शहर और गांव | Tehelka Hindi

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शहर और गांव

विकास के दावों के दौर में स्मार्ट सिटी और ई-ग्राम की चर्चा आम हो चुकी है, हालांकि महात्मा गांधी आरंभ से ही इस बात पर जोर देते रहे थे कि भारत के गांवों में ग्राम पंचायतों को पुनर्जीवन प्रदान करके देश में ग्राम स्वराज्य की स्थापना की जाए. उनका दृढ़ विश्वास था कि जब तक भारत के लाखों गांव स्वतंत्र, शक्तिशाली और स्वावलंबी बनकर उसके संपूर्ण जीवन में भाग नहीं लेते तब तक भारत का भविष्य उज्ज्वल नहीं हो सकता. गांधी जयंती पर उनकी पुस्तक 'ग्राम स्वराज्य' का अंश

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आज संसार में दो प्रकार की विचारधाराएं प्रचलित हैं. एक विचारधारा जगत को शहरों में बांटना चाहती है और दूसरी उसे गांवों में बांटना चाहती है. गांवों की सभ्यता और शहरों की सभ्यता दोनों एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं. शहरों की सभ्यता यंत्रों पर और उद्योगीकरण पर निर्भर करती है और गांवों की सभ्यता हाथ-उद्योगों पर निर्भर करती है. हमने दूसरी सभ्यता को पसंद किया है.

आखिर में, तुलनात्मक दृष्टि से देखा जाए तो इस उद्योगीकरण और बड़े पैमाने पर माल उत्पन्न करने की पद्धति का जन्म कुछ ही समय पहले हुआ है. हम यह तो नहीं जानते कि इन चीजों ने हमारे सुख को कहां तक बढ़ाया है लेकिन इतना हम जरूर जानते हैं कि उन्होंने इस जमाने के विश्वयुद्धों को जन्म दिया है. दूसरे विश्वयुद्ध का अभी अंत भी नहीं हुआ है; और अगर उसका अंत आ भी जाए तो हम तीसरे विश्वयुद्ध की बाते सुन रहे हैं. हमारा देश आज जितना दुखी है उतना पहले कभी नहीं था. शहर के लोगों को अच्छा मुनाफा और अच्छी तनख्वाहें मिलती होंगी लेकिन यह सब गांवों का खून चूसकर उन्हें खोखला बना देने से ही संभव हुआ है. हम लाखों और करोड़ों की संपत्ति इकट्ठी नहीं करना चाहते. हम अपने काम के लिए हमेशा पैसे पर निर्भर नहीं रहना चाहते. अगर हम अपने ध्येय के लिए प्राणों का बलिदान देने के लिए तैयार हों तो फिर पैसे का कोई महत्व नहीं रह जाता. हमें अपने काम में श्रद्धा रखनी चाहिए और अपने प्रति सच्चे रहना चाहिए. अगर हममें ये दो गुण हों तो हम अपनी 30 लाख रुपये की पूंजी को इस तरह गांवों में फैला सकेंगे कि उससे 300 करोड़ रुपये की राष्ट्रीय संपत्ति पैदा हो जाए. यह मुख्य ध्येय सिद्ध करने के लिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अपने गांवों को स्वयंपूर्ण और आत्मनिर्भर बना दें लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि स्वयंपूर्णता का मेरा विचार संकुचित नहीं है. मेरी स्वयंपूर्णता में अहंकार के लिए कोई स्थान नहीं है.

भारत के शहरों में जो धन दिखाई देता है, उससे हमें धोखे में नहीं पड़ना चाहिए. वह धन इंग्लैंड या अमेरिका से नहीं आता. वह देश के गरीब से गरीब लोगों के खून से आता है. कहा जाता है कि भारत में सात लाख गांव हैं. उनमें से कुछ गांव तो इस धरती पर से बिलकुल मिट चुके हैं. बंगाल, कर्नाटक और देश के अन्य भागों में जो हजारों आदमी भुखमरी और रोगों के कारण मृत्यु के शिकार हो गए हैं, उनका कोई लेखा किसी के पास नहीं है. सरकारी रजिस्टर इस बात की कोई कल्पना हमें नहीं करा सकते कि हमारे ग्रामवासी आज किन मुसीबतों मे से गुजर रहे हैं. लेकिन मैं खुद गांव में रहता हूं इसलिए मैं गांवों की दुर्दशा को जानता हूं. मैं गांव के अर्थशास्त्र को जानता हूं. मैं आपसे कहता हूं कि ऊंचे कहे जाने वाले लोगों का बोझ नीचे के लोगों को कुचल रहा है. आज जरूरत इस बात की है कि ऊपर के लोग नीचे दबने वाले लोगों की पीठ पर से उतर जाएं.

बम्बई की मिलों में जो मजदूर काम करते हैं, वे गुलाम बन गए हैं. जो स्त्रियां उनमें काम करती हैं, उनकी हालत को देखकर कोई भी कांप उठेगा. जब मिलों की वर्षा नहीं हुई थी तब वे स्त्रियां भूखों नहीं मरती थीं. मशीनों की यह हवा अगर ज्यादा चली तो हिन्दुुस्तान की दुर्दशा होगी. मेरी बात कुछ मुश्किल मालूम होती होगी लेकिन मुझे कहना चाहिए कि हम हिन्दुुस्तान में मिलें कायम करें, उसके बजाय हमारा भला इसी में है कि हम मैन्चेस्टर को अधिक रुपये भेजकर उसका सड़ा कपड़ा इस्तेमाल करें. क्योंकि उसका कपड़ा इस्तेमाल करने से सिर्फ हमारे पैसे ही जाएंगे. हिन्दुुस्तान में अगर हम मैन्चेस्टर कायम करेंगे तो पैसा हिन्दुुस्तान में ही रहेगा लेकिन वह पैसा हमारा खून चूसेगा, क्योंकि वह हमारी नीति को बिलकुल खत्म कर देगा. जो लोग मिलों में काम करते हैं उनकी नीति कैसी है, यह उन्हीं से पूछा जाए.  उनमें से जिन्होंने रुपये जमा किए हैं, उनकी नीति दूसरे पैसे वालों से अच्छी नहीं हो सकती. अमेरिका के रॉकफेलरों से हिंदुस्तान के रॉकफेलर कुछ कम हैं, ऐसा मानना निरा अज्ञान है. गरीब हिंदुस्तान तो गुलामी से छूट सकेगा लेकिन अनीति से पैसे वाला बना हुआ हिंदुस्तान गुलामी से कभी नहीं छूटेगा.

मुझे तो लगता है कि हमें यह स्वीकार करना होगा कि अंग्रेजी राज्य को यहां टिकाये रखने वाले ये धनवान लोग ही हैं. ऐसी स्थिति में उनका स्वार्थ सधेगा. पैसा आदमी को दीन बना देता है. ऐसी दूसरी वस्तु दुनिया में विषय भोग है. ये दोनों विषय विषमय है. उनका डंक सांप के डंक से भी बुरा है. जब सांप काटता है तो हमारा शरीर लेकर हमें छोड़ देता है. जब पैसा या विषय काटता है तो वह देह, ज्ञान, मन सब कुछ ले लेता है, तो भी हमारा छुटकारा नहीं होता. इसलिए हमारे देश में मिलें कायम हों, इसमें खुश होने जैसा कुछ नहीं है.

विदेशी नौकरशाही और देश के रहने वाले शहरी लोग गांव के गरीबों का शोषण करते हैं. गांव वाले अन्न पैदा करते हैं और खुद भूखों मरते हैं. वे दूध पैदा करते हैं और उनके बच्चों को दूध की एक बूंद भी मयस्सर नहीं होती. यह कितना शर्मनाक है. हर एक को पौष्टिक भोजन, रहने के लिए उम्दा मकान, बच्चों की शिक्षा के लिए हर तरह की सुविधा और दवा दारू की मदद मिलनी चाहिए. आज के मुट्ठीभर शहर भारत के अनावश्यक अंग हैं और केवल देहातों का जीवन रक्त चूसने के मलिन हेतु के लिए ही है… अपने उद्धततापूर्ण अन्यायों और अत्याचारों के कारण गांवों के जीवन और स्वतंत्रता के लिए हमेशा खतरा बने रहते हैं. सारी दुनिया में युद्ध के लिए शहरी लोग ही जिम्मेदार हैं, देहाती हरगिज नहीं.

मेरी निगाह में शहरों की वृद्धि एक बुरी चीज है. यह मनुष्य जाति का और दुनिया का दुर्भाग्य है, इंग्लैंड का दुर्भाग्य है और हिंदुस्तान का दुर्भाग्य तो है ही, क्योंकि अंग्रेजों ने हिंदुस्तान को उसके शहरों द्वारा ही चूसा है. शहरों ने गांवों को चूसा है. गांव का खून वह सीमेंट है, जिससे शहरों की बड़ी बड़ी इमारतें बनी हैं. मैं चाहता हूं कि जिस खून ने आज शहरों की नाड़ियों को फुला रखा है, वह फिर से गांवों की नाड़ियों में बहने लगे.

शहर भारत की जनसंख्या पर उठे हुए फोड़े-फुंसी हैं और अगर आप किसी डॉक्टर से पूछेंगे, तो वह आपको फोड़े का इलाज यही बतायेगा कि उसे चीरकर अथवा पलस्तर और पुल्टिस बांधकर अच्छा करना होगा. एडवर्ड कारपेंटर ने सभ्यता को एक रोग कहा है, जिसका इलाज होना चाहिए. बहुत बड़े-बड़े शहरों का होना इस रोग का एक लक्षण मात्र है; कुदरती उपचार में मानने वाले के नाते मैं तो यही कहूंगा कि प्रचलित व्यवस्था को पूरी तरह शुद्ध किया जाए और इस तरह कुदरती तौर पर उसका इलाज हो. अगर शहरवालों के दिल में गांव जमे रहे और वे गांव की दृष्टि अपना लें तो बाकी चीजें सब अपने आप ही हो जाएंगी और फोड़ा जल्दी ही बैठ जाएगा. मेरा विश्वास रहा है और मैंने इस बात को असंख्य बार दोहराया है कि भारत अपने कुछ शहरों में नहीं बल्कि सात लाख गांवों में बसा हुआ है लेकिन हम शहरवासियों का ख्याल है कि भारत शहरों में ही है और गांवों का निर्माण शहरों की जरूरतें पूरी करने के लिए ही हुआ है. हमने कभी यह सोचने की तकलीफ ही नहीं उठाई कि उन गरीबों को पेट भरने जितना अन्न और शरीर ढकने जितना कपड़ा मिलता है या नहीं और धूप तथा वर्षा से बचने के लिए उनके सिर पर छप्पर है या नहीं.

मैंने पाया है कि शहरवासियों ने आमतौर पर ग्रामवासियों का शोषण किया है. सच तो यह है कि वे गरीब ग्रामवासियों की ही मेहनत पर जीते हैं. भारत के निवासियों की हालत पर कई ब्रिटिश अधिकारियों ने बहुत कुछ लिखा है. जहां तक मैं जानता हूं, किसी ने यह नहीं कहा है कि भारतीय ग्रामवासियों को भरपेट अन्न मिलता है. उल्टे, उन्होंने यह स्वीकार किया है कि अधिकांश आबादी लगभग भुखमरी की हालत में रहती है, दस प्रतिशत अधभूखी रहती है और लाखों लोग चुटकीभर नमक और मिर्च के साथ मशीन का पालिश किया हुआ निःसत्व चावल या रूखा सूखा अनाज खाकर अपना गुजारा चलाते हैं.

आप विश्वास कीजिए यदि वैसे भोजन पर हम लोगों में से किसी को रहने के लिए कहा जाए, तो हम एक माह से ज्यादा जीने की आशा नहीं कर सकते, या फिर हमें यह डर रहेगा कि ऐसा भोजन खाने से कहीं हमारी दिमागी शक्तियां नष्ट न हो जाएं. लेकिन हमारे ग्रामवासियों को तो इस हालत में से रोज-रोज गुजरना पड़ता है.

हमारी आबादी का पचहत्तर प्रतिशत से अधिक भाग कृषिजीवी है लेकिन यदि हम उनसे उनकी मेहतन का सारा फल खुद छीन लें या दूसरों को छीन लेने दें, तो यह नहीं कहा जा सकता है हममें स्वराज्य की भावना काफी मात्रा में है.

शहर अपनी रक्षा आप कर सकते हैं. हमें तो अपना ध्यान गांवों की ओर लगाना चाहिए. हमें गांवों को उनकी संकुचित दृष्टि, उनके पूर्वग्रहों और वहमों आदि से मुक्त करना है और यह सब करने का इसके सिवा कोई तरीका नहीं है कि हम उनके साथ, उनके बीच में रहें, उनके सुख-दुख में हिस्सा लें और उनमें शिक्षा तथा उपयोगी ज्ञान का प्रचार करें.

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