सवालों के घेरे में डीजीपी की नियुक्ति | Tehelka Hindi

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सवालों के घेरे में डीजीपी की नियुक्ति

उत्तर प्रदेश में वरिष्ठ अधिकारियों को दरकिनार करते हुए जावीद अहमद को पुलिस महानिदेशक बनाए जाने के बाद पुलिस सुधारों और नियुक्तियों को लेकर बहस छिड़ गई है. इस नियुक्ति को लेकर प्रदेश की अखिलेश सरकार सवालों के घेरे में है

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नए साल की शुरुआत के साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार ने 15 वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दरकिनार करके एस जावीद अहमद को राज्य का पुलिस महानिदेशक बनाया तो यह तय हो गया कि पुलिस सुधारों की बातें अभी दूर की कौड़ी है. जावीद अहमद 1984 बैच के अधिकारी हैं जो कि अब तक पुलिस महानिदेशक (रेलवे) के पद पर तैनात थे. प्रदेश में रंजन द्विवेदी सबसे वरिष्ठ अधिकारी हैं, जो 1979 बैच के आईपीएस हैं. कायदे से इस पद पर उनकी दावेदारी बनती थी, लेकिन उनके साथ 14 अन्य अधिकारियों को नजरअंदाज करके यह नियुक्ति हुई. वरिष्ठता क्रम में द्विवेदी के बाद 1980 बैच के डीजी आईपीएस सुलखान सिंह का नंबर था. राज्य पुलिस महानिदेशक पद के दावेदार 15 अधिकारियों को दरकिनार करके जावीद अहमद को नियुक्त किए जाने को लेकर तमाम सवाल उठे कि क्या सभी 15 वरिष्ठ अधिकारी इस पद के लिए अयोग्य थे? इस पद से डीजीपी जगमोहन यादव के रिटायर होने के बाद अधिकारी महकमे में जबरदस्त लॉबिंग शुरू हुई थी. चर्चा है कि जाति, धर्म, वफादारी, खेमेबाजी आदि सब मुद्दे उछाले गए और अंतत: नौकरशाही में सियासत की बाजी जावीद अहमद के हाथ लगी. आरोप हैं कि जावीद अहमद को अखिलेश यादव सरकार ने आने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर अपने चुनावी कार्ड के रूप में चुना है क्योंकि 15 अधिकारियों को दरकिनार कर किसी जूनियर अधिकारी को प्रमोट करने का मसला गंभीर सवाल खड़े करता है.

जावीद अहमद अब उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक के रूप में मार्च 2020 तक सेवाएं देंगे. उत्तर प्रदेश में 2017 में विधानसभा चुनाव हैं. माना जा रहा है कि यह नियुक्ति आगामी चुनाव के मद्देनजर उत्तर प्रदेश सरकार के गुणा-गणित का परिणाम है. अधिकारियों की बिरादरी में यह आम धारणा है कि नियुक्तियां और तबादले उत्तर प्रदेश और बिहार के सबसे बड़े उद्योगों में से हैं जो पर्दे के पीछे चलते हैं. जब-जब इस तरह की नियुक्ति या पुलिस प्रताड़ना की कोई घटना होती है, तब तब यह सवाल उठता है कि करीब चार दशक से लंबित पुलिस सुधारों की शुरुआत कब होगी?

पूर्व आईएएस अधिकारी आरके मित्तल ने इस बारे में कहा, ‘मेरा मत है कि अगर सरकार की नीयत ठीक है तो यह नियुक्ति ठीक है, क्योंकि एक-एक, दो-दो महीने वाली नियुक्तियां तो किसी भी तरह से ठीक नहीं हो सकतीं. नियुक्तियों में थोड़ा-बहुत राजनीतिक फैक्टर तो होता है, लेकिन अगर व्यापक तौर पर मंशा ठीक है तो किसी भी नियुक्ति में कोई बुराई नहीं है. दूसरे, यहां पर राजनीतिक बाध्यताएं भी काम करती हैं. पार्टियां यह तो जरूर ध्यान में रखती हैं कि कौन सा अधिकारी उनके लिए मुफीद रहेगा. अगर नियुक्ति के पीछे कोई दुर्भाव नहीं है तो वह गलत नहीं है.’

‘पुलिस सुधार होगा, लेकिन समय के साथ होगा. कभी ऐसा उफान आएगा कि सुधार करना अनिवार्य बन जाएगा, जैसे चुनाव सुधार हुए’

हाल ही में गुजरात में हुए राज्य पुलिस प्रमुखों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलिस को अपने कामकाज में संवेदनशील होने की बात कही थी. बेशक पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार की वकालत मौजूं है. पुलिस सुधार के जरिये कानून-व्यवस्था संबंधी तमाम खामियों को तंत्र से दूर किया जा सकता है. लेकिन इसकी शुरुआत कहां से होगी जब तक कि इस तरह से राजनीतिक फायदे-नुकसान की बिना पर तबादले और नियुक्तियां होती रहेंगी?

पुलिस तंत्र को संवेदनशील और कार्यकुशल बनाने के प्रधानमंत्री के सुझाव पर अमल की शुरुआत किसकी तरफ से होगी? क्या केंद्रशासित प्रदेशों में केंद्र कोई नजीर पेश करके राज्यों से वैसा करने  के लिए कहेगा? क्या केंद्र पुलिस सुधार की दिशा में कोई गाइडलाइन जारी करेगा? क्या राज्य इस दिशा में खुद से पहल करेंगे या फिर पुलिस सुधार चर्चा पिछले चार दशकों की तरह आगे भी जारी रहेगी?

पुलिस सुधार की बहस चलते हुए चार दशक से ज्यादा हो चुके हैं. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट की एक दशक पुरानी गाइड लाइन पर अब तक केंद्र या राज्य सरकारों की ओर से कोई ठोस पहल सामने नहीं आ सकी है. प्रधानमंत्री ने जो सुझाव दिए, इस तरह के सुझाव पहले भी विभिन्न मंचों से आते रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट भी लंबे समय से 1861 में बने भारतीय पुलिस कानून में बदलाव लाने का दिशा-निर्देश जारी कर चुका है और कई बार केंद्र व राज्य सरकारों को तलब भी कर चुका है. विडंबना यह है कि कोर्ट के दिशा-निर्देशों पर केंद्र या राज्य की ओर से कोई अमल नहीं किया गया. कोर्ट के निर्देश के बाद कुछ राज्यों ने पुलिस सुधार का दिखावा जरूर किया. सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों को आए दस साल होने को हैं, बीच में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर राज्यों से जवाब भी मांगा था, लेकिन राज्यों की ओर से उदासीनता की स्थिति में सुप्रीम कोर्ट लाचार ही नजर आया. अब सिर्फ यह चारा बचा है कि सुप्रीम कोर्ट अपने दिशा-निर्देशों को लेकर समय निर्धारित करे और कड़ी निगरानी के साथ इसे लागू करवाए.

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आपातकाल के दौरान पुलिसिया दमन अपने खौफनाक चेहरे के साथ सामने आया था. 1977 में जब केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी तो पुलिस सुधार का मुद्दा व्यापक चर्चा का विषय बना. उस समय की मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने जाने-माने पूर्व आईएएस अधिकारी डॉ. धर्मवीर की अध्यक्षता में पुलिस आयोग का गठन किया. 1977 से लेकर 1981 के बीच इस आयोग ने आठ रिपोर्ट पेश की और पुलिस सुधार के लिए बेहद अहम सुझाव दिए. आयोग ने मॉडल पुलिस एक्ट का एक प्रारूप भी प्रस्तुत किया था लेकिन उन पर कभी किसी ने ध्यान नहीं दिया. 1996 में उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रकाश सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करके पुलिस सुधार की मांग की. याचिका में उन्होंने अपील की थी कि कोर्ट केंद्र व राज्यों को यह निर्देश दे कि वे अपने-अपने यहां पुलिस की गुणवत्ता में सुधार करें और जड़ हो चुकी व्यवस्था को प्रदर्शन करने लायक बनाएं. इस याचिका पर न्यायमूर्ति वाईके सब्बरवाल की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई करते हुए 2006 में कुछ दिशा-निर्देश जारी किए. न्यायालय ने केंद्र और राज्यों को सात अहम सुझाव दिए. इन सुझावों में प्रमुख बिंदु थे- हर राज्य में एक सुरक्षा परिषद का गठन, डीजीपी, आईजी व अन्य पुलिस अधिकारियों का कार्यकाल दो साल तक सुनिश्चित करना, आपराधिक जांच एवं अभियोजन के कार्यों को कानून-व्यवस्था के दायित्व से अलग करना और एक पुलिस शिकायत निवारण प्राधिकरण का गठन. उस वक्त मेघालय, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश और हिमाचल प्रदेश ने इन सभी सुझावों से सहमति जताई थी. कई राज्यों ने कोर्ट के दिशा-निर्देश के कुछ बिंदुओं पर आपत्ति जताई और उन पर अमल को नामुमकिन करार दिया था. उस वक्त यह दलील भी सामने आई थी कि संविधान के तहत कानून-व्यवस्था राज्य-सूची का विषय है, इसलिए यह कार्यपालिका के अधिकार-क्षेत्र में आता है. इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट का आदेश राज्यों के अधिकार-क्षेत्र में दखलंदाजी है. कोर्ट के इस दिशा-निर्देश को दस साल बीत चुके हैं और अब तक कोई कारगर पहल नहीं हो सकी है. इस उदासीनता के चलते पुलिस सुधार का एजेंडा अभी तक लंबित है.

इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने 2013 में फिर से हस्तक्षेप करते हुए उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिवों को अदालत में तलब किया. इन अधिकारियों की ओर से कहा गया था कि वे एक हफ्ते के अंदर अदालत को बताएंगे कि उसके आदेश को लागू करने की दिशा में क्या रुकावटें आ रही हैं? उस दौरान इस मामले में न्यायमित्र यानी एमिकस क्यूरी रहे महाधिवक्ता जीएम वाहनवती ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि राज्य सरकारों ने पुलिस सुधारों पर न के बराबर अमल किया है. इसके बाद अदालत ने राज्यों से सुधार की दिशा में आ रही बाधाओं के बारे में पूछते हुए कहा कि उसके निर्णय पर समग्रता से अमल किया जाए. इसके लिए अदालत और ज्यादा इंतजार नहीं कर सकती.

इससे पहले भी देश में पुलिस सुधार के लिए कई आयोग व कमेटियां बनाई जा चुकी थीं और बाद में उनकी सिफारिशों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया. इसी क्रम में विधि आयोग, रिवेरियो कमेटी, पद्मनाभैया कमेटी, मलिमथ कमेटी तथा राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का गठन किया गया. इन सभी की ओर से समय-समय पर पुलिस सुधार के तमाम उपाय सुझाए गए लेकिन उनमें से किसी पर अमल नहीं किया गया. पूर्व डीजीपी प्रकाश सिंह जैसे तमाम अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि सरकारें अपने फायदे के लिए पुलिस का दुरुपयोग करती हैं. राज्यसत्ता के पास पुलिस ऐसी ताकत है जो विरोधियों से निपटने से लेकर अपनी नाकामी छुपाने तक में काम आती है. यह एक मुख्य वजह है कि जिसके कारण सरकारें पुलिस प्रणाली में सुधार करने के लिए तैयार नहीं हैं.

अखिलेश सरकार को लगता होगा कि किसी मुस्लिम को डीजीपी बनाकर वोटबैंक को प्रभावित कर पाएंगे

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उत्तर प्रदेश में नियमों का उल्लंघन कोई नई बात नहीं है. यह लगातार हो रहा है. सपा ने अब तक छह डीजीपी बना लिए हैं. किसी में भी नियमों का अनुपालन नहीं हुआ. हर सरकार का अपना नजरिया है. वे देखते हैं कि किस अधिकारी को नियुक्त करने पर उनके वोट बैंक पर असर पड़ेगा. यही मैं जावीद अहमद के बारे में कहूंगा. फिर भी जिस तरह के अधिकारी आजकल नियुक्त हो रहे हैं, उनको देखते हुए कहना चाहिए कि जावीद अहमद अच्छे अधिकारी हैं. उनकी छवि अच्छी है. हालांकि, वोट बैंक पर असर हो रहा हो तो खराब छवि के लोग भी तैनात हो जाते हैं. ऐसे कई लोग नियुक्त हो चुके हैं. इस तरह की नियुक्तियों से पुलिस महकमे में निराशा होती है. इस नियुक्ति से कुछ लोग निराश जरूर होंगे. तमाम अच्छे अधिकारी भी हैं जो डीजीपी नहीं बन पाए. क्यों नहीं बन पाए, ये अखिलेश यादव जानें. रंजन द्विवेदी का नाम बार-बार आया लेकिन उनको नहीं बनाया गया. एके गुप्ता भी अच्छे अधिकारी थे. अखिलेश सरकार को लगता होगा कि किसी मुस्लिम को डीजीपी बनाकर वोटबैंक को प्रभावित कर पाएंगे. हालांकि, यह सही है कि जावीद अहमद अपने आप में अच्छे अफसर हैं.

प्रकाश सिंह, पूर्व डीजीपी, उत्तर प्रदेश  

2015 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दूसरे प्रशासनिक सुधार आयोग की 153 अति महत्वपूर्ण सिफारिशों पर रायशुमारी करने के मकसद से मुख्यमंत्रियों का सम्मेलन बुलाया. इस सम्मेलन में पुलिस सुधार का रोडमैप तैयार किया जाना था. पुलिस जांच, पूछताछ के तौर-तरीके, जांच विभाग को विधि-व्यवस्था विभाग से अलग करना, महिलाओं की भागीदारी 33 फीसदी बढ़ाना और पुलिस की निरंकुशता की जांच के लिए विभाग बनाना, इस सम्मेलन का एजेंडा था. दिलचस्प है कि इस सम्मेलन में ज्यादातर राज्यों के मुख्यमंत्री आए ही नहीं. इस वजह से यह सम्मेलन बेनतीजा रहा और कोई रोडमैप नहीं बन सका. पुलिस सुधार के लिए गृह मंत्रालय ने राज्यों से राय मांगी तो मात्र आधा दर्जन राज्यों ने अपनी राय भेजी. राज्य सरकारों के इस रवैये से साफ पता चलता है कि राज्य सरकारें नहीं चाहतीं कि पुलिस की जंग लगी प्रणाली में कोई बदलाव हो. प्रकाश सिंह ने ‘तहलका’ को बताया, ‘सुप्रीम कोर्ट ने 2006 में ही गाइडलाइन जारी की थी लेकिन उसे उत्तर प्रदेश ने या किसी दूसरे प्रदेश ने लागू नहीं किया. बाद में सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को तलब किया. यूपी के मुख्य सचिव दो बार तलब हुए और उन्हें फटकार भी लगी लेकिन कोई खास फर्क नहीं पड़ा. अब भी शायद वह मामला कोर्ट में है. दो तीन बार मैंने निजी स्तर पर कोशिश की कि इसे लागू कराया जाए. सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पेंडिंग है, देखिए अब क्या नोटिस लेते हैं. जस्टिस ठाकुर जब तक मुख्य न्यायाधीश नहीं बने थे, तब तक उन्होंने इस पर कोई संज्ञान नहीं लिया. उनकी जानकारी में ये बात लाई गई पर मुझे लगा कि उनका दृष्टिकोण बहुत ज्यादा उदार था.’

सरकारें फायदे के लिए पुलिस का दुरुपयोग करती हैं. सत्ता के पास पुलिस ऐसी ताकत है, जो विरोधियों से निपटने से लेकर नाकामी छुपाने तक में काम आती है

इस मसले के कोर्ट में दो दशक तक लटके रहने के सवाल पर प्रकाश सिंह ने कहा, ‘मैंने तो जितना हो सकता था किया. अब मैं अपनी लड़ाई विरासत में छोड़ जाऊंगा. जहां तक ले जा पाऊंगा, ले जाऊंगा, उसके बाद अगली पीढ़ी उसे आगे बढ़ाएगी. कुछ लड़ाइयां बहुत लंबी चलती हैं. इस देश में जो दो सबसे पावरफुल आॅर्गनाइजेशन हैं- ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक तबका, दोनों ही इसका विरोध कर रहे हैं. ये दोनों जिसका विरोध करें, वह इस देश में बिल्कुल नहीं हो सकता. ये दोनों मिलकर सेना तक को हतोत्साहित कर देते हैं, फिर इनके आगे पुलिस की क्या बिसात है. पुलिस सुधार न लागू करने की कोशिश खास तौर से ब्यूरोक्रेसी और राजनीतिक तबके की है क्योंकि सुधार की पहल नहीं होने से दोनों को ही फायदा है. सुप्रीम कोर्ट के सामने यह भी दिखाना है कि हम कुछ कर रहे हैं, इसलिए सुधार का स्वांग रचा गया है. असलियत में जांचने पर पता चलता है कि स्थिति कुछ और है. ब्यूरोक्रेसी और राजनीति के लोग चाहते हैं कि चीजें यथास्थिति बनी रहें. घोड़े की सवारी सभी को अच्छी लगती है. पुलिस पर आपका रौब हो तो बहुत अच्छी बात है.’

आरके मित्तल का कहना है, ‘शॉर्ट टर्म में राजनीति पुलिस का फायदा उठाती है. पुलिस सुधार लागू करना उनके लिए अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा होगा लेकिन लॉन्ग टर्म में यह लागू नहीं होता. उत्तर प्रदेश में पिछले तीन बार से कोई सरकार दोबारा नहीं लौटी. वे शॉर्ट टर्म भर का ही फायदा उठा पाते हैं. बड़े काम करते तो शायद दो-तीन टर्म की सरकारें चला सकते थे. पुलिस सुधार होगा, लेकिन समय के साथ होगा. कभी ऐसा उफान आएगा कि सुधार करना अनिवार्य बन जाएगा, जैसे चुनाव सुधार हुए. इस मामले में केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट कड़े कदम उठाएं तो बात बन सकती है.’

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