलों में अकसर पैसे या सामाजिक दबाव के कारण गवाह बयान से मुकर जाते हैं. टूट चुकी उम्मीदों का अंधेरा आंखों में लिए वसुंधरा के माता-पिता कहते हैं कि वे आगे केस नहीं लड़ेंगे. ज्ञानवती कहती हैं, ‘बस फैसला हो जाए. हम वैसे ही बहुत परेशान हैं. एक तो हमारी पाली-पोसी लड़की को जलाकर मार डाला और अब बेटे को भी मारने की धमकियां मिलती हैं. हम किसके लिए लड़ें? फैसला तो उन्हीं के पक्ष में हो रहा है जिनके पास पैसा और ताकत है. गरीबों के बच्चों तो ऐसे ही जलाकर मार दिए जाते हैं.’

04 : ‘आरोपित रिहा होने लगे तो लड़की की मां भी अपना दिमागी संतुलन खो बैठी’

अप्रैल की एक गर्म दोपहर में मई-जून सा तपता, दमोह जिले की नोहाटा तहसील में बसा ‘छोटी बडाऊ’ गांव. पहली नजर की तहकीकात से ही पता लग जाता है कि जिस तरह इस गांव की जमीन पर सूखे की वजह से दरारें पड़ गई हैं, ठीक उसी तरह यहां के समाज में भी सामंतवाद की गहरी दरारें मौजूद हैं. खुश्क चेहरे वाले यहां के ज्यादातर गांववालों का दिल अपने पड़ोस में जलाई गई एक लड़की के प्रति सूखी जमीन की तरह कठोर है.

गांव से गुजरने वाली मुख्य सड़क पर एक उजाड़ झोपड़ी है जिसका पता बताने को गांववाले तैयार ही नहीं. इस झोपड़ी के दरवाजे को ईंटों और पत्थरों से ढक दिया गया है. कुंडे पर एक मोटा ताला भी जड़ा है. यह घर रविता उर्फ फरजाना का है जिसकी मौत जलने की वजह से हुई थी. 26 सितंबर, 2009 को रविता को उसी के घर में उसी के रिश्तेदारों ने मिट्टी का तेल डाल कर जला दिया.

17 साल की रविता अपने पिता सलीम उर्फ़ मुन्ना और मां तुलाई की अकेली संतान थी. रविता की मौत के कुछ ही दिन बाद उसके पिता अपनी बच्ची के गम में गुज़र गए. इसके बाद उसकी मां पागल हो गई. अब वह सड़कों पर भीख मांगती है. गांव के लोग इस हादसे को लगभग भूल चुके हैं. आश्चर्य की बात है कि गांव की एकमात्र मस्जिद में मौजूद तमाम लोगों में से किसी को भी अपने ही गांव में हुई एक मुसलमान बच्ची की हत्या की घटना याद नहीं. वहां मौजूद एक बुजुर्ग कहते हैं, ‘हमें तो ऐसी कोई रविता या फरजाना याद नहीं पड़ती. आप आगे की दुकान पर पूछ लीजिए.’

थोड़ा भटकने पर घर का पता चल जाता है. थोड़ी मेहनत पड़ोसियों को बात करने के लिए राजी करने के लिए भी करनी पड़ती है. रविता के पड़ोसी राम सिंह लोधी बताते हैं, ‘कोई झगड़ा और मार-पीट हुई थी इनके घर. फिर लड़की जल गई और अगले ही दिन उसने दम तोड़ दिया. पर उसे किसने जलाया, ये हमें नहीं पता’. पास में रहने वाले मुन्ना सिंह बताते हैं कि इस घटना के बाद पूरा परिवार उजड़ गया. बड़ा खुशहाल परिवार था. पर रविता को जलाकर मार दिया गया. पिता तो लड़की के गम में पहले ही मर गया था. जब आरोपित रिहा होने लगे तो लड़की की मां भी अपना मानसिक संतुलन खो बैठी. घर पर ताला पड़ गया और उसकी मां ने गांव छोड़ दिया. हमने कई बार उसे पास के कस्बों में भीख मांगते देखा है.’ रविता के घर के पुराने टूटे दरवाजे पर करीने से रखी ईंटों को देखकर महसूस होता है जैसे आहिस्ता-अहिस्ता, ईंट-दर-ईंट इस हत्याकांड की सच्चाई को छिपाया गया हो और एक खुशहाल परिवार को अपने ही समाज की चुप्पी ने बर्बाद कर दिया हो.

रविता की हत्या कैसे हुई, यह गुत्थी आज तक पुलिस भी सुलझा नहीं पाई है. स्थानीय नोहटा थाने के टाउन इंस्पेक्टर केसी तिवारी तहलका को बताते हैं कि रविता का उसकी चची जिंदी के साथ झगड़ा हुआ था. इसी झगडे़ में रविता और उसके चाचा मुनीर के परिवार के बीच मारपीट हुई. ‘रविता की मौत जलने की वजह से हुई थी. उसकी मां का आरोप था कि रविता को उसके चाचा मुनीर, चाची जिंदी और चचेरे भाइयों (इकबाल और शाहिद अली) ने मिलकर जलाया है. रविता ने अपने मृत्युपूर्व बयान में भी यह कहा था कि उसके इन चार रिश्तेदारों ने उसे जलाया. पुलिस ने भारतीय दंड संहिता की धारा 323, 302 और 34 के तहत मामला दर्ज कर लिया था. पर रविता की मां के आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त सबूत नहीं थे. इसीलिए चार में से तीन आरोपित बरी हो गए जबकि चौथे पर सुनवाई चल रही है’, तिवारी कहते हैं.

सबूत होते भी कैसे जब पुलिस का मानना है कि रविता ने स्वयं अपने ऊपर मिट्टी का तेल डालकर खुद को आग लगाई थी. कारण पूछने पर एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी एक बड़ा ही अतार्किक-सा जवाब देते हैं, ‘पहले की महिलाएं अलग थीं. आज कल की लड़कियों में जरा भी सहन शक्ति नहीं है. जरा कुछ हुआ नहीं कि गुस्से में खुद को आग लगा लेती हैं. अरे, औरतों को तो समुंदर की तरह सहनशील होना चाहिए. पर खैर, उन्हें प्रताडि़त तो किया ही जाता है.’

इस मामले का एक दूसरा पहलू भी है. स्थानीय पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है  कि रविता की हत्या की गई थी. एक स्थानीय पत्रकार नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर बताते हैं कि घटना वाले दिन रविता की मां और रविता चिल्ला-चिल्लाकर कह रही थीं कि उसके रिश्तेदारों ने ही उसे जलाया है. ‘मैंने तो खुद इस केस को कवर किया था. ज्यादातर मामलों में आदमी मरने से पहले झूठ नहीं बोलता है. अगर हम एक पल को पुलिस की यह बात मान भी लें कि रविता ने आत्महत्या की थी तो बड़ा सवाल यह है कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया. असल में स्थानीय पुलिस प्रशासन औरतों को जलाकर मार दिए जाने की ऐसी घटनाओं को छिपाना चाहता है. इसलिए हत्या को आत्महत्या में बदलकर दिखा देना सबसे आसान रास्ता है.’ रविता की हत्या की गुत्थी आज तक सुलझ नहीं पाई है. उसके पिता अपनी बेटी की बर्बर मृत्यु के सदमे को सह नहीं पाए और मां सड़कों पर एक पागल भिखारी की तरह घूम रही है. उसकी मां ने जिन लोगों को अपनी बेटी की हत्या का दोषी ठहराया था, सभी एक-एक कर छूट गए. और एक खुशहाल परिवार अपनी ही जमीन पर खत्म हो गया.

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साल 2009 से 2010 के बीच लड़कियों को जलाने के कुछ मामले

• 11 जुलाई, 2009 को दमोह जिले के पिटराऊधा गांव (थाना हाटा) में एक पुजारी ने एक महिला से बलात्कार करके उसे जिंदा जलाया.
• 26 जून, 2009 को दमोह जिले के छोटी बडाऊ गांव में रविता उर्फ़ फरजाना को संदिग्ध परिस्थितियों में जिंदा जलाया गया.
• 18 अगस्त, 2009 को दमोह जिले के कुम्भारी गांव (थाना मंझौली) में कल्पना नामक लड़की को जिंदा जलाया गया.
• 18 सितम्बर, 2009 को दमोह जिले के छपवारा गांव (थाना नोहटा) में गेंदा बाई नामक महिला को बलात्कार के बाद जिंदा जलाया गया.
• 3 मार्च, 2010 को दमोह जिले के रसीलपुर थाने क्षेत्र में देवी बाई नामक महिला को जिंदा जलाया गया.
• 20 मार्च, 2010 को दमोह जिले के सडारा गांव (थाना बटियागढ़) में लीलाबाई को बलात्कार के प्रयास के बाद जिंदा जलाया गया.
• 19 अक्टूबर, 2010 को दमोह जिले के मुग्दापुरा गांव (तहसील नोहटा) में वसुंधरा पटेल को बलात्कार के बाद जलाया गया.
• 19 अक्टूबर, 2010 को दमोह जिले के कुम्भारी गांव (थाना पटेरा) में एक महिला को बलात्कार के बाद जिंदा जलाया गया.
• 26 नवम्बर, 2010 को दमोह जिले के चिरौला गांव (थाना पटेरा ) में तुलसी बाई लोधी को जिंदा जलाया गया.
• 4 मार्च, 2010 को छतरपुर जिले के हमा गांव (थाना ओरछा रोड) में संध्या रिछारिया को बलात्कार के प्रयास के बाद जिंदा जलाया गया.

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