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मोदी, भाजपा या राजनीति तो महज हथियार हैं, राष्ट्रवाद का उन्माद तो पूंजीवादियों को चाहिए : सच्चिदानंद सिन्हा

देश में इन दिनों राष्ट्रवाद का हो-हल्ला कुछ ज्यादा ही मचा हुआ है. आपने इस बारे में सुना और पढ़ा ही होगा लेकिन इस विषय पर कुछ कहा नहीं. क्या सोचते हैं आप? इस विषय को अगर प्रचलित तौर-तरीकों से समझने की कोशिश करेंगे तो पता चलेगा कि यह शब्द  

चैनल और आपदा

सिर्फ सरकार को ही नहीं, चैनलों को भी आपदा की भयावहता देर से समझ आई.  

अनहोनी का हिमालय

शोक का शोर नहीं होता, शोक में चुप्पी होती है. शोक में हम अपने भीतर टटोलते हैं. क्या हम वास्तव में ऐसा कर रहे हैं?  

इंडियन पैसा लीग

क्रिकेट को साफ करना जरूरी है, लेकिन उससे जरूरी हमारे समय के इस आक्रामक, अराजक और वैश्विक पूंजीवाद के संदिग्ध कारोबार से निपटना है  

हिचक का सबब

राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में आने से डर क्यों लग रहा है?