गांव का पत्रकार, चुनौतियां हजार | Tehelka Hindi

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गांव का पत्रकार, चुनौतियां हजार

अनियमित या मामूली तनख्वाह और बिना किसी पहचान के काम करते जाना उनकी नियति बन गई है. ग्रामीण पत्रकारों के लिए दो जून की रोटी जुटाने के साथ पत्रकारिता के प्रति अपना जुनून बरकरार रख पाना मुश्किल साबित होता जा रहा है

IMG_6891-2खबरों की दुनिया में मुख्यधारा की पत्रकारिता की अपनी अलग चुनौतियां तो हैं ही, ग्रामीण इलाकों में भी चुनौतियां कुछ काम नहीं हैं. ग्रामीण पत्रकारिता बहुत आसान नहीं है. संसाधनों की कमी से जूझते ग्रामीण पत्रकार की चुनौतियों में से सबसे बड़ी चुनौती अनियमित तनख्वाह है. कई बार तो इन पत्रकारों को दो जून की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता है. इसलिए गांवों में जो भी लोग पत्रकारिता से जुड़े हैं वे कोशिश करते हैं कि उनके पास आय के दूसरे स्रोत भी हों ताकि परिवार का खर्च चलाने में मुश्किलें न आएं.

रूरल जर्नलिस्ट एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आरजेएआई) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अरुण सिंह चंदेल बताते हैं, ‘ग्रामीण पत्रकारों में से अधिकांश 100 से 200 रुपये रोजाना पर गुजर-बसर करते हैं. इसलिए वे खेती जैसे आजीविका के दूसरे साधनों पर भी निर्भर रहते हैं.’ मैग्सेसे पुरस्कार प्राप्त और भारत में ग्रामीण पत्रकारिता के जाने-पहचाने नाम पी. साईनाथ भी इस बात से सहमति रखते हैं. उनके अनुसार, ‘ग्रामीण पत्रकारों को बहुत ही कम वेतन पर गुजारा करना पड़ता है, जिसकी वजह से उन पर दबाव ज्यादा होता हैं. पत्रकार संगठनों की कमी और कॉन्ट्रैक्ट (ठेका) आधारित नौकरी के चलते पत्रकारों की स्वतंत्रता खत्म हो रही है.’

दैनिक अखबार ‘आज’ से जुड़े ग्रामीण पत्रकार विनोद मिश्रा कहते हैं, ‘सुरक्षा भी एक महत्वपूर्ण मुद्दा है जो ग्रामीण पत्रकारिता की चुनौतियों को बढ़ाता हैं. पत्रकारों पर अलग-अलग तरह से स्थानीय राजनीतिक दबाव होता है, इसलिए हमारे लिए सुरक्षा एक महत्वपूर्ण मुद्दा है.’ उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर के ग्रामीण पत्रकार राकेश कुमार मौर्य ‘अमेठी किसान’ नाम से अपना अखबार निकालते हैं. राजनीतिक और खबर न छापने के दबाव के बारे में वे कहते हैं, ‘2012 में मैंने जिलाधिकारी और कोतवाल की अनियमितताओं के बारे में खुलासा किया था. उसके बाद वे दोनों एक रात मेरे घर पहुंचे और तोड़-फोड़ की.’ राकेश करीब एक दशक से पत्रकारिता कर रहे हैं. वे बताते हैं, ‘पैसों की कमी और डर के कारण कई बार पत्रकारों को बाहुबलियों के पक्ष में खबर लिखनी पड़ती है. ऐसे में 80 फीसदी तक दलाली होती हैं. पत्रकार ऐसा तुरंत पैसा बनाने के चक्कर में करते हैं.’

गांवों में पत्रकार जब किसी खबर की छानबीन करता है तब जाति और आर्थिक स्थिति जैसे तमाम तत्व काम करते हैं. पी. साईनाथ कहते हैं, ‘मामलों का अतिसंवेदनशील होना भी ग्रामीण पत्रकारों के लिए बड़ा मसला है. ग्रामीण क्षेत्रों में पत्रकारिता करते वक्त हम (शहरी मध्य वर्ग पेशेवर) में से अधिकांश को हमारी जाति, श्रेणी और सामाजिक पृष्टभूमि के आधार पर फायदा मिलता है. ग्रामीण पत्रकारों के लिए कई बार ये सब बड़ी चुनौतियां साबित होती हैं.’

मुख्यधारा के पत्रकारों की तुलना में अपने संस्थानों से सहयोग की कमी के कारण उनकी रिपोर्ट की गुणवत्ता में कमी आती है. पेड न्यूज की बात करें तो पी. साईनाथ ने ‘द हिंदू’ के लिए रिपोर्टिंग करते हुए पैसों के बदले में किसी व्यक्ति या संस्था के अनुकूल खबर प्रकाशित करने में मुख्यधारा के मीडिया की भूमिका का खुलासा किया था. वह कहते हैं, ‘पेड न्यूज से संबंधित कोई खबर अगर एक ग्रामीण पत्रकार करता तो उसे कई तरह के गंभीर परिणाम भुगतने पड़ते. इनता ही नहीं खबर को प्रकाशित करवा पाना उसके लिए और बड़ी चुनौती साबित होता. उनकी तुलना में हम लोग ज्यादा महफूज हैं, इसलिए उनके लिए स्थितियां और कठिन हैं ऐसा भी कहा जाता है की शहरी पत्रकारों की तुलना में ग्रामीण पत्रकारों के लिए इस तरह की रिपोर्टिंग कहीं ज्यादा श्रमसाध्य और खतरों से निपटना कठिन होता है.’ पत्रकरिता के क्षेत्र में इस तरह के उदहारण भी मौजूद हैं जहां ग्राउंड रिपोर्ट करने पर ग्रामीण पत्रकारों को उनका मेहनताना तक नहीं मिल पाता. पी. साईनाथ कहते हैं, ‘अक्सर देखा जाता है कि ग्रामीण पत्रकार मौके पर मौजूद होता है. ऐसे में गांवों से जब कोई खबर राष्ट्रीय स्तर की बनती है तो यह ग्रामीण पत्रकार की वजह से ही संभव हो पता है. कई बार ऐसा होता है जब गांव की कोई खबर बड़ी होकर राष्ट्रीय महत्व की हो जाती है, तब मुख्यधारा का मीडिया उस ग्रामीण पत्रकार का नाम तक नहीं देता जो उस खबर को सबसे पहले उठाता है.’

देश के ग्रामीण इलाकों में बुनियादी और दूसरी सुख-सुविधाओं की कमी का भी सामना पत्रकारों को करना पड़ता है. बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के ग्रामीण पत्रकार अनवर हक बताते हैं, ‘कहीं आने-जाने के लिए काफी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, क्योंकि ग्रामीण क्षेत्रों में कहीं आने-जाने के साधन बहुत ही सीमित होते हैं. इतना ही नहीं संस्थानों से कहीं आने-जाने का खर्च मिल पाना भी मुश्किल होता है. इसके अलावा गांवों में इलेक्ट्रॉनिक सुविधाओं की भी कमी होती है. इंटरनेट की स्थिति बहुत ही खराब होती है. स्पीड नहीं मिल पाती और खबर भेजने में काफी दिक्कत होती है.’ हक जैसे दूसरे ग्रामीण पत्रकार आय के पहले स्रोत के रूप में खेती पर निर्भर हैं. हक कहते हैं, ‘ये तो हम शौक के लिए करते हैं. आजीविका के लिए हम पूरी तरह से पत्रकारिता पर निर्भर नहीं रह सकते.’

भारत में ग्रामीण पत्रकारिता के क्षेत्र में इन भयानक स्थितियों के बावजूद आशा की कुछ किरणें भी नजर आती हैं. उदाहरण के तौर पर ‘खबर लहरिया’ नाम का एक ग्रामीण अखबार है जो उत्तर प्रदेश और बिहार के ग्रामीण इलाकों में अच्छी पकड़ रखता है. इसकी प्रसार संख्या भी 80 हजार से ऊपर है. यह अखबार दूसरों से इस मामलों में अलग है, क्योंकि इसे पूरी तरह से महिलाएं ही प्रकाशित करती हैं. अखबार की सारी पत्रकार भी महिलाएं हैं.

दुखद ये है कि ग्रामीण भारत में पत्रकारिता बहुत व्यवस्थित नहीं है. हालांकि 2014 में पी. साईनाथ ने एक प्रोजेक्ट ‘पीपुल्स आर्काइव ऑफ रूरल इंडिया’ (पीएआरआई) नाम से शुरू किया था. इसका उद्देश्य ग्रामीण भारत पर एक पत्रिका निकालने का था. पी. साईनाथ अपनी वेबसाइट पर लिखते हैं, ‘पीएआरआई ग्रामीण इलाकों की रिपोर्टिंग करेगा जो इस वक्त प्रचलित और समकालीन है. इसके अलावा एक खबरों का डेटाबेस (बैंक) तैयार करेगा, जिसमें प्रकाशित हो चुकी रिपोर्ट, वीडियो और ऑडियो शामिल होंगे.’ इस तरह के प्रयास ग्रामीण क्षेत्रों की कठिन परिस्थितियों में आशा की किरण जैसे हैं. राष्ट्रीय स्तर पर शोहरत पाने के लिए ग्रामीण पत्रकारों को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है. तब तक ग्रामीण पत्रकारों को न सिर्फ अपने ऊपर के दबाव से निपटना होगा, बल्कि सामाजिक लांछन, राजनीति और गरीबी से भी लड़ना होगा.

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