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इस दाल में कुछ काला है

चिकित्सा विशेषज्ञों की चेतावनी के बावजूद केंद्र सरकार एक ऐसा फैसला करने जा रही है जिसका सीधा असर आपकी सेहत पर होने वाला है. दाल की आसमान छूती कीमतों को नियंत्रित करने की हड़बड़ी में लिया गया ये फैसला कहीं देश की गरीब जनता पर भारी न पड़ जाए

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देश से पोलियो की बीमारी तो जड़ से खत्म हो गई है लेकिन नरेंद्र मोदी सरकार एक ऐसा फैसला करने जा रही है जिससे कोई भी स्वस्थ व्यक्ति लकवे का शिकार हो सकता है. 55 साल पहले 1961 में एक दाल पर प्रतिबंध लगाया गया था जिसका नाम था खेसारी. दिखने में यह अरहर दाल के समान ही होती है. तब कई चिकित्सा विशेषज्ञों और वैज्ञानिकों ने दावा किया था कि इंसान और जानवर दोनों के लिए यह समान रूप से खतरनाक है. इसके सेवन से शरीर के निचले भाग में लकवा मार सकता है. अब यह दाल फिर से सुर्खियों में है क्योंकि भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने इसके उत्पादन पर लगा प्रतिबंध हटा दिया है. अरहर दाल की आसमान छूती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने शायद इस दिशा में कदम बढ़ाया है, लेकिन आईसीएमआर के इस कदम की कई कृषि और चिकित्सा विशेषज्ञों ने आलोचना की है. इनका कहना है कि सरकार अगर प्रतिबंध हटाती है तो इसके सेवन से लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को कैसे रोका जाएगा?

आईसीएमआर ने खेसारी दाल की जिन तीन किस्मों को मंजूरी दी है उनको कानपुर स्थित भारतीय दाल अनुसंधान संस्थान के वैज्ञानिकों ने विकसित किया है. ये तीन किस्में हैं- ‘महातेवड़ा’, ‘रत्तन’ और ‘प्रतीक’. इन वैज्ञानिकों का दावा है कि इन किस्मों में खेसारी दाल में पाया जाने वाला नॉन प्रोटीन अमीनो एसिड ‘ओडीएपी’ नामक खतरनाक केमिकल मौजूद नहीं होता. लेकिन विशेषज्ञ इस बात पर चिंता जता रहे हैं कि इस बात को कैसे सुनिश्चित किया जाएगा कि किसानों तक सिर्फ यही तीन किस्में पहुंचेंगी और वे इन्हीं बीजों से खेसारी दाल का उत्पादन करेंगे. इस पर निगरानी रखना बहुत कठिन काम है. प्रतिबंध हटने के बाद विषैले ओडीएपी युक्त खेसारी दाल का भी उत्पादन किसान करेंगे और इतने बड़े पैमाने पर उन पर निगरानी रखना संभव नहीं हो सकेगा.

1961 से ही प्रतिबंधित होने के बावजूद भारत के कई राज्यों में खेसारी दाल का उत्पादन हो रहा है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इसका उत्पादन धड़ल्ले से जारी है. बांग्लादेश में भी इस दाल का उत्पादन होता है. इसी के चलते कई बार खबरें आती हैं कि व्यापारी इस दाल की तस्करी कर रहे हैं. स्थानीय व्यापारी ज्यादा मुनाफा कमाने के लिए अरहर की दाल में इसकी मिलावट करते हैं क्योंकि यह दाल दिखने में अरहर दाल के समान ही होती है.

1961 से ही प्रतिबंधित होने के बावजूद भारत के कई राज्यों में खेसारी दाल का उत्पादन हो रहा है. मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में इसका उत्पादन धड़ल्ले से जारी है

केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह इस बात को स्वीकार करते हैं. बकौल  सिंह, ‘खेसारी दाल का 4 से 5 लाख हेक्टेयर में उत्पादन हो रहा है.’ कृषि मंत्रालय के पास इसके उत्पादन से संबंधित आंकड़े भी मौजूद हैं. लेकिन यहां सवाल उठता है कि अगर कृषि मंत्रालय को इस प्रतिबंधित दाल के उत्पादन की जानकारी है तो इसका उत्पादन रोकने के लिए कदम क्यों नहीं उठाए गए? खेसारी दाल की कई खासियतें भी हैं जैसे- इसकी फसल में कम पानी का इस्तेमाल होता है और यह फसल तैयार होने में भी दूसरी दालों के मुकाबले कम समय लेती है.

खेसारी दाल गरीबों की दाल कही जाती है क्योंकि इसकी कीमत भी अन्य दालों के मुकाबले कम होती है. इस दाल पर 1907 से लेकर अब तक कई बार प्रतिबंध लगाया जा चुका है. चिकित्सा अनुसंधान में भी यह बात सामने आ चुकी है कि इसको खाने से जानवरों को भी नुकसान पहुंचता है. खेसारी दाल से प्रतिबंध हटाने को लेकर अब तर्क दिया जा रहा है कि इससे महाराष्ट्र में किसानों की आत्महत्या को रोका जा सकता है.

खेसारी दाल के इतिहास पर एक नजर

  • मेडिकल अनुसंधान के मुताबिक खेसारी दाल में नॉन प्रोटीन अमीनो एसिड ‘ओडीएपी’ मौजूद होता है, जिसके सेवन से शरीर के निचले भाग में लकवा मार सकता है. रीढ़ की हड्डी भी सुन्न पड़ सकती है.
  • लखोली दाल के नाम से भी जाने जानी वाली इस दाल का इस्तेमाल पशुओं के चारे के तौर पर भी किया जाता था. लेकिन बाद में सरकारी एजेंसियों की रिपोर्ट में इसके नुकसानदायक होने का पता चलने के बाद किसानों ने इसका उत्पादन बंद कर दिया.
  • 1907 में सूखे के चलते रीवा के महाराजा ने इस दाल के उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया था.
  • 70 के दशक में प्रतिबंध के दौरान खेसारी दाल उगाने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाती थी और सरकारी अधिकारियों को खड़ी फसल को आग लगाने की अनुमति होती थी. किसानों के बैलों को भी जब्त कर लिया जाता था.
  • पश्चिम बंगाल के अलावा सभी राज्यों ने 1961 में वैज्ञानिकों की राय के बाद इसके उत्पादन पर प्रतिबंध लगा दिया था. सन 2000 में अस्तित्व में आए राज्य छत्तीसगढ़ ने इसके उत्पादन पर प्रतिबंध नहीं लगाया.
  • ‘न्यू साइंटिस्ट’ मैगजीन की अगस्त 1984 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत के उन इलाकों में जिनमें इसका उत्पादन ज्यादा होता था वहां पर इस दाल का इस्तेमाल भुगतान के लिए भी किया जाता था.
  • प्रतिबंध के बावजूद भी खेसारी की दाल बाजार में मौजूद है और दूसरी दालों में मिलावट के साथ यह लोगों तक पहुंच रही है.
  • अरहर दाल की कीमत 200 रुपये पर पहुंचने के चलते पिछले साल व्यापारियों ने इसमें खेसारी दाल की मिलावट की थी क्योंकि दिखने में यह अरहर दाल के समान ही होती है. इसके चलते दामों में गिरावट भी देखी गई थी.
  • 2008 में माइक्रोबायोलॉजिस्ट शांतिलाल कोठारी के भूख हड़ताल पर बैठने के चलते महाराष्ट्र सरकार ने इसके उत्पादन, उपभोग और बिक्री पर से प्रतिबंध हटा लिया था. 

 

प्रतिबंध हटाने की चर्चा के बीच इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने भी सवाल उठाए हैं. मेडिकल एसोसिएशन के सेक्रेटरी जनरल केके अग्रवाल ने ‘तहलका’ से बातचीत में कहा, ‘यह मामला लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है और इस मामले पर आगे बढ़ने से पहले सरकार को एसोसिएशन के प्रतिनिधियों से चर्चा करनी चाहिए. तीनों किस्मों पर जो परीक्षण किए गए हैं उस पर जल्द से जल्द एक श्वेत पत्र लाना चाहिए और लोगों से सलाह मशविरा करना चाहिए.’ केके अग्रवाल ने आगे कहा, ‘बिना डॉक्टरों की सलाह लिए इस प्रतिबंध को हटाना उचित नहीं होगा. ऐसे फैसलों में विशेषज्ञों की राय बेहद जरूरी होती है. सरकार यह बताए कि इसमें खतरा शून्य है या कम है. अगर मरीज हमारे पास आएंगे तब हम उन्हें इस दाल के सेवन से मना करेंगे. इस मामले में आईएमए भी एक पक्ष है जिसके साथ सरकार को चर्चा करनी चाहिए. हम आईसीएमआर और स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा को पत्र लिखेंगे और जल्द से जल्द इस पूरे मामले पर श्वेत पत्र की मांग करेंगे.’

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ये कैसे सुनिश्चित होगा कि किसान सिर्फ इन्हीं तीन किस्मों का उत्पादन करें, इस पर केके अग्रवाल ने कहा, ‘सबसे बड़ी चिंता इसी बात की है कि आप ये कैसे सुनिश्चित करेंगे कि कम विषैली खेसारी दाल का ही उत्पादन हो? क्या ये खुले बाजार में सरकारी दुकानों पर भी बिक्री के लिए उपलब्ध होगी? महाराष्ट्र में मैंने ऐसे कई मामले देखे हैं जहां इस दाल के सेवन से लाइलाज बीमारी हुई है. ऐसी स्थिति में हमने उनको इस दाल का सेवन करने से मना किया है.’

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन की राय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के दावे के बिल्कुल उलट है जिसमें कहा गया था कि खेसारी दाल की नई किस्मों में ओडीएपी नामक खतरनाक केमिकल न के बराबर पाया गया. कृषि मंत्रालय ने बयान जारी किया, जिसमें कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह के हवाले से कहा गया, ‘भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने कम ओडीएपी युक्त खेसारी दाल की तीन उन्नत किस्में विकसित की हैं. इन किस्मों में ओडीएपी की मात्रा 0.07 से 0.1 प्रतिशत के बीच है जो कि मानवीय उपभोग के लिए सुरक्षित है.’

देश के जाने-माने कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा आईसीएमआर के फैसले को पूरी तरह गलत मानते हैं. ‘तहलका’ से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘दालों की कीमत नियंत्रित न कर पाने की सरकार की छटपटाहट बिल्कुल स्पष्ट है. इसीलिए विषैली खेसारी दाल पर से प्रतिबंध हटाने की योजना बनाई जा रही है. ‘न्यू साइंटिस्ट’ पत्रिका (23 अगस्त, 1984) की रिपोर्ट के मुताबिक इस दाल के सेवन से होने वाली बीमारी के दो रूप हैं- अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष. अप्रत्यक्ष रूप में इस बीमारी के होने पर हल्का पीठ दर्द और चाल में बदलाव आता है, जिससे चलने-दौड़ने में परेशानी होती है. आधे से ज्यादा मामलों में यह बीमारी इससे ज्यादा गंभीर नहीं हुई. लेकिन प्रत्यक्ष रूप में इस बीमारी के सामने आने पर व्यक्ति के अंग काम करना बंद कर देते हैं और वह  लकवे का शिकार हो जाता है.’

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