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छत्तीसगढ़ में एक तरफ अमीरों की सेना है, दूसरी तरफ आदिवासी

छत्तीसगढ़ की लड़ाई नक्सलवादियों के खिलाफ कतई नहीं है. यह खनिजों, जंगलों, नदियों पर कब्जे के लिए किया जाने वाला युद्ध है. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं कि भारत में आजादी से लेकर आज तक अमीर कंपनियों के लिए सारी जमीनों पर कब्जा पुलिस की लाठी और बंदूकों के  

‘23 साल का वह क्रांतिकारी इतना बड़ा हो गया है कि उस पर कोई पगड़ी फिट नहीं हो सकती’

भगत सिंह पर दावेदारी कोई नई बात नहीं है. यह काफी समय से जारी है. खास तौर पर जब से भगत सिंह की जन्म शताब्दी आई. जन्म शताब्दी वर्ष यानी 2007 में, पूरे वर्ष भगत सिंह के सिर पर पगड़ी पहनाने का प्रयास हुआ. पहले कभी-कभार हुआ करता था, फिर  

‘विभाजन के जख्म को बार-बार कुरेदकर पेश की जाती हैं नई पेचीदगियां’

यूरोपियन यूनियन (ईयू) के जो सदस्य देश हैं उनके बीच द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान खूनी संघर्ष हुआ था. इन देशों के बीच की कटुता भी तब भारत-पाकिस्तान के बीच की कटुता से कम नहीं थी पर आपसी कटुता मिटाकर उन्होंने नई शुरुआत की. आज आप उनका लेवल ऑफ इकोनॉमिक काेआॅपरेशन  

एक तरह की सामूहिक आकांक्षा है राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद का जो मुद्दा है, संविधान में उसके सारे प्रावधान निहित हैं. क्योंकि भारत जैसे विविधताओं से भरे देश में राष्ट्रवाद संविधान में आस्था और संवैधानिक प्रक्रियाओं से ही उभर सकता है. और कोई दूसरा तरीका शायद कामयाब नहीं हो. राष्ट्र के बारे में यह नहीं कहा जा सकता है  

एसटीएफ जवान बड़े लोगों के सब्जी-दूध ढो रहे हैं

बिहार में अपराध को लेकर रोजाना बयानों की टकराहट हो रही है. अपराध घटा है, बढ़ा है, ऐसी बयानबाजी, बहस का एक मसला हो सकता है लेकिन ये सच है कि राज्य में अपराधियों का हौसला बढ़ा है. पुलिस दबाव में दिख रही है और इसका कारण राजनीतिक है. यह  

राष्ट्रवाद की बहस पुनर्जीवित हुई है

राष्ट्रवाद की परिभाषा और राष्ट्रवाद का वर्तमान संदर्भ दोनों को समझना पडे़गा. वर्तमान संदर्भ फिर से उस बहस को पुनर्जीवित कर रहा है जिस बहस को 1920 में रोक दिया गया था. मैं 1920 इसलिए कह रहा हूं कि बाल गंगाधर तिलक का निधन 1920 में हुआ था. औपनिवेशिक काल  

हममें से देशद्रोही कौन नहीं है?

राष्ट्रवाद या यूं कहें कि ऑफिशियल राष्ट्रवाद इन दिनों सुर्खियों में है. एक तरफ ‘भारत माता की जय’ का नारा लगाते हुए और दूसरे ही सुर में मां-बहनों के नाम अपशब्दों की बौछार करते हुए लंपटों के गिरोह हर स्वतंत्रमना व्यक्ति को लातों-मुक्कों से, या जैसा कि बीते दिनों इलाहाबाद  

बहुत नाजुक है ये राष्ट्रवाद

राष्ट्रवाद पर मेरे जो विचार हैं, उस बारे में सबसे पहले हम भाषा से बात शुरू करते हैं. कुछ दिन पहले एक कार्यक्रम में सवाल किया गया था कि क्या एक राष्ट्र बनने के लिए एक भाषा की जरूरत नहीं है. उस सवाल का जवाब आयशा क‌िदवई ने उस वक्त दिया  

आईआरसीटीसी में शोषण का सिलसिला

कौन आईआरसीटीसी के कर्मचारी कब 01 फरवरी, 2016 कहां आईआरसीटीसी कार्यालय, नई दिल्ली ‘सावधान… 10 से 12 बजे के बीच शौच जाना मना है. अगर आप ऐसा करते पाई गईं तो नौकरी से हाथ भी धोना पड़ सकता है’ आपने शायद ही कभी ऐसा अजीबोगरीब नियम देखा या सुना होगा.  

‘भारत को भारत रहने दीजिए, यह आर्यावर्त नहीं होने वाला’

कुछ लोग यह सवाल उठा रहे हैं कि महिषासुर के प्रतीक को खड़ा करके हम मिथकीय नायकत्व की परंपरा को खत्म करने के बजाय मिथकीय परंपरा को ही आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. ब्राह्मणवादी मॉडल खारिज करने के बजाय अपने तरीके का नया ब्राह्मणवादी मॉडल खड़ा कर रहे