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एक और ‘नायर साहब’ की जरूरत

इस देश में सिनेमा का जादू ऐसा है कि कोई भी इससे बच नहीं सकता. फिल्में किसी को कम किसी को ज्यादा लेकिन प्रभावित जरूर करती हैं. सिनेमा का प्रभाव इतना भव्य है कि हर तरह के दर्शक के लिए यहां कुछ न कुछ मिल ही जाता है. दर्शकों पर  

मैं प्रो. सिरास से तो नहीं मिला, लेकिन मनोज बाजपेयी ने जिस तरह का रोल किया है उसे देख लगता है कि वे वैसे ही रहे होंगे : दीपू

प्रो. सिरास की जिंदगी पर आधारित फिल्म ‘अलीगढ़’ रिलीज होने वाली है. क्या फिल्म बनाने का विचार आपका था? प्रो. सिरास पर फिल्म बनाने का विचार मेरा नहीं था. हम पत्रकार लोग तो ये सब देखते रहते हैं. हम लोग सिर्फ स्टोरी लिखते हैं और भूल जाते हैं. 2013-14 में  

अलीगढ़ का वो प्रोफेसर

09 फरवरी 2010, के दिन अलीगढ़ की सुबह हर दिन की तरह सामान्य नहीं थी. ठंड के मौसम में माहौल में अजीब सी कड़वाहट घुली हुई थी. इसकी वजह विभिन्न अखबारों में प्रकाशित एक खबर थी, जो लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई थी. ये चर्चा अलीगढ़ मुस्लिम  

‘अगर आप वोट करने की उम्र से ऊपर हैं और राजनीति को संदेह से देखते हैं तो आपको बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहिए’

‘अवॉर्ड वापसी’  के चलते आप चर्चा में हैं. लोगों का कहना है कि ऐसा तो हमेशा से होता आया है तो फिर अब ऐसी कौन सी बात हुई है जो एक फिल्मकार इस पर बात कर रहा है. आप इस पर क्या कहेंगे? जब सिख विरोधी दंगे हुए तो उस  

‘किसी फिल्म में हीरो-हीरोइन का होना जरूरी नहीं’

‘मसान’  तक की अपनी यात्रा के बारे में बताइए. इसे बनाने का विचार कैसे आया? मसान तक की यात्रा के बारे में जानने से पहले ये जानना जरूरी है कि आखिर मैं फिल्मों में आया कैसे और एक फिल्मकार कैसे बना. बचपन में मैंने दूरदर्शन पर काफी कला फिल्में या  

सेंसर बोर्ड का कॉन्सेप्ट ही गलत

  आपकी फिल्म किस बारे में है?  फिल्म में दो अलग-अलग कहानियां हैं. दो अलग-अलग मुद्दे हैं. ये दोनों कहानियां कैसे एक-दूसरे से जुड़ती है ये दर्शक देखेंगे तो समझ जाएंगे. कोई भी फिल्मकार जब कुछ बनाता है तो ऐसे ही नहीं बनाता. जब आप फिल्म देखेंगे तो पाएंगे कि  

चाट मसाला

फिल्मी दुनिया की चटपटी खबरें