इसका जवाब बहुत साफ है. उस जवाब की बहुत हद तक झलकियां चायवाली उस चौपाल में उस बुजुर्गवार नेता ने दे दी थीं, लेकिन मामला सिर्फ उतना भर ही नहीं है. लालू प्रसाद यादव जानते हैं कि वे खुद राजनीतिक जीवन में मुश्किलों और चुनौतियों से तो घिरे हुए ही हैं लेकिन नीतीश उनसे ज्यादा बेबस और लाचार हैं इसलिए नीतीश चाहे जितनी बातें कर लें, आखिर में नीतीश उस मुहाने पर खड़े हो चुके हैं, जिस मुहाने से मंजिल की ओर जाने के लिए सिर्फ और सिर्फ लालू प्रसाद यादव का साथ लेना और एक समय-सीमा के बाद उनकी शर्तों को मानना उनकी मजबूरी होगी. इसका एहसास भी लालू प्रसाद यादव ने स्वाभिमान रैली में करवाया. वे न सिर्फ स्टार वक्ता के तौर पर आखिर में मंच पर उतरे बल्कि उन्होंने सबके सामने कहा कि नीतीश अगर मुख्यमंत्री बनेंगे तो उनकी ही मेहरबानी से. ये कहकर वह अपने कोर मतदाताओं को निश्चिंत करवाना चाहते थे कि वे किंगमेकर रहेंगे. लेकिन लालू प्रसाद को इस बात का अहसास है िक इस बार की बिहार की लड़ाई उनके लिए भावी पीढ़ी की राजनीति के वजूद को बनाए और बचाए रखने की लड़ाई है. वे जानते हैं कि वे खुद इस बार के चुनाव मैदान में तो नहीं ही होंगे और यह कोई नई बात नहीं होगी लेकिन वे बहुत खुलकर राजनीति भी नहीं कर पाएंगे, क्योंकि कोर्ट-कचहरी का पहरा उन पर रहेगा और खुलकर राजनीति करने पर उनकी जमानत रद्द हो सकती है, जिसकी धमकी भाजपा नेता सुशील मोदी दे चुके हैं.

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    लालू प्रसाद जानते हैं कि बीते लोकसभा चुनाव में उनके कोर मतदाताओं के समूह में से एक यादवों में भी भाजपा ने सेंधमारी कर दी है. यादवों के बिखराव को अगर वे इस बार नहीं रोक पाए या अपनी ओर नहीं समेट पाए तो अपने दोनों बेटों तेजस्वी और तेजप्रताप को ऐसी विरासत सौंपेंगे, जिसमें मुश्किलें ही मुश्किलें होंगी और संभावनाओं के सारे द्वार बंद रहेंगे. लालू प्रसाद यह भी जानते हैं कि बिहार में यादवों के पांच गढ़ मधेपुरा, दानापुर, छपरा और राघोपुर-सोनपुर जैसे इलाकों में वे और उनके परिवार के लोग बुरी तरह से हार का सामना कर चुके हैं, इन क्षेत्रों में उनका किला दरक चुका है. वह यह भी जानते हैं कि वे लाख कोशिशों के बावजूद राबड़ी देवी और मिसा को खड़ा नहीं कर सके तो इस बार की जरा-सी चूक तेजस्वी और तेजप्रताप को भी हाशिये पर धकेल देगी. नीतीश कुमार आनेवाले कल में अपनी सत्ता बचाने के लिए किसी ओर भी जा सकते हैं, इसका भी लालू का आभास है. किसी ओर का मतलब भाजपा से भी हाथ मिला सकते हैं लेकिन ऐसा करने के लिए लालू प्रसाद यादव के पास विकल्प कम होंगे. इसलिए लालू प्रसाद सब कुछ देख-सुन-समझकर भी नीतीश द्वारा लालू से अलगाव-दुराव का भाव दिखाते हुए सिर्फ खुद को ही स्थापित करने की प्रक्रिया में लगे रहने के बावजूद चुप्पी साधे रहे. इस सब के बाद लालू प्रसाद यह भी जानते हैं कि आज चाहें नीतीश कुमार जितनी भी पैंतरेबाजी कर लें, खुद को स्थापित करने की कोशिश कर लें लेकिन अगर चुनाव बाद उनकी पार्टी राजद जदयू के मुकाबले जरा भी मजबूत स्थिति में आती है तो फिर नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के सारे सपने को भी वे ध्वस्त कर देंगे. एकबारगी स्थिति ऐसी बनेगी कि नीतीश कुमार को एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई में से एक को चुनना होगा. लालू प्रसाद इस चुनाव में जितनी लड़ाई भाजपा या एनडीए से लड़ रहे हैं, उतनी ही बड़ी लड़ाई अपने संगी-साथी नीतीश कुमार से भी लड़ रहे हैं, क्योंकि उन्हें मालूम है कि भाजपा से लड़ने में तो वे पहले भी सक्षम रहे हैं और आगे भी रह सकते हैं लेकिन उनकी बुनियाद को नीतीश कुमार ने ही कमजोर किया है और उन्हें राजनीति में इस स्थिति में पहुंचाया है कि उनके नाम की चर्चा के साथ कुविकास, जंगलराज से लेकर तमाम किस्म के विशेषण जरूर लगाए जाते हैं. नीतीश कुमार ने अपनी पूरी राजनीति लालू को ही दुश्मन बनाकर खेली और लालू प्रसाद के कारण ही वे सुशासन से लेकर विकास पुरुष तक के प्रतीक बने. नीतीश ने ही पिछड़ी राजनीति में गैर यादव जातियों को गोलबंद कर एक नया समीकरण बनाया और सुरक्षित राजनीतिक भविष्य के लिए पिछड़ो में भी ‘अतिपिछड़ों’ का बंटवारा कर लालू प्रसाद की बची-खुची संभावनाओं पर प्रहार किया था. नीतीश कुमार ने ही दलितों को ‘महादलित’ जैसे फ्रेम में बांधकर लालू प्रसाद के एक और बड़े कोर समूह को विखंडित किया और मुस्लिमों में भी ‘असराफ मुसलमान’ बनाम ‘पसमांदा मुसलमान’ की राजनीति कर उसमें बिखराव के बीज डाले. लालू प्रसाद यह सब जानते हैं और जानते हैं कि अगर भविष्य में उन्हें अपनी भावी पीढ़ी की राजनीति को बचाए रखना है तो नीतीश की राजनीतिक धारा को भी उतना ही कमजोर करना होगा, जितना की भाजपा की धारा को. यह सब और इस बार के चुनाव में खुद के महत्व को जानते हुए भी लालू प्रसाद इसलिए नीतीश कुमार के साथ बने हुए हैं, बने रहेंगे, क्योंकि हाल और हालात उनके अनुकूल नहीं हैं.

    बेशक लगातार राजनीतिक तौर पर नीतीश की वजह से कमजोर होने, भाजपा की वजह से यादव वोटों में सेंधमारी होने, कांग्रेस द्वारा लगातार तिरस्कृत होने, तमाम तिकड़म-समझौते करने और राजनीतिक-रणनीतिक ताकत लगाने के बावजूद यादवों के गढ़ पाटलीपुत्र और छपरा में मिसा और राबड़ी की हार और विरासत के लिए घर के अंदरूनी कलह से लेकर बाहरी तौर पर पप्पू यादव द्वारा खुलेआम चुनौती मिलने के बाद लालू प्रसाद के सामने मुश्किलों का पहाड़ है. लेकिन अतीत के आंकड़े और वर्तमान में उपजी राजनीतिक स्थितियों ने उन्हें उस मजबूत स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से लालू प्रसाद के पास खोने के लिए छोटा-सा दायरा है लेकिन पाने के लिए फिर से जीवित होकर बिहार में सदाबहार बड़ी ताकत बनने की संभावना भी.

    अतीत के आंकड़े बताते हैं तमाम विपरीत परिस्थितियों, लोकप्रियता घटने, भाजपा-जदयू जैसी पार्टियों के साथ रहने के बावजूद, अपने सबसे बुरे दौर में भी वोट प्रतिशत के मामले में लालू बड़ी ताकत बने रहे हैं. 2004 के लोकसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव की पार्टी राजद को 30.67 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे, जो किसी भी पार्टी से ज्यादा थे. 2009 के लोकसभा चुनाव में राजद को 19.31 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए थे, 2014 के लोकसभा चुनाव में राजद को 20.1 प्रतिशत वोट मिले, जो नीतीश को मिले वोट से करीब पांच प्रतिशत ज्यादा थे. इसी तरह 2005 में अक्टूबर में हुए विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव की पार्टी को 23.45 प्रतिशत वोट मिले थे, जो किसी भी पार्टी से ज्यादा थे. इसी तरह 2010 के चुनाव में राजद को 18.84 प्रतिशत वोट मिले थे, जो भाजपा से करीब दो प्रतिशत ज्यादा था. ऐसे ही कई और आकंड़े लालू प्रसाद को भविष्य में भी मजबूत बने रहने के संकेत देते हैं. व्यक्तिगत तौर पर भी लालू प्रसाद के वोट का दायरा नीतीश की तुलना में ज्यादा माना जाता है. नीतीश कुमार  ने अपनी राजनीतिक पारी में दोनों ही बार बिना किसी सहारे के अपने दम पर चुनाव लड़ने की कोशिश की है और दोनों में ही वह एक फिसड्डी नेता साबित हुए हैं.

    भाजपा से जुड़ाव से पहले 90 के दशक में जब नीतीश कुमार ने अकेले अपने दम पर समता पार्टी बनाकर विधानसभा चुनाव लड़ा, तो सात सीट पर उनकी पार्टी सिमट गई थी, जबकि उस वक्त झारखंड भी बिहार का हिस्सा हुआ करता था और वर्तमान से 81 सीटें ज्यादा हुआ करती थीं. बाद में 2014 के लोकसभा चुनाव अकेले लड़े तो दो सीटों पर सिमट गए. ऐसे में लालू प्रसाद उन पर भारी पड़ते हैं.

    अतीत की बातों को छोड़ दें तो भी लालू प्रसाद के पास वर्तमान में भी कई ऐसी संभावनाएं हैं, जिसके जरिये वे इस बार के बिहार चुनाव में केंद्र बने रहेंगे. नीतीश कुमार डीएनए और बिहारी अस्मिता जैसे मामले को उछालकर बिहार के वोटरों को गोलबंद करने में लगे हुए हैं. बिहारी अस्मिता एक ऐसा मामला रहा है, जिसे नीतीश कुमार पिछले दस सालों से चलाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन वह कभी परवान नहीं चढ़ सका है. दूसरी ओर लालू प्रसाद यादव ने सीधे-सीधे मंडल पार्ट-2 का बिगुल बजा दिया है. लालू ने सीधे-सीधे जातिगत व सामाजिक न्याय की राजनीति का एलान किया है. जातीय जनगणना को सार्वजनिक करने की मांग को लेकर वे धरना से लेकर रोड मार्च तक कर चुके हैं. लालू प्रसाद ने इस बार के चुनाव में अपना एजेंडा साफ कर दिया है िक वे पुराने समीकरणों की वापसी चाहेंगे. वे अपने वोटों के बिखराव को रोकने के लिए मंडल, सामाजिक न्याय के बहाने जातिगत ध्रुवीकरण चाहेंगे. इसके लिए वे सवर्णों का खुलेआम विरोध करेंगे.

    लालू प्रसाद जानते हैं कि पिछले लोकसभा चुनाव में सवर्णों से बार-बार माफी मांगने, सवर्णों के मठों में रात-रात भर घूमकर चंदा देने, अच्छी-अच्छी बातें बोलने के बावजूद सवर्णों ने उनका साथ नहीं दिया था तो इस बार के विधानसभा चुनाव में उसकी संभावना तो और दूर-दूर तक नहीं. इसलिए वे ऐसा करेंगे और यह उन्हें फायदा भी पहुंचाएगा. हालांकि नीतीश इससे खुद की छवि को ध्यान में रखते हुए अनकंफर्ट महसूस करेंगे लेकिन उनके पास दूसरा रास्ता नहीं होगा. लालू प्रसाद अपनी ताकत जानकर ही नीतीश कुमार से साफ कर चुके हैं कि उन्हें बराबरी का सीट चाहिए. नीतीश 2010 के विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी के लिए अर्जित सीट का वास्ता देकर लालू प्रसाद को कम सीटों पर सिमटाना चाहते थे लेकिन लालू प्रसाद ने पिछले साल हुए लोकसभा चुनाव में नीतीश की स्थिति की याद दिलाकर उन्हें बैकफुट पर जाने को मजबूर किया. लालू प्रसाद आगे की राजनीति भी जानते हैं कि अगर सीटों के बराबर बंटवारे में उन्हें नीतीश से ज्यादा सीटें मिल गईं तो फिर वे बिहार की राजनीति का मुहावरा भी बदलने की कोशिश करेंगे और नीतीश कुमार के संगी-साथी यह जानते हैं कि लालू प्रसाद के मजबूत होने के बाद भाजपा से ज्यादा मुश्किलें नीतीश कुमार के लिए ही आने वाली हैं.

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    लेकिन इतनी संभावनाओं के बावजूद, मजबूरी में ही मजबूती की संभावना बनने के बावजूद लालू प्रसाद के पास जो छोटी-छोटी चुनौतियां हैं, उससे ही पहले पार पाना होगा. राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन कहते हैं, ‘चुनौतियां और संभावनाएं तो राजनीति में आती-जाती रहती हैं लेकिन यह सच है कि लालू प्रसाद और नीतीश कुमार का समर्थक समूह अथवा वोट बैंक ऐतिहासिक बिखराव की ओर है. न तो यह गोलबंदी एक दिन में हुई थी, न बिखराव की स्थिति एक दिन में आई है. एक लंबी प्रक्रिया के बाद बिखराव की स्थिति बनी है और ऐसे में लालू प्रसाद को सिर्फ अपने बिखराव पर ही पूरी ऊर्जा लगानी होगी. वे नया कुछ हासिल  नहीं कर पाएंगे लेकिन वे बिखराव को जितना ज्यादा रोक पाएंगे, उतना ही सफल होंगे.’

    नीतीश-लालू दोनों के साथ लंबी राजनीतिक पारी खेल चुके बिहार के चर्चित नेता और पूर्व सांसद शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘लालू प्रसाद की भूमिका सामाजिक न्याय की राजनीति में नीतीश कुमार की तुलना में सदा ही ज्यादा रही है. लालू प्रसाद इस बार नीतीश के लिए खेवनहार बन सकते हैं, उसकी संभावना कम है. ज्यादातर चुनौतियां लालू प्रसाद के लिए हैं. उनके लिए चुनौती अपनी जाति की राजनीति में भी है.’

    बेशक आज लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और शरद यादव जैसे तीन प्रमुख यादव नेता एक साथ, एक छोर पर हैं और यह परिघटना वर्षों बाद हुई है लेकिन बिहार में शरद यादव और मुलायम सिंह यादव की ज्यादा चलती नहीं है. बिहार में कई दूसरे ताकतवर यादव नेता आज लालू प्रसाद से दूसरे छोर पर हैं. नंदकिशोर यादव पहले से ही भाजपा में हैं और प्रमुख नेता रहे हैं. अब लालू के अहम संगी साथी और उनकी बेटी मिसा भारती को हराकर संसद पहुंचे रामकृपाल यादव भी भाजपा के साथ हैं. भोजपुर के इलाके में एक छोटे दायरे में ही पकड़ रखने वाले ददन पहलवान दूसरी ओर हैं. लालू प्रसाद के चर्चित साले साधु यादव भी अपनी पार्टी बनाकर अलग ताल ठोंक रहे हैं. इन सबके बाद पप्पू यादव भी अब लालू प्रसाद के साथ नहीं हैं, जिनकी कोसी इलाके में पकड़ मानी जाती है और भाजपा की आंधी में भी लोकसभा चुनाव में अगर कोसी के इलाके में भाजपा का प्रभाव नहीं जम सका था तो उसमें पप्पू यादव की ही भूमिका महत्वपूर्ण मानी गई थी. पप्पू यादव कहते हैं, ‘व्यक्तिगत तौर पर लालू प्रसाद मेरे लिए आदरणीय हैं लेकिन वे जिस तरह की राजनीति करना चाहते हैं, हम उसके विरोध में खडे़ हुए हैं.’ लालू प्रसाद कहते थे, ‘रानी के पेट से नहीं मेहतरानी के पेट से भी राजा जनमेगा’, तो फिर क्यों वे अपने ही परिवार के बाहर नहीं सोच पा रहे. पहले राबड़ी देवी को लाए. बाद में बेटी को लाना चाहा. अब बेटों को आगे करना चाह रहे हैं. वे क्यों यादवों को अपनी जागिर समझ रहे हैं. पप्पू कहते हैं, ‘जिस नीतीश कुमार की वजह से यादव जंगलराजी जाति बने, उसी नीतीश कुमार के साथ मिलकर लालू प्रसाद कौन-सी राजनीति करना चाहते हैं, यह साफ नहीं है.’ हालांकि पप्पू यादव अपनी राजनीतिक भाषा बोल रहे हैं. वे लालू प्रसाद से अलग हुए हैं तो विरोध में बोलेंगे ही, लेकिन उन्होंने एक मसला उठाकर लालू को परेशानी में डाल दिया था. पप्पू ने कहा था कि अगर विरासत परिवार को ही सौंपनी है तो मिसा को क्यों नहीं? बेटों को क्यों? यह लालू प्रसाद के सामने एक ऐसा सवाल था, जिसका जवाब देना उनके लिए आसान नहीं था. हालांकि लालू प्रसाद ने पप्पू को जवाब दिया और कहा कि उनके बेटे ही उनकी विरासत को संभालेंगे.

    लालू प्रसाद ने भले ही यह कह दिया हो कि उनके बेटे ही उनकी विरासत को संभालेंगे लेकिन सूत्र बताते हैं कि इसे लेकर परिवार में भी कोई कम कलह नहीं है. उनकी बेटी मिसा भारती, जो पिछले लोकसभा चुनाव में जोरशोर से दानापुर से मैदान में उतरी थी और जिनकी जीत सुनिश्चित कराने के लिए लालू प्रसाद यादव ने दानापुर क्षेत्र के दबंग और जेल में बंद रितलाल यादव तक से समझौते किये थे, वह मिसा चुनाव नहीं जीत सकी थीं. मिसा भले चुनाव नहीं जीत सकी थी लेकिन लोगों ने यह माना था कि लालू की उत्तराधिकारी उनके परिवार में वही हो सकती हैं, क्योंकि वह क्षेत्र में जिस अंदाज में प्रचार कर रही थीं, उससे उनमें बहुत संभावना दिखी थी. लेकिन लोकसभा चुनाव हारने के बाद मिसा दरकिनार कर दी गई हैं. राबड़ी देवी पोस्टरों पर चमक रही हैं लेकिन वह चुनाव नहीं लड़ेंगी, ऐसा ऐलान हो चुका है. लालू प्रसाद के दोनों बेटे चुनाव मैदान में उतरेंगे, इसका एेलान भी हो चुका है लेकिन उनके उतरने पर क्या होने वाला है, इसके संकेत भी मिल चुके हैं.

    बहरहाल, महुआ विधानसभा क्षेत्र में जैसे ही लालू प्रसाद के बेटे ने अपने को वहां का प्रत्याशी घोषित किया, सबके सामने ही राजद कार्यकर्ता आपस में सिरफुटव्वल और गालीगलौज कर दिखा चुके हैं कि लालू अपने परिवार को इतनी आसानी से अब थोप नहीं सकते. महुआ में लालू प्रसाद के सामने ही कार्यकर्ताओं की लड़ाई होती रही और वह कुछ कर सकने की स्थिति में नहीं रह गए थे. बस तमाशबीन भर बने हुए थे. लालू प्रसाद के लोग जानते हैं कि मिसा को एक झटके में दरकिनार कर, दोनों बेटों को दो सीटों से लड़वाकर लालू प्रसाद अपने परिवार की राजनीति को अगर शांत भी कर लेते हैं तो टिकट बंटवारे के समय ऐसे कई ‘महुआकांड’ उन्हें झेलने पड़ सकते हैं और राजद में होने वाली बगावत का असर उनकी पूरी रणनीति पर पड़ेगा. पप्पू यादव का समर्थन कर भाजपा इसलिए ही आगे बढ़ा रही है कि लालू प्रसाद के जो बगावती होंगे, उन्हें वे अपनी पार्टी में लेकर मजबूती से चुनाव में उतार देंं, ताकि वोटों का बंटवारा हो और लालू प्रसाद का कुनबा बिखर सके. भाजपा के लिए नीतीश नहीं लालू ही चुनौती हैं, इसलिए भाजपा नीतीश से ज्यादा लालू पर ही वाक प्रहार कर रही है और पूरे चुनाव में करती भी रहेगी.

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