गूगल: सबका मालिक एक

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इसका मतलब यह है कि अभी हमारी दुनिया पर गूगल का जो असर है वह सिर्फ एक झलक है. आज इंटरनेट कंप्यूटरों का नेटवर्क है, लेकिन भविष्य में यह टीवी, फ्रिज, कार, रोबोट और ऐसी तमाम दूसरी मशीनों से मिलकर बना नेटवर्क होगा जिसकी विराटता और ताकत आज से कहीं ज्यादा होगी. एंड्रॉयड टीवी, फ्रिज, वाशिंग मशीन या वैक्यूम क्लीनर अभी आम भले ही न हों, लेकिन आ चुके हैं. आप कहीं भी हों, इन्हें अपनी मर्जी से नियंत्रित कर सकते हैं.

जानकार मानते हैं कि इस सुविधा का फायदा हमसे कहीं ज्यादा गूगल को होगा और यह दोहरा होगा. एक तरफ उसके पास कंप्यूटर या फोन से इतर दूसरे स्रोतों से भी सूचनाएं आएंगी. दूसरी तरफ इन सूचनाओं से कमाई करने के लिए उसके पास मोबाइल और लैपटॉप के अलावा आपके टीवी, फ्रिज और दूसरे कई ऐसे ही माध्यम और होंगे. आज गूगल के कारोबार का ज्यादातर हिस्सा इंटरनेट पर सर्च के बूते आता है. लेकिन भविष्य में आपका एंड्रॉयड फ्रिज उसे यह बताएगा कि आप किस ब्रांड का जूस पसंद करते हैं. एंड्रॉयड टीवी के जरिये उसे यह पता लग जाएगा कि आप किस समय अपने टीवी पर क्या देखते हैं. इसके बाद वह अलग-अलग कारोबारियों को आपके खाने-पीने और मनोरंजन की आदतों के बारे में बताएगा. वह यह भी बताएगा कि आपको किस वक्त किस चीज की जरूरत है और आप तक किस चैनल के माध्यम से कब और कौन से विज्ञापन पहुंचाए जाने चाहिए. इसी तरह ड्राइवर विहीन कार बनाने में उसकी दिलचस्पी इसलिए भी है कि कार अपने आप चलती रहे, आप गूगल की सर्च या किसी और सेवा के साथ व्यस्त रहें और गूगल को आपकी पल-पल की खबर मिलती रहे.

इस तरह से देखें तो आखिर में गूगल की हर नई कवायद का मकसद वही है जो उसका पिछले 16 साल के दौरान रहा है–हमारे बारे में ज्यादा से ज्यादा सूचनाएं जुटाना और उनके बल पर अपना बल बढ़ाना.

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Chick to Lagra

जिस रफ्तार से गूगल बढ़ा है उसे कायम रखने के लिए यह भी जरूरी है कि वह दुनिया की बाकी दो तिहाई आबादी तक भी तेजी से पहुंचे. इसके लिए सबसे पहले तो उसे उस आबादी तक इंटरनेट पहुंचाने की जरूरत होगी. इसका इंतजाम भी वह कर रहा है. गूगल लून प्रोजेक्ट के तहत उसकी ऐसे गुब्बारे छोड़ने की योजना है जो दुर्गम से दुर्गम इलाकों में भी इंटरनेट उपलब्ध कराएंगे. धरती से 20 किलोमीटर ऊपर रहने वाले इन गुब्बारों में लगे उपकरण करीब 1250 वर्ग किलोमीटर इलाके में इंटरनेट की सुविधा पहुंचाएंगे. इसके सफल प्रयोग के तौर पर बीते साल न्यूजीलैंड में हीलियम भरे गुब्बारों की मदद से 50 घरों को इंटरनेट से जोड़ा भी जा चुका है. करीब 50 मीटर व्यास के इन गुब्बारों में सोलर पैनल लगा होता है जिससे मिलने वाली ऊर्जा से इनके उपकरण चलते हैं. यानी आज भले ही इंटरनेट विशेषाधिकार लगता हो, लेकिन भविष्य में यह बुनियादी सुविधा हो जाएगी. दूसरे शब्दों में कहें तो हमारी जिंदगी आज की तुलना में कहीं ज्यादा गूगल पर निर्भर हो जाएगी.

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सेवा

अब गूगल की हो चुकी बोस्टन डायनेमिक्स को रोबोटिक्स के क्षेत्र में अपने असाधारण काम के लिए जाना जाता है. इस कंपनी ने अमेरिकी सेना के लिए बिग डॉग जैसा रोबोट बनाया है जो 150 किलो तक वजन लादकर किसी खच्चर की तरह उन रास्तों पर भी चल सकता है जिन पर पहियों वाला कोई वाहन नहीं चल सकता. इसी तरह एटलस जैसे उसके रोबोटों के बारे में माना जा रहा है कि भविष्य में वे खाना बनाने या घर की सफाई करने जैसे तमाम काम करेंगे. यानी ऑनलाइन और ऑफलाइन, दोनों ठिकानों पर गूगल का पूरा राज होगा.

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लेकिन हर देवता की तरह गूगल की कहानी में भी एक तरफ स्तुतियां हैं तो दूसरी तरफ आलोचनाएं भी हैं. एक बड़े वर्ग की शिकायत है कि गूगल हमारी याद्दाश्त खा रहा है. कई अध्ययन भी बता रहे हैं कि लोग गूगल को अपने मेमोरी बैंक की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं. उनके लिए पहले से कुछ जानना जरूरी नहीं है. उन्हें पता है कि की बोर्ड पर टाइप करना है और सारी जानकारी हाजिर हो जाएगी. और यह सिर्फ स्मृति की बात नहीं है. ज्ञान की यह सर्वसुलभता एक सीमा के बाद ज्ञान के लिए ही घातक हुई जा रही है. जैसा कि अपने एक लेख में वरिष्ठ पत्रकार प्रियदर्शन कहते हैं, ‘चूंकि पहले से कुछ भी जानना जरूरी नहीं रह गया है, इसलिए सोचना और विचार करना, उद्वेलित होना और प्रश्न खड़े करना भी छूट गया है. अब बने-बनाए प्रश्न हैं जिनके बने-बनाए उत्तर हैं.’

हवाई जहाज और कार जैसे आविष्कार जब हुए थे तो कहा गया था कि इनके इस्तेमाल से बचने वाला समय मनुष्य अपने आप को सांस्कृतिक रूप से समृद्ध करने में लगाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इन साधनों का उपयोग करने वाले वर्ग के पास समय की और भी कमी रहने लगी. ज्ञानरूपी महासागर की सर्वसुलभता को लेकर भी इस तरह की आशंका जताई जा रही है.

हालांकि दूसरा वर्ग ऐसी आशंकाओं को खारिज करता है. उसका मानना है कि तकनीक पर निर्भरता से पनप रहे इस तरह के डर निर्मूल हैं. इस वर्ग के लोग मानते हैं कि ऐसा ही डर तब भी जताया गया होगा जब भाषा लिखी जाने लगी. उससे पहले तक ज्ञान का विस्तार मौखिक रूप से ही हो रहा था तो कहा गया होगा कि लिखकर सुरक्षित कर लेने से याद रखने की जरूरत खत्म हो जाएगी और इस तरह सोचना और विचारना भी कम हो जाएगा. प्रिटिंग प्रेस के अविष्कार के बाद तो यह तर्क और भी बढ़ाचढाकर दिया गया होगा. लेकिन इसके बाद भी ज्ञान की नई-नई शाखाएं सिरजती प्रतिभाएं दुनिया का नक्शा बदलती रहीं.

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गूगल का हमारे दिमाग पर क्या असर हो रहा है, इसे लेकर कोलंबिया विश्वविद्यालय ने कुछ समय पहले एक अध्ययन किया था. यह दूसरे वर्ग की बात का समर्थन करता दिखता है. इस अध्ययन का निष्कर्ष यह निकला कि दिमाग जरूरत के हिसाब से अनुकूलन कर लेता है. यानी गूगल इस्तेमाल करने वालों का दिमाग जानकारी की बजाय यह याद रखने लगता है कि उस जानकारी तक पहुंचना कैसे है औ उसे इस्तेमाल कैसे करना है. अध्ययनकर्ताओं को यह भी पता चला कि जो जानकारी गूगल पर उपलब्ध नहीं है, दिमाग द्वारा उसे याद रखने की संभावना भी ज्यादा है.

लेकिन सूचना की इस सुलभता से पैदा होने वाले सवाल यहीं खत्म नहीं होते. कहा जा रहा है कि गूगल-इफेक्ट की जद में आए लोगों में आपसी संवाद और भरोसा कम हो रहा है. वे अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और यहां तक कि डॉक्टर से भी ज्यादा भरोसा गूगल से मिलने वाली जानकारियों पर कर रहे हैं. जैसा कि कुछ समय पहले अखबार द हिंदू में प्रकाशित अपने एक लेख में डॉ टी रामाप्रसाद बताते हैं. तमिलनाडु के इरोड जिले में प्रैक्टिस करने वाले डॉ रामाप्रसाद के पास एक मरीज आया. उसे कुछ समय से बुखार और खांसी की शिकायत थी. चेकअप और कुछ परीक्षणों के बाद डॉक्टर ने उसे बताया कि उसे फेफड़ों की टीबी है. इसके बाद उन्होंने उसे कुछ दवाइयां दे दीं. लेकिन उस मरीज ने दवाइयां नहीं लीं. एक हफ्ते बाद वह डॉक्टर के पास वापस आया. इस दौरान उसने गूगल की मदद से फेफड़ों की टीबी पर काफी रिसर्च कर ली थी. उसने डॉक्टर से कहा कि उन्हें टीबी की पुष्टि के लिए और भी टेस्ट करने चाहिए. डॉक्टर रामाप्रसाद के मुताबिक उन्होंने मरीज को काफी समझाया कि उनका अनुभव उन्हें बता रहा है कि उसे टीबी ही है और जिन परीक्षणों की वह बात कर रहा है उन्हें हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने गैरजरूरी बताया है. लेकिन वह मानने को तैयार नहीं था. इस चक्कर में कई दिन और निकल गए. इस दौरान उसकी हालत बिगड़ती चली गई और आखिर में उसे आईसीयू में भर्ती होना पड़ा.

गूगल की इस विराटता को लेकर और भी कई विवाद हैं. गूगल ग्लास को ही लें. चश्मे की तरह पहनी जाने वाली इस डिवाइस का प्रायोगिक इस्तेमाल शुरू हो गया है. स्मार्टफोन अगर कंप्यूटर को आपकी जेब में ले आया था तो गूगल ग्लास उसे आपके चश्मे में ले आया है. इसकी स्क्रीन आपको दायीं आंख के सामने दिखती रहेगी. आपके हुक्म की तामील यह आपकी आवाज सुनकर यानी वॉयस कंट्रोल के जरिये करेगी. अब आप सर्च करें, फोटो खींचें, वीडियो बनाएं या फिर उन्हें पोस्ट करें, बस बोलने की देर है. यानी दुनिया हर दम आपकी नजर में है.

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स्वास्थ्य

2013 में गूगल ने कैलिको नाम की कंपनी खोलने की घोषणा की. गूगल के सहसंस्थापक लैरी पेज ने कहा कि इसका मकसद यह पता लगाना है कि बुढ़ापे को जितना हो सके टालकर व्यक्ति को दीर्घायु कैसे बनाया जा सकता है. गूगल के लिए यह कवायद कितनी अहमियत रखती है इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि कैलिको का मुखिया एप्पल के चेयरमैन ऑर्थर लेविंसन को बनाया गया. ज्ञान, आवागमन, सेवा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में गूगल की तैयारी बता देती है कि दुनिया पर उसका कब्जा लगातार बढ़ने वाला है.

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googlerobotदिक्कत यही है. जानकारों के मुताबिक हर समय इंटरनेट की सुलभता ने पहले ही अटेंशन डेफिसिट सिंड्रोम यानी एकाग्रता की कमी जैसी समस्या पैदा कर दी है. गूगल ग्लास इसमें बढ़ोतरी ही करेगा. आप गूगल ग्लास पहने किसी व्यक्ति से बात कर रहे हों तो आपके लिए अंदाजा लगाना मुश्किल होगा कि उसका ध्यान पूरी तरह से आपकी बात पर है भी या नहीं. हो सकता है कि वह आपकी बात पर सिर हिला रहा हो और ध्यान फेसबुक पर लगाए हुए हो.

मुश्किल यही नहीं है. एक वर्ग है जिसका मानना है कि गूगल ग्लास के बाद निजता यानी प्राइवेसी में दखल की समस्या कई गुना बढ़ जाएगी क्योंकि आपको पता ही नहीं चलेगा कि आपकी फोटो ली जा रही है या आपका वीडियो रिकॉर्ड हो रहा है. हालांकि कई लोगों का मानना है कि गूगल ग्लास के आम होने के बाद कई जगहों पर इसे प्रतिबंधित भी किया जा सकता है, जैसे मोबाइल और कैमरे के मामले में होता है. लेकिन तब क्या होगा जब यह नजर के चश्मे का भी काम कर रहा हो?

सवाल डेटा के इस्तेमाल का भी है. माना जाता है कि सर्च, क्रोम, जीमेल, यूट्यूब, पिकासा और ऐसी तमाम सेवाओं के चलते गूगल के पास व्यक्तिगत जानकारियों का सबसे बड़ा भंडार है जिसका इस्तेमाल वह अपने कारोबार में करता है. लेकिन ऐसा वह कैसे करता है यह साफ नहीं है. यह डेटा गलत हाथ में न जाए, इसे लेकर उसकी नीति भी ठीक से स्पष्ट नहीं है.

ऐसे लोगों को गूगल का जवाब होता है कि वह यूजर की इजाजत के बिना न तो उससे जुड़ी व्यक्तिगत जानकारी इकट्ठा करता है और न ही उसे बेचता है. लेकिन यह भी उतना ही सच है कि गूगल की अलग-अलग सेवाओं का इस्तेमाल करने वाले लोग इस्तेमाल के वक्त नियम-कायदों के एक बड़े पहाड़ के आखिर में आने वाले ‘आई एग्री’ नाम के ऑइकन को बिना ज्यादा दिमाग लगाए क्लिक कर देते हैं. वैसे भी व्यक्तिगत जानकारी एक ऐसी चीज है जिसकी कोई सर्वमान्य परिभाषा अभी तक नहीं बन पाई है.

तो ऐसे कई सवाल हैं जिनका ठीक-ठीक जवाब भविष्य ही दे सकता है. संभावित जवाब जानना चाहें तो आप बेशक गूगल सर्च कर सकते हैं.

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