आलोचना की रस्म

0
330

cultureसन 1980 के बाद बदलते समय में साहित्य का मिजाज भी बदला है और इस बदलाव के चलते रचनाओं ने हमें आश्वस्त भी किया है क्योंकि जो अनजाने लोग थे. उनकी पहचान इस रूप में बनी है कि उनकी कलम ने दस्तक दी. यूं तो 2014 में आकर हमें मिली-जुली साहित्यक आवाजें आज भी सुनाई देती हैं जिन्होंने नए प्रतिमान गढ़े थे. यथार्थ और कला का समीचीन संगम हमारे सामने खुलता जाता है. दूधनाथ सिंह की ‘धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे’ , उदय प्रकाश की ‘तिरिछ’ और चंद्रकिशोर जायसवाल की कहानी ‘नकबेसर कागा ले भागा’ अपनी अलग-अलग छटा में हमें प्रभावित करती हैं तो उपन्यासों में डूब, सूखा बरगद, सात आसमान, कलिकथा वाया बायपास जैसे उपन्यासों को पाठकों ने पढ़ा और सराहा. एक उपन्यास ‘मुझे चांद चाहिए’ अपनी तरह का अनूठा रहा था उन दिनों से आज तक.

मेरी बात यहां आलोचना से संबंधित है, इसलिए कहना चाहूंगी कि रचना के बाद ही आलोचना की भूमिका शुरू होती है. पुराने समय से आजतक आलोचकों के नामों से बनी श्रृंखला में वे ही गण्यमान हो पाते हैं जिन्होंने रचनाओं के लिए वकील की नहीं, जज की भूमिका निभाई है. बेशक अपनी योग्यता और क्षमता के स्तर को निर्धारित किया है. साहित्य में यह मान्यता बनी हुई है कि आलोचक की कृपा पर रचना का उठना और गिरना निर्भर करता है.

मुझे साहित्य जगत में चली आ रही मान्यता पर शक होता है. ‘मुझे चांद चाहिए’ इसका अप्रतिम उदाहरण है. चांद चाहने वाली लड़की (सिलविल) वर्षा वशिष्ठ शाहजहांपुर से निकलकर दिल्ली के नाट्य विद्यालय में आती है और अभिनय की प्रतिभा पर सवार होकर मुंबई की फिल्म नगरी पर छा जाती है. वर्षा वशिष्ठ की इस कथा पर समीक्षक दांतों तले उंगली दबाकर रह गए. उनकी अब तक की प्रिय रही नायिकाओं के छक्के छूटने लगे. आलोचकों के खेमों में खलबली थी कि इस नायिका को किस खांचे में फिट बिठायें? आलोचक तो फिर आलोचक होते हैं. अपनी धुन और जिद के स्वामी, वर्षा वशिष्ठ को नकली स्त्री घोषित कर डाला. यह आलोचना की अवसन्न अवस्था थी. अपने होश में स्त्री चरित्रों को लेकर हमारे समीक्षकों को ‘मित्रो मरजानी’ की मित्रावंती याद थीं जिसने देहभाषा को साहित्य के दरमियान परिभाषित किया. ‘आपका बंटी’ की शकुन भुलाने वाली महिला नहीं है, जिसने पति से तलाक लेने की हिम्मत दिखाई.

‘चितकोबरा’ को भी याद कर लिया गया जिसके यौनिक वर्णन की चर्चा रही. हमारे मन में सवाल यह भी है कि इन नायिकाओं के आचरण को देखकर क्या समीक्षक विचलित नहीं हुए थे? बेशक विचलित हुए थे लेकिन इन्हीं नायिकाओं ने उस विचलन को संभाल लिया क्योंकि उपन्यासों में चरित्रगत विचलन से बचने बचाने की युक्तियां भी नत्थी थीं. मिसाल के तौर पर ‘मित्रो’ का अंतिम चरण में अपनी मां के यहां लौट जाता, शकुन साहिबा का अपने दूसरे विवाह के आगे कंधे डाल देना और चितकोबरा की नायिका का संबंध अपने ही पति से होना.

‘मुझे चांद चाहिए’ की वर्षा वशिष्ठ खुद को निशाने पर रखती है क्योंकि घर-परिवार और समाज की परंपराओं को धो-फींचकर घर की खपरैल पर सूखने डाल जाती है और बिन ब्याही मां बनती है. ‘उफ! चांद चाहने वाली लड़की, तू कहने के लिए नहीं करने के लिए बनी है!’ समीक्षा जगत में अंधेरा सा छा गया. लेकिन साहित्य में किसी कृति को स्थापित या विस्थापित करने के लिए माना गया आलोचक अपनी शक्ति को नापता-मांपता हुआ उठा और वर्षा वशिष्ठ को संघर्ष विहीन, रेड कारपेटिड नायिका घोषित कर डाला. अब यह अलग बात है कि समीक्षक डाल-डाल तो पाठक पात-पात.

क्रूर आलोचकीय असहमतियों के बावजूद उपन्यास के संस्करण दर संस्करण छपते चले गए. और थोड़े ही दिन बाद इसका ठीक उल्टा ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के साथ हुआ. समीक्षकों के बड़े महान तबके के हिसाब से यह उपन्यास साहित्य जगत की अपूर्व घटना थी लेकिन पाठकों ने इसका जरा-सा भी असर नहीं लिया. राजेंद्र यादव के शब्दों में यह किताब ‘पुस्तकालय संस्करण’ थी.

दो उदाहरण देकर मैं समीक्षकों की समझ पर सवाल खड़े करना नहीं चाहती बल्कि पाठकों के लिए साहित्य का क्या रूप हो या साहित्य से उनका नाता क्या है,   यह दिखाना चाहती हूं. समीक्षा के जरिए किताब आने की सूचना अवश्य मिल जाती है लेकिन वह पाठक भी पैदा करे यह जरूरी नहीं. कई बार तो लगता है कि समीक्षक अरुचिकर किताबों की ओर इशारा करता है जिससे पाठक बिदक सकता है. आलोचक की विश्वसनीयता धूमिल पड़ती है. कारण यह भी है कि वह एक ही विचारधारा से विभिन्न समुदायों और समाजों पर आलोचकीय नतीजे चस्पा करता जाता है. जबकि जरूरी यह है कि वह निष्पक्षता के साथ रचना में आए संदर्भों के बीच से कुछ गुणात्मक खोजने-तलाशने का दायित्व निभाए. और ऐसा हुआ भी है कि रचना को अपने खारिजनामें के बाद कोई सुधी समीक्षक मिला है, जिसने अपनी तर्कबुद्धि से वहां सार्थकता सिद्ध की है. महाश्वेता देवी के लेखन के साथ ऐसा ही गुजरा जब मान्यवर समीक्षकों ने चुप्पी साध ली थी.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here