दलित उत्पीड़न का वर्तमान

IMG_5952gggg
फोटोः विजय पांडेय

जिस समाज में हम रहते हैं वह उत्सवप्रेमी है, कानूनप्रेमी नहीं. हम पूरे ताम-झाम से आम्बेडकर जयंती, संविधान दिवस तो मना लेते हैं लेकिन आम नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों पर रोज हो रहे हमलों को लेकर उदासीन बने रहते हैं. ऐसा नहीं है कि सभी ‘आम नागरिकों’ को एक तराजू पर तौला जा सकता हो. इसे कई श्रेणियों में बांट कर देखना ही उचित है. जिस समूह के अधिकारों की जरा भी परवाह यह समाज नहीं करता, वह दलित समुदाय है. असल में, दलित समुदाय के संदर्भ में संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न बाद में आता है, प्राथमिक सवाल उनके जीवन और उनके अस्तित्व का है.

आजादी मिलने के बाद से दलित समुदाय अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए संघर्षरत है. अस्मिता का मुद्दा उनके लिए महत्वपूर्ण है जिनका वर्गांतरण हो चुका है या हो रहा है. ऐसे लोगों की संख्या बहुत कम है. कभी माना गया था कि जो दलित कस्बाई या शहरी हो गए हैं, जीवन की बुनियादी सुविधाएं जुटा चुके हैं, थोड़ी बहुत शिक्षा हासिल कर ली है, वे हिंसक जातिवादी हमलों की परिधि से बाहर आ चुके हैं. अब यह मान्यता बेतरह खंडित हो चुकी है. ऐसे साक्ष्यों का हमारे सामने अंबार लगा हुआ है जो चीख-चीख कर बता रहे हैं कि जातिवादी मानसिकता किसी भी श्रेणी के दलित को नहीं बख्शती. गांव से लेकर कस्बे तक, धुर देहात से लेकर महानगरों तक दलित हर जगह असुरक्षित हैं. वे हमेशा संकट के साये में जीते हैं. उनका घर-बार कभी भी लूटा जा सकता है. उनके पक्के मकानों से लेकर झुग्गियां तक कभी भी आग के हवाले की जा सकती हैं. दलित स्त्रियों के साथ कहीं भी और कभी भी बलात्कार हो सकता है. दुधमुंहे दलित बच्चों पर कभी भी पेट्रोल डालकर माचिस की तीली दिखाई जा सकती है. अपने दर्द का बयान करने वाले नवोदित दलित लेखकों को कभी भी घेरा जा सकता है. उनकी अंगुलियां काटी जा सकती जा सकती हैं या काटने की धमकी दी जा सकती है. आज जातिवादी हिंसा अपने उफान पर दिखाई दे रही है.

अब भी कुछ लोग यह कहते मिल जाएंगे कि जातिवाद गुजरे दिनों की हकीकत है. अब समाज बहुत आगे चला आया है. अब जाति की परवाह कौन करता है? ऐसे लोगों से सिर्फ इतना कहना चाहिए कि वे अखबारी रपटों पर एक नजर डाल लें. एक बार वैवाहिक विज्ञापनों पर सरसरी निगाह फेर लें. जाति व्यवस्था की विकट उपस्थिति जाहिर हो जाएगी. अंतरजातीय विवाह करने वालों के साथ जातिवादी समाज कितनी क्रूरता से पेश आता है, इसकी तमाम मिसालें आसपास मिल जाएंगी. पिछले डेढ़ दशक पर ही हम अपना ध्यान केंद्रित करें और जाति आधारित हिंसा की कुछ चुनिंदा घटनाओं को याद करें तो इस समाज की भयावह सच्चाई का कुछ अंदाज लग जाएगा. देश की राजधानी की नाक के ठीक नीचे महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर आर्थिक रूप से विकसित हरियाणा राज्य में जातिवादी हमलों का एक सिलसिला चल रहा है. अक्टूबर 2002 में झज्जर जिले के दुलीना पुलिस चौकी इलाके में 5 दलित युवकों को गाय मारने के शक की बिना पर पीट-पीट कर मार डाला गया. इसी राज्य के सोनीपत जिले की तहसील गोहाना में अगस्त 2005 में पूरी वाल्मीकि बस्ती लूट कर जला दी गई. सोनीपत के पड़ोसी जिले करनाल के महमूदपुर में फरवरी 2006 में जाटव मोहल्ले पर हमला हुआ. इसमें मोहल्ले के करीब दो दर्जन लोग घायल हुए. बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं को भी नहीं बख्शा गया. करनाल जिले के ही सालवन गांव में मार्च 2007 में लगभग 300 दलित घरों पर हमला हुआ. लूटने के बाद हमलावरों ने तमाम घरों में आग लगा दी. अप्रैल 2010 में हिसार जिले के मिर्चपुर गांव में वाल्मीकि बस्ती पर हमला हुआ. हमलावरों ने दो दर्जन घरों को आग लगा दी, कई घरों में लूटपाट की और हमले के वक्त सुबह नौ बजे बस्ती में जो भी मिला, उन्हें बुरी तरह मारा पीटा. ताराचंद वाल्मीकि की बारहवीं दर्जे में पढ़ने वाली होनहार बेटी सुमन (18 वर्ष) पोलियोग्रस्त होने के कारण भाग न सकी. पिता भी उसी के साथ रुके रहे. हमलावरों ने बाप-बेटी दोनों को जला दिया. दलितों को जिंदा जलाने का यह क्रम अभी हाल में पुनः संपन्न किया गया.