हिंदी बनाम अंग्रेजी : पत्रकारिता के दो रंग

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अपने एक कमरे के छोटे-से किराये के ‘घर’ के दरवाजे पर ताला मारकर मैं दौड़ी-दौड़ी घर के सामने वाले चौराहे पर पहुंची. ‘ब्लू डार्ट’ से मेरे लिए एक लिफाफा आया था. जल्दी से दस्तखत कर कुरियर वाले को पर्ची पकड़ाई और लिफाफा लेकर वापस कमरे की तरफ दौड़ी. लिफाफे के एक सिरे को धीरे से फाड़ा और अंदर मौजूद पेमेंट इनवॉइस और 32 हजार रुपये का चेक निकाल कर देखा. यह एक स्वतंत्र पत्रकार के तौर पर मेरी पहली कमाई थी और मुझे याद है कि चेक हाथ में लेकर मैं खुशी से उछल पड़ी थी. खुश होने की वजह भी थी. अब मैं भारत भर में फैली करोड़ों खबरों में से अपनी पसंद की स्टोरी चुनकर उसे कर सकती थी, उस पर दस दिन का समय खर्च कर सकती थी, ग्राउंड पर जाकर उसे रिपोर्ट कर सकती थी और फिर कम से कम तीन हजार शब्दों में दिल खोलकर लिख सकती थी. साथ में तस्वीरें भी भेज सकती थी और कम से कम छह रुपये हर एक शब्द के हिसाब से पैसे भी ले सकती थी. मतलब मैं बिना किसी दफ्तर में काम किए अपनी पसंद की इन-डेप्थ स्टोरीज कर सकती थी और पैसे भी कमा सकती थी. ज्यादा नहीं तो कम से रिपोर्ट के फील्ड वर्क के दौरान होने वाली यात्राओं में ट्रांसपोर्ट का खर्चा तो अलग से पेमेंट में जुड़कर मिल ही रहा था.
मेरे लिए यह सेटअप एक स्वतंत्र जीवन, मनचाहे काम और जरूरत भर पैसों की चाभी था. बहुत संभव है कि अंग्रेजी में काम कर रहे स्वतंत्र पत्रकारों को सिर्फ 6 रुपये प्रति शब्द की दर कम लगे या फील्ड बजट का कम होना अखरे या हर फिर पेमेंट में से दस फीसदी की कर कटौती तकलीफ दे. अंग्रेजी में स्वतंत्र तौर पर काम कर रहे मेरे बहुत से मित्र जब मुझसे कहते थे कि फ्रीलांसिंग की कमाई से उनका खर्च चलना मुश्किल है तब मैं सिर्फ मुस्कुरा कर उनकी बात सुन लेती थी. और आज अपना पहला चेक आने पर मैं इतनी खुश थी जैसे उतने पैसो से सारी जिंदगी गुजर सकती हो.
वजह शायद हिंदी पत्रकारिता में गुजारे गए साढ़े तीन साल का अनुभव था. हिंदी में काम करते हुए मैंने बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों की राजधानियों में फोटो पत्रकारों को सिर्फ सौ-सौ रुपये में तस्वीरें बेचते और कॉलम लिखने वालों को सिर्फ चार या पांच सौ रुपये में खुशी से लिखते हुए देखा था. मैंने देखा था कि कैसे एक ही मीडिया संस्थान की हिंदी इकाई में एक प्रशिक्षु की भर्ती 12 हजार रुपये/महीने पर होती है और ज्यादा सुविधाओं के साथ वही काम उसी संस्था की अंग्रेजी इकाई में करने वाले प्रशिक्षु की भर्ती कम से कम 25 हजार रुपये/महीने पर होती है. मैंने देखा था कि कैसे एक हिंदी के पत्रकार को खबर के लिए जाते वक्त थर्ड एसी का किराया भी मुश्किल से जारी होता है जबकि अंग्रेजी में सभी ज्यादातर हवाई जहाज से यात्रा करते थे. अंग्रेजी की दो पेज की रिपोर्ट पर होने वाले खर्च में हम हिंदी में दस-दस पेजों की कवर स्टोरी फाइल कर दिया करते थे.
हिंदी में कभी हमारे पास अंग्रेजी के बराबर संसाधन नहीं रहे और अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए अच्छे काम के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी नहीं था. इसलिए हमने कम बजट में काम करने के लिए खुद को ट्रेन कर लिया था. उदाहरण के लिए सिर्फ 30 हजार रुपयों में देश के सुदूर कोनों में एक हफ्ते काम करना और दस पन्ने से ज्यादा लंबी पड़ताल के साथ लौटना. इसी बजट में फोटोग्राफर को भी दफ्तर से साथ ले जाना होता था. पत्रकार अगर कोई लड़की है तो दिक्कत दोगुनी. बाहर रुकने के लिए एक सुरक्षित जगह चाहिए और फोटोग्राफर के लिए अलग कमरा भी. हिंदी पत्रिका या अखबार के दफ्तर में ज्यादा बजट की मांग भी नहीं कर सकते वर्ना स्टोरी पर जाने से ही रोक दिए जाने का खतरा रहता है और अगर पत्रकार स्टोरी नहीं करेगा तो करेगा क्या? ऐसे में हिंदी का पत्रकार जुगाड़ के जरिए सारे काम करना सीख जाता है.
कम बजट में रिपोर्ट करने के लिए वह अपना ह्यूमन रिसोर्स नेटवर्क और बड़ा करता है. यही ‘नेटवर्क’ हिंदी के हर पत्रकार की असली पूंजी होता है. हर जिले, हर शहर में उसके चार मित्र, दो परिचित तो होते ही हैं. सस्ते होटलों, धर्मशालाओं, मस्जिदों, गुरुद्वारों और चर्च से लेकर गांव-खेड़े में चारपाई या फिर तिरपाल बिछाकर भी सो जाता है. वह फिर भी खुश है क्योंकि उसकी कंडीशनिंग ऐसे वातावरण में की गई है जहां उसकी रिपोर्ट प्रकाशित करके संपादक उस पर एक तरह से एहसान करता है और उसे इसी पुरस्कार के लिए संस्था का शुक्रगुजार होना चाहिए. उसने जहां अंग्रेजी के बराबर तनख्वाह या काम करने की बेहतर स्थितियों की मांग की, पहले खुद लाखों रुपये पा रहे संपादक उसको ‘देश या पत्रकारिता के नाम पर शहीद होने’ की समझाइश देंगे और दोबारा कहने पर तो उसे तुरंत रिपोर्टिंग छोड़ने को कह दिया जाएगा या फिर सेमी-पोर्न खबरें वेबसाइट पर अपलोड कर रहे साथियों की टीम में शामिल हो जाने के लिए कहा जाएगा.
अंग्रेजी और हिंदी पत्रकारिता (आउटपुट) में जमीन-आसमान का फर्क है यह तो सभी कहते हैं मगर यह कोई नहीं कहता कि हिंदी और अंग्रेजी में ‘विशाल सैलरी गैप’ के साथ-साथ काम करने के माहौल और काम करने के तौर-तरीके में भी बहुत फर्क है.
उदाहरण के लिए मुख्यधारा के समाचार प्रकाशनों में (अपवादों को छोड़कर) 
  •  हिंदी के ज्यादातर संस्थानों में आगे बढ़ने की सीढ़ी चमचागिरी की चाशनी में लिपटी हुई है. स्टाफ अपना मत, खास तौर पर मतभेद, एडिटोरियल मीटिंग में नहीं रख सकता. अगर रख दिया तो संपादक और वरिष्ठों के पास स्टाफ को परेशान करने के सौ तरीके हैं. अंग्रेजी में ज्यादा लोकतांत्रिक तरीके से बहस होती है और काम से संबंधित किसी भी बात पर आपत्ति जताने पर वरिष्ठ उसे अपने ईगो पर नहीं लेते.
  • हिंदी अखबारों के ज्यादातर संपादकों और वरिष्ठों का मानसिक  स्तर और नजरिया बहुत राष्ट्रवादी है. महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर इनके संपादकीय पढ़कर ऐसा लगता है जैसे संघ की शाखा से लौटकर लिखे गए हों. किसी भी प्रोग्रेसिव स्टोरी आइडिया पास करवाने की प्रक्रिया में रिपोर्टर दीवार से सर फोड़ लेगा फिर भी दस में से नौ बार आइडिया रिजेक्ट कर दिया जाएगा. अल्टरनेटिव सेक्सुअलिटी तो दूर की बात है, सेक्सुअलिटी शब्द से ही न्यूज रूम में असहजता फैल जाती है. अपराध और रक्षा से जुड़े मामलों को हिंदी के सबसे बड़े अखबार ऐसे कवर करते हैं जैसे वे अखबार नहीं, पुलिस और आर्मी के माउथपीस हैं! अंग्रेजी में हर तरह की कहानियों के लिए जगह है. हर तरह के पत्रकारों के लिए जगह है. अंग्रेजी में आलोचनात्मक नजरिया अब भी जिंदा है इसलिए उनकी रिपोर्ट्स में भी फर्क दिखता है.
  • हिंदी अखबारों के दफ्तरों में गणेश पूजन, नवरात्रि आदि मनाए जाते हैं. आरती, टीका और प्रसाद का पूरा कार्यक्रम होता है जबकि ईद और क्रिसमस के दौरान स्टाफ के लिए अलग से प्रार्थना करने की जगह तक नहीं बनवाई जाती. अंग्रेजी दफ्तरों में किसी भी तरह की पूजा नहीं होती.
  • हिंदी में छुट्टी-बाईलाइन से लेकर प्रमोशन तक सब कुछ ‘वरिष्ठ’ की कृपा पर निर्भर करता है. अंग्रेजी के पत्रकार का करिअर ग्राफ उसके काम पर निर्भर करता है.
  •  अंग्रेजी में किसी बड़ी रिपोर्ट के समय जिस शिद्दत से डेस्क के कर्मचारी, रिपोर्टर के साथ खड़े रहते हैं (इंटरव्यू टेप सुनकर लिखने से लेकर रिसर्च और एडिटिंग में मदद करने तक) हिंदी में ऐसा कभी नहीं होता. हिंदी डेस्क के लोग ‘बाईलाइन देकर एहसान किया है’ वाले सिंड्रोम से ही बाहर नहीं निकल पाते.
  • अंग्रेजी के पत्रकार के पास किताबें खरीदने, उन्हें पढ़ने, फिल्में देखने और दुनिया में हो रही घटनाओं पर सोच पाने के लिए समय और पैसा, दोनों ही हिंदी के पत्रकारों से ज्यादा होता है. वहीं हिंदी के पत्रकार को छह दिन दफ्तर में बैलों की तरह जोता जाता है और सातवां दिन वह हफ्ते भर के जमा कपड़े धोने में निकल जाता है

मगर हिंदी और अंग्रेजी में इतने फर्क के बावजूद भी, आज तक सभी पत्रकारों के लिए ‘समान रैंक पर समान वेतन और समान सुविधाएं’ दिए जाने को लेकर कोई लंबा आंदोलन नहीं किया गया और न ही दुनियाभर में मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले अंग्रेजी के साथी हिंदी के अपने साथियों लिए आवाज उठाने उनके साथ आए. एक ही अखबार की अंग्रेजी विंग में जा रहे रिपोर्टर ने कभी नहीं सोचा कि उसी के साथ हेल्थ बीट कवर करने वाले उसी की रैंक के हिंदीे रिपोर्टर को उससे आधा मेहनताना क्यों दिया जा रहा है? हिंदी में जब नौकरीपेशा पत्रकारों की ये हालत है आप अंदाजा लगा ही सकते हैं की 500 रुपये में रिपोर्ट लिखने वाले हिंदी के फ्रीलांसर का भूखों मर जाना तय है.

(लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं)

5 COMMENTS

  1. It is the ground reality of Hindi journalism.मिडिया का काम हर एक बुराई जो की समाज में मौजुद है उसे सब के सामने लाना है.पर जो भर्ष्टाचार मिडिया में है उसे खुद मिडिया कर्मी सामने नहीं ला पाते. अपनी जिविका पर लात मारने के लिए कोई कैसे तैयार हो सकता है भला.
    एडजस्टमेन्ट शब्द का असल प्रयोग इन्ही के द्व्ारा होता है…..

  2. इतनी परेशानियों के बावजूद वह पूरी लगन से ये काम करते हैं इनके लिए एक Salute तो बनता है

  3. हिंदी पत्रकारिता जगत की सच्ची तस्वीर पेश की है। प्रियंका साहसी और निडर पत्रकार हैं।

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