एकला चलो रे…

1
103

माकपा में बहुत सारे लोग चुनाव के मद्देनजर कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने के पक्ष में हो सकते हैंै. बंगाल की पार्टी इकाई पिछले चुनाव में पराजय के बाद कांग्रेस के साथ गठजोड़ करने में दिलचस्पी दिखा रही है. येचुरी के लिए यह अकेले रस्सी पर चलने जैसा होगा. पश्चिम बंगाल में अगर पार्टी कांग्रेस के साथ गठजोड़ कर पाने में किसी वजह से सक्षम नहीं होती है तो यह तय है कि केरल इकाई को इससे चिढ़ मचेगी और उसे प्रतिरोध का मौका देने जैसा होगा. केरल माकपा की सबसे पुरानी इकाई है.

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस का साथ !

गौरतलब है कि माकपा ने 2004 में केंद्र में कांग्रेस की नेतृत्ववाली यूपीए सरकार को समर्थन दिया था. अगर पार्टी केरल और पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा लेती है और केंद्र में कांग्रेस को समर्थन देती है तो फिर यह सवाल बहुत लोगों के मन में उठ सकता है कि फिर समर्थन के उन्हीं तर्कों के साथ बंगाल चुनाव में इस बार पार्टी कांग्रेस के साथ गठजोड़ क्यों नहीं कर सकती है? लेकिन येचुरी, सुरजीत नहीं हैं और ज्योति बसु जैसे लोग अब जिंदा नहीं हैं जो अपनी कुशाग्र और व्यावहारिक बुद्घि के बल पर पार्टी को केंद्र में बनाए रख पाने में सक्षम थे और अब उनकी प्रतिकृति तैयार कर पाना भी आसान नहीं है.

भूमि अधिग्रहण विधेयक का विरोध करने के लिए विपक्ष को एक करना बहुत जरूरी होगा. अधिग्रहण के मसले पर राज्यसभा में सीताराम येचुरी को विरोध का परचम लहराने के लिए कांग्रेस और दूसरी बुर्जुआ पार्टी को अपने साथ लेना बहुत जरूरी होगा. राष्ट्रपति द्वारा संसद को संबोधित करने के समय विपक्ष को एकजुट करने का काम येचुरी बखूबी निभा सकेंगे. वे उत्प्रेरक का काम भलीभांति कर पाएंगे. सदन के पटल पर इससे इतर येचुरी के लिए दूसरी वामपंथी पार्टियों के बड़े नेताओं का दबाव झेलना एक बड़ी चुनौती होगी और यह सीपीएम के लिए कांग्रेस जैसी धर्मनिरपेक्ष पार्टी के साथ गठजोड़ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. इसी साल पश्चिम बंगाल में होनेवाले सीपीएम के विशेष प्लेनम (कुछ खास स्थिति में छोटा सम्मेलन आयोजित किया जाता है) में संगठन की दिक्कतों के बारे में चर्चा की जाएगी. येचुरी पार्टी के कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करने और उसे दूर करने को लेकर लंबे समय तक इंतजार नहीं करना चाहेंगे.

 कैडर सिस्टम पड़ा कमजोर

पार्टी के केंद्रीय कमेटी के सदस्य सुनीत चोपड़ा ने सीपीएम छोड़ने के बाद जो प्रतिक्रिया दी थी, उसके बाद यह महसूस किया गया था पार्टी में कैडर सिस्टम ढीला पड़ गया है. पार्टी को अनुशासन को लेकर सख्ती करनी होगी. सुनीत चोपड़ा लगभग दो दशकों तक पार्टी की केंद्रीय समिति के सदस्य रहे. उन्होंने पार्टी छोड़ने के बाद यह आरोप लगाया था कि वह पार्टी इसलिए छोड़ रहे हैं क्योंकि वे करात की चापलूसी नहीं कर सकते हैं. उन्होंने नेतृत्व के मोर्चे को लेकर कई बार सवाल उठाए थे.

येचुरी की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह माकपा के जनाधार का कितना विस्तार कर पाते हैं और वह दूसरी पार्टियों से रिश्ते कितने बेहतर बनाकर रख पाते हैं

केरल के विद्रोही लोकप्रिय नेता अच्युतानंदन इस बात के लिए बाध्य होंगे क्योंकि उनके और येचुरी के बीच घनिष्ठ संबंध हैं. नए महासचिव अगर गैर-कृषक नेता को तवज्जो देंगे तब केरल इकाई किस तरह प्रतिकिया देगा, यह देखने वाली बात होगी. केरल इकाई में यह चर्चा है कि येचुरी राज्य समिति में अच्युतानंदन को शामिल करने के लिए जोर डालेंगे. लेकिन येचुरी केरल इकाई की इच्छाओं का भी जरूर ख्याल रखना चाहेंगे क्योंकि पोलित ब्यूरो में चार और केंद्रीय समिति में 14 सदस्य इसी राज्य से आते हैं. येचुरी बंगाल और केरल के बीच समन्वय बिठा पाने में समर्थ होंगे और अगर वे ऐसा कर पाएं तो उनके लिए यह सफलता की बड़ी कुंजी होगी. पार्टी की चुनौतियों से पार पाने में येचुरी की बुद्घिमत्ता की परीक्षा होनी तय है.

सुरजीत को छोड़कर अबतक माकपा के सभी महासचिव दक्षिण भारत के हुए हैं लेकिन येचुरी को राज्यसभा का टिकट पश्चिम बंगाल से मिला. येचुरी इस बात के लिए जाने जाते हैं कि वे अपने पूर्व के लोगों की तुलना में लोगों की आसान पहुंच में हैं और वे विचारधारा के सवाल पर अपनी खिड़की खुली रखते हैं. येचुरी को शीर्ष पर पहुंचने से रोकने की हरसंभव कोशिश इनके पूर्ववर्ती नेताओं ने की. येचुरी अब मुक्त हैं और उनकी सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह माकपा  के जनाधार का विस्तार कर पाने में कितने कारगर होंगे. उनकी सफलता इसपर निर्भर होगी कि वे दूसरी पार्टियों से कितना अच्छा रिश्ता कायम रखने में कामयाब हो पाते हैं. क्या वे इस असंभव काम माकपा को पराभव के कीचड़ से बाहर निकालने में कर पाएंगे? अगर वे आंशिक तौर पर भी सफल होते हैं तो यह उनकी जोरदार सफलता होगी.

करिश्माई कॉमरेड

क्या ‘लेफ्ट हैंड ड्राइव’ के लेखक पार्टी को सही दिशा में ले जा पाएंगेे? पूरी दुनिया में वामपंथी आंदोलन के बहुत सारे नायक और नायिकाएं हुए हैं जिनकी अपनी एक छवि रही है, इनमें से एक नाम पार्टी के नए चुने गए महासचिव का भी है.

मौजूदा भारतीय राजनीति में सीताराम येचुरी को लोग जलवाफरोश के बतौर याद करते हैं. वे कभी भी बहुत हड़बड़ी में नहीं दीखते हैं. अलग-अलग भाषा में अपनी निपुणता बढ़ाने के अलावा माकपा के नए प्रमुख की छवि कुछ-कुछ ज्योति बसु की तरह बनती जा रही है. उनकी सौम्यता और मधुरता से अपनी बात रखने की कला क्या वामपंथ को सुरक्षा दे पाएगी? वे राज्यसभा में अक्सर हस्तक्षेप करते हैं. येचुरी 1984 -1992 तक माकपा की केंद्रीय समिति के सदस्य रहे और 1992 से पोलित ब्यूरो के सदस्य हैं. उनके कई रंग हैं. वे राजनेता, अर्थशास्त्री, लेखक और स्तंभकार के तौर पर पहचाने जाते हैं.

येचुरी का जन्म तत्कालीन मद्रास (अब तमिलनाडु) राज्य के एक तेलगु परिवार में 12 अगस्त 1952 को हुआ था. उनके पिता का नाम सर्वेश्वर सोमायाजुला येचुरी है. उनके पिता आंध्रप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम में इंजीिनयर थे. येचुरी ने स्कूल की पढ़ाई आंध्र प्रदेश में पूरी की और सीबीएससी द्वारा आयोजित बारहवीं कक्षा में वे प्रथम आए. इसके बाद वे कॉलेज की पढ़ाई के लिए हैदराबाद स्थित निजाम कॉलेज पहुंचे. उन्होंने मुल्की और गैर मुल्की के आंदोलन में शामिल होने के लिए कॉलेज की पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी.

येचुरी ने अपनी पढ़ाई दोबारा शुरू की. उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से अर्थशास्त्र में बीए. की पढ़ाई पूरी की और अर्थशास्त्र में एमए. की पढ़ाई के लिए जवाहर लाल नेहरू (जेएनयू), नई दिल्ली में दाखिला लिया. वे यहां आकर वामपंथी आंदोलन से प्रभावित हुए और 1974 में स्टुडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) से जुड़ गए. युवा नेता को आपातकाल के दौरान गिरफ्तारी की वजह से अपनी पीएचडी की पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी. बाद में वे जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए.

येचुरी 1978 में एसएफआई के राष्ट्रीय संयुक्त सचिव बनाए गए और कुछ समय के बाद उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया. 1984 में येचुरी को माकपा की केंद्रीय समिति में शामिल कर लिया गया और उसके बाद अगले ही साल उनका चयन पार्टी की फैसला लेने वाली इकाई के लिए हो गया.

वे राज्यसभा के लिए पहली बार 2005 में चुने गए और इस दौरान वे कई संसदीय समिति के सदस्य रहे और वहां अपनी महत्वपूर्ण सेवाएं दीं. वे 2011 में राज्यसभा के लिए दोबारा चुने गए. इस वामपंथी नेता ने विपक्ष की ओर से अहम भूमिका निभाई.

‘लेफ्ट हैंड ड्राइव’ के अलावा येचुरी ने ‘ह्वाट इज हिंदू राष्ट्र?’ पुस्तक लिखी है. येचुरी ने पत्रकार सीमा चिश्ती से शादी की और उनके लेख नई दिल्ली से प्रकाशित होनेवाले कई महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में नियमित तौर पर प्रकाशित होते हैं. पार्टी ढलान पर है लेकिन येचुरी के पाठकों का दायरा अभी भी व्यापक है. येचुरी को एक बेटी और दो बेटे हैं. वे अपने कॉलेज के दिनों में टेनिस के अच्छे खिलाड़ी भी हुआ करते थे.

1 COMMENT

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here