राजा महमूदाबाद की संपत्ति का विवाद

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    Photo : saveur.com
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    राजा मोहम्मद आमिर अहमद खान (तत्कालीन राजा महमूदाबाद) के भारत-पाकिस्तान दोनों ही देशों में अच्छे राजनीतिक संपर्क थे. उनका दोनों ही देशों में आना-जाना लगा रहता था. वे भारतीय नागरिक थे पर भारत विभाजन के बाद से ईराक में रह रहे थे. 1957 में उन्होंने भारतीय नागरिकता छोड़कर पाकिस्तानी नागरिकता ले ली. लेकिन उनके परिवार ने भारत में ही रहना चुना. 1965 में भारत और पाकिस्तान के बीच शत्रुता के बीज फूटे. भारत ने देश छोड़कर पाकिस्तान जा बसे लोगों की संपत्तियां ‘भारत के रक्षा नियम (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स) 1962’ के तहत अपने संरक्षण में ले लीं. राजा महमूदाबाद की संपत्तियां भी इसमें शामिल थीं. महमूदाबाद के किले को छोड़कर किसी भी संपत्ति को सील नहीं किया गया. इनसे मिलने वाला किराया कस्टोडियन वसूलने लगा. इसके एक छोटे-से हिस्से में राजा का भी परिवार रहता रहा. 1966 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उस किले को पूरी तरह खोल दिया गया. राजा महमूदाबाद के भाई को उसकी देखरेख का जिम्मा कस्टोडियन ने सौंपा. 1968 में शत्रु संपत्ति अधिनियम आया. कानून के प्रावधानों के अनुसार कस्टोडियन किले में रहने वाले राजा की पत्नी और बेटे को संपत्ति का मेंटेनेंस अलाउंस देने लगा. 1973 में राजा महमूदाबाद की लंदन में मौत हो गई. उनके बेटे मोहम्मद आमिर मोहम्मद खान तब कैंब्रिज में पढ़ाई कर रहे थे. वे भारतीय नागरिक थे. वे भारत वापस आए. अपने पिता की संपत्ति पर उत्तराधिकार का दावा भारत सरकार के सामने पेश किया. तब सीईपी वाणिज्य मंत्रालय के तहत आता था. 1997 तक उन्होंने मंत्रालय के चक्कर काटे. लगभग हर प्रधानमंत्री से अपनी बात कही. पर सिवा आश्वासन के कुछ नहीं मिला. 1981 में जरूर इंदिरा गांधी सरकार ने उनकी 25 प्रतिशत संपत्ति लौटाने की बात कही. वे लखनऊ सिविल कोर्ट गए, कोर्ट ने उन्हें संपत्ति का कानूनन वारिस माना. उनके इस कदम से शायद सरकार चिढ़ गई. इसलिए 25 प्रतिशत वाले आदेश में एक शर्त जोड़ दी. अब 25 प्रतिशत संपत्ति या 25 लाख रुपये. जो भी कम हो वह दिया जाए. इस बीच वे दो बार कांग्रेस के टिकट पर उत्तर प्रदेश के सीतापुर की महमूदाबाद सीट से विधायक भी चुने गए. पर तब भी वे अपनी संपत्ति वापस नहीं पा सके.

    1997 में उन्होंने मुंबई हाई कोर्ट में याचिका लगाई. 2001 में फैसला उनके पक्ष में आया. 2002 में सरकार ने इसके विरोध में अपील कर दी. 2005 में उस अपील पर भी उनके पक्ष में फैसला आया. सुप्रीम कोर्ट ने कस्टोडियन की आलोचना की. माना कि वह संपत्ति पर अवैध कब्जा रखे हुए है. आठ हफ्ते के अंदर कब्जा वर्तमान राजा महमूदाबाद को देने के आदेश दिए. जिन संपत्तियों में किरायेदार बैठे हुए थे उन्हें छोड़कर बाकी पर उन्हें कब्जा मिल भी गया. जब उन संपत्तियों पर कब्जा लेने की बात चली तो किरायेदार सुप्रीम कोर्ट चले गए.

    लेकिन 2010 में कांग्रेस सरकार शत्रु संपत्ति अधिनियम में संशोधन का अध्यादेश ले आई, जो भूतलक्षी प्रभाव रखता था. इसके बाद उनकी सभी संपत्तियों को फिर से कस्टोडियन ने कब्जे में ले लिया. तब तक उन्होंने बैंक से इन संपत्तियों पर कर्ज भी उठा लिया था और उनकी मरम्मत में खर्च भी कर दिया था. कांग्रेस की नीयत पर सवाल उठे. वह 2 जुलाई को अध्यादेश लाई और 26 जुलाई से सत्र शुरू होना था, इतनी जल्दबाजी क्यों की? विरोध के चलते अध्यादेश तो खारिज हो गया पर राजा को उनकी संपत्ति वापस नहीं मिली. 2010 में ही उन्होंने अध्यादेश को दिल्ली हाई कोर्ट में चुनौती दी. दिल्ली हाई कोर्ट ने उन्हें किसी और कोर्ट में जाने को कहा क्योंकि यह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं था. नैनीताल में उनकी संपत्ति थी. इसलिए 2011 में वे उत्तराखंड हाई कोर्ट गए. फैसला आता उससे ठीक पहले जज का ट्रांसफर हो गया. मामला लटका तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने मामले को सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर करा लिया. सितंबर 2015 में मामले की सुनवाई हुई. सरकारी वकील ने तर्क रखा कि उसे समय दिया जाए ताकि वह अपने मुवक्किल से साफ निर्देश ले सके कि 2005 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के आलोक में संपत्ति लौटानी है या मुकदमा लड़ना है. 7 जनवरी को सुनवाई हुई और उसी दिन अध्यादेश आ गया. राजा महमूदाबाद ने इस अध्यादेश को भी शीर्ष अदालत में चुनौती दे दी है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अध्यादेश के सबसे विवादित प्रावधान के तहत राजा महमूदाबाद की संपत्ति बेचे जाने पर रोक लगा दी है. इस बीच लोकसभा में इस अध्यादेश को पेश करके सरकार पास कराने में सफल रही है.