‘किसानों की तीन लाख आत्महत्याओं पर कभी कोई बात ही नहीं होती’ | Tehelka Hindi

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‘किसानों की तीन लाख आत्महत्याओं पर कभी कोई बात ही नहीं होती’

लगा था कि भाजपा किसानों पर ध्यान देगी लेकिन कृषि की जो हालत है वह बेहद दयनीय है. शुक्रिया सुप्रीम कोर्ट का कि उसने फटकार लगाई तो सरकार को एहसास हुआ कि सूखा पड़ा हुआ है.

देविंदर शर्मा 2016-05-31 , Issue 10 Volume 8
फोटोः विजय पांडेय

फोटोः विजय पांडेय

मुझे लगता है कि सरकार कृषि के बारे में शायद भूल ही गई है. अक्सर देखा गया है कि चुनाव के पहले सरकारें किसानों की बात करती हैं और सत्ता में आने के बाद सिर्फ कॉरपोरेट की बात करती हैं. बहुत उम्मीद थी मुझे कि सरकार किसानों की तरफ ध्यान देगी, क्योंकि पिछले चुनाव में वोट सारे देश से मिला था. आम तौर पर माना जाता था कि भाजपा शहरों की पार्टी है लेकिन भाजपा को पूरे देश से वोट मिला था, मुझे लगा था कि भाजपा किसानों पर ध्यान देगी. लेकिन कृषि की जो हालत है वह बेहद दयनीय है. शुक्रिया सुप्रीम कोर्ट का कि उसने फटकार लगाई तो सरकार को इस बात का एहसास हुआ कि सूखा पड़ा हुआ है. इसमें सिर्फ सरकार ही नहीं, मीडिया का भी रवैया वैसा ही है. मीडिया और सरकार दोनों एक जैसे चलते हैं. मीडिया में भी अगर आईपीएल पर कोर्ट का निर्णय नहीं आया होता तो शायद उसका भी ध्यान इस ओर नहीं जाता.

2015 का साल कृषि के लिए पिछले 15-20 सालों में सबसे बेहतर साल था. लेकिन इससे पहले 2014 में किसानों की आत्महत्या का रोजाना का औसत 42 था. 2015 में यह बढ़कर 52 हो गया. मुझे तो कोई ऐसी चीज नजर नहीं आ रही है कि किसानों की जीविका या कमाई में बदलाव आया हो.

पिछली सरकारों की तरह वर्तमान सरकार यह मानकर चलती है कि विकास तभी होगा जब शहरों को सारे संसाधन दे दिए जाएं. जब गांव के विकास की हम बात करते हैं तो सिर्फ बात करने से नहीं होगा. मूलभूत बदलाव करने की जरूरत है. सरकार इसमें फंसी हुई है कि गांव के लोगों को जब तक हम वहां से बाहर नहीं निकालेंगे तो विकास नहीं होगा. विकास की यह तो सोच है. पिछली सरकार का भी यही सोचना था. दूसरा यह है कि ग्रामोद्योग वगैरह की जो बातें करते हैं तो यह तब तक नहीं होगा जब तक रिवर्स माइग्रेशन न हो. गांव से जो लोग शहर की ओर आ रहे हैं वे शहर से गांव की ओर जाएं, जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक मुझे नहीं लगता कि गांवों का विकास होगा.

गांव का उद्योग खेती से जुड़ा हुआ है. 60 करोड़ लोग खेती पर निर्भर हैं. जब तक खेती को आप फायदे का काम नहीं बनाएंगे तब तक विकास कैसे होगा? अब ‘पर ड्रॉप मोर क्रॉप’ एक पुराना स्लोगन हो चुका है. (पीएम बनने के बाद मोदी ने पैदावार बढ़ाने के लिए यह नारा दिया था) ये कंपनियों के स्लोगन हैं. यह मोंसैंटो का स्लोगन है. ये कहते हैं कि नीम कोटेड यूरिया होना चाहिए. अच्छी बात है, होना चाहिए, लेकिन उससे आय तो नहीं बढ़ती. दूसरा नारा है, ‘हर खेत को पानी’, वह तो जिंदगी भर नहीं हो सकेगा. समस्या पानी नहीं है, समस्या आय की है. किसान की आय हमने जान-बूझकर ऐसी रखी है कि उसे तो मरना ही मरना है. वह उत्पादन और पानी रोकने से नहीं हो सकता.

आपको उदाहरण दूं कि अमेरिका में गेहूं, धान, मक्का आदि फसलों का जितना उत्पादन है, उससे ज्यादा उत्पादन पंजाब में है. अमेरिका में 11.4 प्रतिशत एरिया इन फसलों के उत्पादन के लिए उपयोग में आता है, हमारे पंजाब में यह 98 प्रतिशत है. उसके बावजूद किसान आत्महत्या कर रहे हैं. अब तो पंजाब महाराष्ट्र से आगे निकल रहा है. इसका क्या कारण है? कारण यह है कि आपने किसान को आमदनी नहीं दी. पंजाब में खेती से जो किसान की वास्तविक आय है वह एक हेक्टेयर पर तीन हजार रुपये है. चपरासी की जो बेसिक सैलरी है वह 18 हजार रुपये है, जिसे सरकार 21 हजार करने जा रही है. और किसान की आय तीन हजार रुपये है. इसको कोई एड्रेस नहीं करना चाहता. सब अपना माल बेचने में लगे हुए हैं. उत्पादन बढ़ाने की बात करने का मतलब है कि किसी की कंपनी आएगी, नई तकनीक आएगी, नए बीज आएंगे, वह बेचेगा. किसान की आय तो तब बढ़ेगी जब उसको उत्पादन का सही दाम मिले.

एक समय था जब दुनिया भर में लोकतंत्र ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए’ होता था. अब लोकतंत्र की परिभाषा बदल गई है. अब यह ‘उद्योगों का, उद्योगों द्वारा, उद्योगों के लिए’ हो गया है

खेती को लेकर हमारी जो सोच है वह एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) सेक्टर के प्रति है. वह अगर बढ़ेगा तो हमारी खेती बढ़ रही है. यह पूरी तरह फाइनैंशियल सोच है. मूलत: खेती को बढ़ावा देने की बात नहीं है. वह तो एफएमसीजी सेक्टर को बढ़ाने की बात है. सरकार कहती है कि बारिश अच्छी होगी तो फसल अच्छी होगी, अर्थव्यवस्था ऊपर जाएगी. अब बारिश होगी तो फील गुड फैक्टर तो है ही, लेकिन उससे उन लोगों की सेल बढ़ेगी. उसमें किसान का भविष्य थोड़ा अच्छा हो जाएगा. 

एक समय था जब दुनिया भर में लोकतंत्र ‘जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए’ होता था. अब लोकतंत्र की परिभाषा बदल गई है. अब यह ‘उद्योगों का, उद्योगों द्वारा, उद्योगों के लिए’ हो गया है. चाहे वह अमेरिका हो, चाहे यूरोप हो या फिर भारत हो, हमारी सरकारें सिर्फ उद्योगों के लिए काम करती हैं. जब तक ये अपना स्वरूप नहीं बदलेंगी, तब तक ‘सबका साथ सबका विकास’ नहीं हो सकता. सवाल है कि किसानों की आत्महत्या क्यों नहीं रुक रही. इसमें दो चीजें हैं. एक तो मीडिया- एक लड़की मर जाती है जेसिका लाल तो टाइम्स आॅफ इंडिया वगैरह दो-दो पेज की कवरेज दे रहे थे. टीवी पर सारा दिन चलता था. टीवी चैनलों ने खुद जाकर कैंडल मार्च कराया था. यहां किसानों की तीन लाख आत्महत्याएं हो चुकी हैं, इस पर कभी कोई बात ही नहीं होती. फालतू का अगस्ता डील पर लगे हैं. सबको मालूम है कि उसमें कुछ नहीं होना है. चैनल रोज बहस करा रहे हैं क्योंकि उनको टाइम पास करना है. अब तो मुझे लगता है कि देश में किसी को कोई फिक्र करने की जरूरत नहीं है. सबको बोलो कि भारत माता की जय. किसानों को भी चाहिए कि भारत माता की जय बोलें. सरकार का तो संदेश यही है.

राष्ट्रवाद का अभियान तो योजना के तहत चलाया जाता है. ये जानते हैं कि किन समस्याओं पर बात करनी चाहिए लेकिन चाहते नहीं हैं. मेरा मानना है कि आप हम सब जानते हैं कि राजनेता कैसे हैं, लेकिन उससे ज्यादा अर्थशास्त्री और वैज्ञानिकों को दोष दीजिए. नेता मुख्यमंत्री बनता है तो कमेटी बनाता है. कमेटी ही गलत दिशा में ले जाएगी तो क्या करेंगे आप? समस्या अर्थशास्त्रियों की है. उनकी तरफ कोई ध्यान नहीं देता, हम नेताओं को दोष देते हैं. उनके बारे में तो हम जानते हैं कि उनका स्तर क्या है. लेकिन मुख्य भूमिका तो ब्यूरोक्रेटों और अर्थशास्त्रियों की है.

किसानों की आत्महत्या को लेकर नेता मजाक उड़ाते हैं. समाज भी मजाक उड़ाता है. हमारी जो शिक्षा व्यवस्था है उसने हमारे दिमाग में यह भर दिया है कि गरीब आदमी देश पर बोझ है. हम यह मानकर चलते हैं कि जो भी हम गरीब आदमी के लिए करते हैं, वह उस पर मेहरबानी कर रहे हैं. यह कोई नहीं बताता कि असली बोझ तो कॉरपोरेट तबका और अमीर तबका है. हिंदुस्तान टाइम्स अखबार ने लिखा है कि ‘इट इज चीप टू बी रिच इन इंडिया’. सारा मध्य वर्ग सरकारी सब्सिडी पर रहता है और दोष देता है गरीब आदमी को. यह एक सोच बना दी गई है. आर्थिक विकास का जो मॉडल है हमारा, उसकी यह सोच है कि आप अमीर हैं तो आप बड़े क्षमतावान हैं. कुछ दिनों पहले मुझे किसी ने ट्विटर पर लिखा कि ‘जिसने मन की बात सुनकर नहीं काम किया, और वो आत्महत्या करता है तो उसे कर लेना चाहिए.’ अब इसका क्या जवाब है. यह हमारी सोच है कि गरीब हमारे ऊपर बोझ है. हम गरीबी के चक्र से निकल आए तो हम बहुत क्षमतावान हैं.

हम आरक्षण को दोष देते हैं. लेकिन सरकारी कर्मचारी से ज्यादा आरक्षण कौन लेता है. कोई काम नहीं करता और इनको सातवां वेतन आयोग मिल रहा है. यह क्यों मिल रहा है, मुझे समझ में नहीं आता. पंजाब में 365 दिनों में से 200 दिन छुट्टियां हैं. सोचिए ये क्या काम करते होंगे. आरक्षण अन्याय है और यह अन्याय नहीं है? इन्हें सातवां वेतन आयोग किसलिए मिल रहा है? इस पर कोई बोलता नहीं है क्योंकि इससे सब लाभ ले रहे हैं. यह मानसिकता बनाई गई है. आपके मीडिया ने इसे और आगे बढ़ाया. किसान मर रहे हैं तो वह इस व्यवस्था की डिजाइन है. अगर आप उनकी आमदनी नहीं होने देंगे तो वे मरेंगे ही. उन्हें वंचित रखा जाता है और सरकारी कर्मचारी को सातवां वेतन आयोग दिया जाता है.

(लेखक कृषि मामलों के जानकार हैं)

(कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित)

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 10, Dated 31 May 2016)

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