फेमिनिज्म का फैशन बन जाना

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तो क्या कुल मिलाकर इस नारीवाद की नजर में सिर्फ दो बड़े अपराध हैं? एक- जिसमें उसके अपने से नीचे स्तर का पुरुष जाति और वर्ग की सीमा-रेखा पारकर उसके शरीर की अवहेलना करता है, और दो- जिसमें उसके अपने वर्ग या जात का पुरुष उसके प्रति उदासीन है. यानी ‘बराबरी, न्याय और आजादी’ के सार्वभौमिक सिद्धांत के बजाय वर्ग हित के दायरे में सार्वभौमिकता खोजना. ये संकुचित संवेदनशीलता 80 प्रतिशत का हाशिया बना देती है! कमाल! और मीडिया-न्यायपालिका में बैठे इनके मर्द उस पर ‘आम-सहमति’ का ठप्पा लगवा लाते हैं.

दुनिया की आधी आबादी को पॉलिटिकल-इकोनॉमी की बहस से बाहर रखने में महिला पत्रिकाओं की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है. ये पत्रिकाएं ही तो हैं जो सलाद से लेकर सालसा तक सिखा रही हैं

यानी पुलिस-सेना द्वारा किया गया गैंग-रेप, हत्या क्यूंकि कमजोरों, वंचितों और अल्पसंख्यकों के साथ होता है इसलिए उस पर दिल्ली में आंदोलन नहीं होता, गाँव-कस्बों में ऊंची जात के पुरुषों द्वारा दलित महिला पर जघन्य हिंसा पर दिल्ली में आंदोलन नहीं होता, मुस्लमान-सिख-ईसाई महिला के साथ हिन्दू पुरुष-पुलिस-सेना द्वारा जो गैंग रेप-हत्या होती है उस पर आंदोलन नहीं होता. कुल मिला के सत्तासीन वर्ग की महिलाओं के पास उपलब्ध मंच-मीडिया-मूवमेंट बहुत संकुचित भागीदारी कर रहा है जिसकी दृष्टि में 70-80 प्रतिशत जनसंख्या के प्रति होनेवाले अपराध मायने नहीं रखते.  सार्वजानिक क्षेत्र में वंचितों को अवसर और प्रतिनिधितव के सवाल तो खैर शान्ति-कालीन एजेंडे में ही हो सकते हैं , जिन पर अभी क्या बात करें? लेकिन दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों के साथ घटित होती, आंखें पथरा देनेवाली, दिल दहला देनेवाली हिंसा की कहानियां तक इस वर्चस्ववादी नारीवाद को छू नहीं पातीं?

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इस सीमित नजर के नारीवाद के पास एक बड़ी पैदल सेना है जो युवा है, और मीडिया में जिसका हस्तक्षेप है, ये किसी भी फालतू पर नई सी लगनेवाली बात को ‘ट्रेंड’ करवा सकती है और ट्विटर से प्राइम-टाइम तक पहुंचा सकती है. लेकिन जिसके पास ये समझ नहीं है की साम्यवादी या दलित आंदोलन की ही तरह नारीवाद भी एक थ्योरेटिकल अनुशासन के तकाजों से बंधा है. ‘बराबरी, न्याय और आज़ादी’ के सार्वभौमिक सिद्धांत के बाहर जाते ही नारीवाद वो आत्म-केंद्रित विलास बन जाता है जिसका ऊपर जिक्र किया गया है. इंजीनियरिंग, आई-टी, मार्केटिंग, मास-कॉम की डिग्रियों से लैस, इस पैदल सेना को नहीं पता, की भारत में जातिवादी-हिंदुत्व द्वारा महिलाओं के साथ हुई बर्बरियत को केवल नारीवादी चश्मे से देखकर उसे समस्या न मानना, उसे महिला-आयोग की बेअसर रिकॉर्ड बुक तक सीमित कर देना है. और पूंजीवाद की सेवा में समर्पित राष्ट्र-राज्य के लिए इससे सुखद स्थिति और क्या होगी? मसलन, मलाला बनाम तालिबान मामले ही को देखें. जिसमे मलाला और तालिबान पर बात करनेवाले भूल गए की इन दोनों की डोर पूंजीवाद के हाथ में है, और पूंजीवाद के लिए ये दोनों स्क्रिप्ट की जरूरत हैं. इस पैदल सेना के पास सैद्धांतिक समझ की कमी ही वो कारण है जिसके चलते नारीवाद एक फैशन में तबदील हुआ जा रहा है.

अभी बीते 08 मार्च, यानी महिला दिवस पर कार्लरुहे, जर्मनी से एलोने नमक 2० साला युवती ने कुछ प्रचलित नारीवादी स्लोगन की पर्चियां माहवारी वाले नैपकिन्स पर चिपकाईं और 10 मार्च को ही भारत में नारीवाद को ‘अगले चरण’ में पहुंचा दिया. पुरुष माहवारी से नफरत न करें और उसके प्रति संवेदनशील हो जाएं. ठीक! लेकिन इस संवेदनशीलता की असलियत अगले ही हफ्ते कुंवारी-कन्या जिमाने में सामने आ गयी और सैद्धांतिक समझ से खाली इस पैदल सेना को ये सूझा ही नहीं की ‘कौमार्य’ का उत्सव असल में उनकी उस प्रिय ढाई-मिनट की वीडियो और ‘माहवारी-संवेदनशीलता’ के घनघोर विरोध में है. मीडिया में कन्या जिमाने की तस्वीरें जोश के साथ लगाई गईं पैदल सेना ‘लाइक’ और कॉमेंट करती रही. उन्हें नहीं पता चलता की ढाई मिनट के विज्ञापन वीडियो का निर्माण उस मीडिया ने किया जो महिलाओं को पुरुषों के लिए तैयार होना सिखाती रही है, और जिसकी अदाकारा गोरेपन की क्रीम बेचती रही है. दुनिया की आधी आबादी को पॉलिटिकल-इकोनॉमी की डिबेट से बाहर रखना, महिला पत्रिकाओं के सहयोग से ही जारी है. ये महिला पत्रिकाएं ही तो हैं जो सलाद से लेकर सालसा तक सिखाती हैं लेकिन इस बहस में कभी नहीं घुसतीं की दुनिया में संसाधन किस तरह बराबरी से बांटे जाएं. यानी नारीवाद ने वो बुनियादी मसले हल कर लिए हैं हॉलीवुड फिल्मों की तरह.

2 COMMENTS

  1. Bilkul sahee…aur Sateek….Punjivad ab logon ko vyapak tour par arajnaitik bana daalne kee saazishon main mubtila hai…..

  2. आर्टिकल तो अच्छा है मदाम, मगर शेयर पे क्लिक करते ही “सेक्स टॉय” के ऐड का पेज खुलता है क्या करें ?
    कोई हल सुझाईये……..!

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