खंडित ठगी

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समय के इस टुकड़े के गुजर जाने के बाद ‘शंघाई’ आई. ‘एक थी डायन’ आई. ‘घनचक्कर’ आई. करोड़ों रुपये साथ नहीं लाई इसलिए हाशमी को उसी रूप में लौटा लाई जो बिकता है. राजा नटवरलाल में वही हाशमी हैं, ‘मर्डर’ से लेकर ‘जन्नत 2’ वाले, बस आत्मविश्वास से लबरेज हैं और अभिनय सीख चुके हैं. उनकी सिग्नेचर सिनेमाई हरकतें अभी भी वैसी ही हैं. बैकग्राउंड में बज रहे सूफी गीत को चलती बस में आराम से बैठे होने के बावजूद तपाक से खड़े होकर बीच में ही पकड़ लेने के बाद उस गीत को लिप-सिंक करते हुए बस में टहलने की प्रतिभा पुरानी वाली ही है. और अभी तक राजा नटवरलाल फिल्म के बारे में एक भी पंक्ति नहीं लिखने की वजह भी पुरानी वाली ही है. फिल्म पुरानी है. इसका समय पुराना है. और इसकी ठगी में न ‘ब्लफ मास्टर’ हो जाने के गुण हैं, न ‘स्पेशल छब्बीस’.

विलेन केके को एक ऐसी आईपीएल-प्रेरित क्रिकेट टीम, जो है ही नहीं, बेचने निकली यह फिल्म अगर समझदार होती तो अपनी ठगी में लगने वाली तैयारियों और अक्ल से उत्सुकता जगाते हुए पूरी फिल्म के दौरान रोमांचित कर सकती थी. लेकिन इसके लिए उसे प्यार, यार और परिवार के आस-पास घूमते सिनेमाई इमोशन्स को तजना होता और चूंकि कारोबार करना ही एक फिल्म का इन दिनों काम है तो वह ऐसा कुछ नहीं करती. वह जिस जगह पर अपना मंकी-कैप उतारकर असल चेहरा दिखाती है, क्षणिक मजा तो आता है, लेकिन आंखें जो फटनी चाहिए, और फिल्म की चालाकी पर फिदा होते हुए एक छोटी-सी तारीफ लिपटी हंसी जो निकलनी चाहिए, नहीं निकलती.

मटर के दानों को चना समझकर दर्शकों को चबाने को कहना ही अगर फिल्म की ठगी है, तो यह खंडित ठगी है, दिल को न अच्छी लगी है.

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