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आग का ‘झरिया’

धधकते अंगारों पर चलने की कला सदियों से दुनिया को आश्चर्यचकित और रोमांचित करती रही है. झारखंड के अनेक हिस्सों में यह कला आज भी जीवित है और लोगों की मान्यता है कि इसे वे लोग ही कर सकते हैं जिन्हें अलौकिक शक्ति प्राप्त है. झरिया कोयलांचल के लाखों लोग  

किसका झारखंड?

23 जुलाई, 2002 की बात है. पहली बार रांची पहुंचा था. काम के सिलसिले में जब अगली सुबह निकला तो देखा कि सड़कें वीरान होने लगीं. चारों ओर भय-दहशत का माहौल. तोड़फोड़-आगजनी का दौर शुरू हुआ. गाड़ियां बंद. जो जहां था वहीं छिपने की कोशिश करने लगा. एक-दूसरे के पास  

बच्चों को हथियार बनाते माओवादी!

तीन मार्च को झारखंड के गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड के जमदी और कटिया गांवों से एक खबर आती है. भाकपा माओवादी ने दोनों गांवों से बच्चों की मांग की है. इसे न मानने पर जंगल से जलावन के लिए लकड़ी काटने और पशुओं को चराने पर रोक लगा देने  

कर्ज में झारखंड, बढ़ता विधायक फंड

बात फरवरी महीने की है. झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास एक आयोजन में मुंबई गए थे. उस आयोजन में प्रधानमंत्री मोदी भी शिरकत कर रहे थे. कार्यक्रम में उन्होंने रघुबर दास का परिचय कराया, ‘ये हैं हमारे सबसे अमीर राज्य के मुख्यमंत्री.’ इस पर रघुबर दास फूले नहीं समाए. कुछ  

उद्योग से मरता जीवन

तेज आर्थिक विकास का सबसे ज्यादा नुकसान पर्यावरण को उठाना पड़ता है और प्रदूषण के रूप में इसके खतरे लोगों को झेलने पड़ते हैं. जमशेदपुर के लोगों के साथ भी ऐसा ही हो रहा है. विकास के नाम पर सालों पहले इस शहर को कल-कारखानों से पाट दिया गया और  

माओवादी और काॅरपोरेट ने पिछले 15 सालों में झारखंड को तिजोरी की तरह ही देखा

झारखंड 15 साल का हो गया. आप जैसे लोग झारखंड आंदोलन से जुड़े रहे हैं. इस 15 सालों के सफर में झारखंड की दशा-दिशा पर क्या सोचते हैं? झारखंड बनने के लिए लंबा आंदोलन चला. राज्य बनने के पहले भीतरी-बाहरी की लड़ाई थी. हम लोगों ने समझ लिया कि ऐसा  

झारखंड को लगा हिंसा का रोग

जब इस लेख को लिखा जा रहा है, तब हाल और हालात ऐसे हैं कि झारखंड की राजधानी भय और आतंक के माहौल में है. अनहोनी की आशंका से उपजा एक अनजाना सा डर राजधानीवासियों को अपने आगोश में लिए हुए है. राजधानी पुलिस छावनी में बदल चुकी है. राजधानी  

‘हम जैसे लोगों को लोकसभा जाकर कानून बदलने होंगे’

कभी किसी के घर में काम करते हुए कॉमर्स में एमए करने वालीं दयामणि बरला झारखंड की चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता हैं. आदिवासी अधिकारों के लिए काम करते हुए उन्होंने राज्य में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ चर्चित लड़ाइयां लड़ी हैं.  

कोण कई लड़ाई वही

क्षेत्रीय दलों ने भले ही ज्यादातर सीटों पर टकराव बहुकोणीय बना दिया हो, लेकिन झारखंड में पाने-खोने की लड़ाई मुख्य तौर से भाजपा और कांग्रेस के बीच ही है  

‘अनिवासी’ सारंडावासी!

केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश की पहल के बाद सारंडा में विकास की उम्मीद जगी है. लेकिन उन सौ गांवों या तकरीबन 25 हजार लोगों के लिए नहीं जिनका नाम सरकारी दस्तावेजों से गायब है