सवर्ण राजनेता: सप्तमो अध्याय समाप्ते ! | Tehelka Hindi

बिहार, राज्यवार A- A+

सवर्ण राजनेता: सप्तमो अध्याय समाप्ते !

बिहार में सवर्णों को अपने पाले में करने के लिए सवर्ण आयोग बनाने से लेकर सवर्णों तक को आरक्षण देने की राजनीति रोज हो रही है लेकिन शायद ऐसा पहली बार हुआ है कि वर्तमान सरकार के मंत्रिमंडल के जरिये सत्ता की सियासत से ब्राह्मणों को पूरी तरह से बाहर कर दिया गया है. तो क्या चाणक्य की कर्मभूमि में ब्राह्मणों की राजनीति का यह 'इतिश्री रेवाखंडे, सप्तमो अध्याय समाप्ते' वाला दौर है

निराला March 17, 2015, Issue 6 Volume 7

saptamoबिहार के कुछ ब्राह्मण नेताओं से बात कीजिए और उनकी बातों पर गौर कीजिए. बहुत दिलचस्प जवाब मिलते हैं उनसे. मिसाल के तौर पर जगन्नाथ मिश्र से पूछें कि फिलहाल तो किसी सवर्ण या ब्राह्मण के हाथ सत्ता की बागडोर आने की गुंजाइश नहीं दीखती, इसके जवाब में वे कह उठते हैं- अरे! क्यों नहीं. राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है. मिश्र तमिलनाडु का उदाहरण देते हुए कहते हैं, ‘देखिए, वहां दलित राजनीति होती है लेकिन दलितों की नेता तो जयललिता ही हैं न! फिर बिहार में ऐसी स्थिति क्यों नहीं हो सकती है? जयललिता ब्राह्मण हैं लेकिन दलितों की नेता हैं. एक और बड़े ब्राहमण नेता हैं जयनारायण त्रिवेदी. वे ब्राह्मण समाज के प्रमुख हैं और जदयू के उपाध्यक्ष भी रहे हैं. फिलहाल वे केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के कोषाध्यक्ष हैं. इससे आगे बढ़कर वे अतीत में झांकते हैं और फिर कहते हैं, ‘देखिए ब्राह्मणों ने हमेशा से चाणक्य की भूमिका निभाई है और भविष्य में भी वे इस भूमिका में सक्रिय रहेंगे. चाणक्य के बगैर सत्ता चल ही नहीं सकती.

एक नेता प्रेमचंद मिश्र हैं. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रहे हैं. वे बताते हैं कि असल में बिहार के ब्राह्मणों ने कांग्रेस का साथ छोड़ दिया इसलिए उनकी दुर्गति हो रही है. वे बुनियादी तौर पर ब्राह्मणों के विरोधी रहे लालू प्रसाद के साथ कांग्रेस से किनारा करके जाते रहे. प्रेमचंद मिश्र कहते हैं जिस दिन ब्राह्मण फिर से कांग्रेस के साथ आ जाएंगे, उसी दिन से उनका भाग्य बदल जाएगा.

कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष प्रेमचंद मिश्र का मानना है कि जिस दिन ब्राह्मण पार्टी के साथ हो जाएंगे उस दिन हमारे भाग्य बदलने लग जाएंगे   

आप अलग-अलग ब्राह्मण नेताओं से बात कीजिए, आपको सभी मंगल ग्रह से बात करते हुए नजर आएंगे. मानों वे राजनीति के मैदान से दूर आभासी संसार रचने में जुटे हों. वे चाणक्य से लेकर अब तक बिहार की राजनीति में ब्राह्मणों की राजनीतिक भूमिका बता देंगे. वे हकीकत से अनजान बने रहना चाहते हैं. बिहार को वे बार-बार चाणक्य की कर्मभूमि बताते हैं. चंद्रगुप्त को बनाने में चाणक्य की भूमिका को रेखांकित करते हैं लेकिन सच तो यह है कि उसी बिहार में जीतन राम मांझी प्रकरण के बाद नीतीश कुमार के नेतृत्व में जो सरकार बनी है, उस मंत्रिमंडल में एक भी ब्राह्मण शामिल नहीं है. संभव है कि यह आजादी के बाद का पहला मंत्रिमंडल है जिसमें एक भी ब्राह्मण नहीं है. इस मंत्रिमंडल को देखते हुए यह बात पानी की तरह साफ हो चुकी है कि बिहार की राजनीति में कभी ब्राह्मणों का वर्चस्व रहा होगा लेकिन अब उन्हें तवज्जो देने न देने से कोई फर्क नहीं पड़नेवाला. राज्य की राजनीति के लिए अब ‘वे सबसे निष्क्रिय व अनुपयोगी समूह में तब्दील हो चुके हैं.

दिलचस्प यह है कि जाति की राजनीति के खोल में समा चुकी या समाने को बेचैन बिहार की राजनीति में ब्राह्मणों को एक सिरे से बाहर कर देने का मसला महत्वपूर्ण नहीं है. हां, सवर्णों के नाम पर राजनीतिक गलियारे मंे रोज-ब-रोज बात जरूर हो रही है. नीतीश कुमार पहले तो सवर्णों के लिए सवर्ण आयोग बनाकर अपनी राजनीति साधने में लगे हुए थे लेकिन मांझी सवर्णों के लिए अलग से आरक्षण का पासा फेंक चुके हैं. इस बिगड़े समीकरण में अगड़ी जातियों को एक सवर्ण समूह में बदलने के बाद ब्राह्मणों का नुकसान सबसे ज्यादा हुआ है.

गौरतलब है कि बिहार में सवर्ण जातियों में आबादी के आधार पर सबसे बड़ी जाति ब्राह्मणों की है लेकिन जिस बिहार में चाणक्य को एक प्रतीक मानकर बार-बार ब्राह्मणों को श्रेष्ठ रणनीतिकार बताया जाता रहा है और जिस बिहार में कई ब्राह्मण नेताओं ने बतौर मुख्यमंत्री और मंत्री रहकर लंबे समय तक राज किया है आज वहां ओबीसी राजनीति के उभार के बाद अतिपिछड़ों व दलित-महादलितों की राजनीति के उभार के दौर में ऐसा क्या हो गया कि सवर्ण समूह की तो हैसियत बढ़ी लेकिन ब्राह्मण इतने उपेक्षित या अनुपयोगी होते गये? राजनीतिक विश्लेषक प्रेम कुमार मणि  बताते हैं कि सवर्णों के समूह में ब्राह्मणों को हाशिये पर धकेल दिया जाना बहुत स्वाभाविक है. यह वह समूह है, जो कुख्यात लोगों को पैदा नहीं कर सकता. दबंगों को पैदा नहीं कर सकता फिर राजनीतिक पार्टियों के लिए क्यों उपयोगी बना रहेगा? मणि कहते हैं- ‘बिहार की राजनीति में ब्राह्मण एक ही बार सबसे महत्वपूर्ण रहे हैं. यह एक मिथ गढ़ लिया गया है कि कांग्रेस के समय में ब्राहमणों की चलती थी. वह कहते हैं कि 30 के दशक में जायेंगे तो कायस्थों का वर्चस्व कांग्रेस में था. उसके बाद भूमिहारों व राजपूतों का आया. बाद में इंदिरा गांधी ने जब नये राजनीतिक समीकरण बनाये तो उसमें ब्राहमणों को अलग किया और ब्राह्मणों के साथ पिछड़े, दलितों व मुसलमानों को मिलाकर सत्ता की सियासत के लिए एक नया समीकरण बनाया जो हिट हुआ. इसे लेकर सवर्णों की ही दूसरी जातियों में ब्राह्मणों से ईर्ष्या बढ़ी. मणि कहते हैं कि बिहार में जेपी (जयप्रकाश नारायण) आंदोलन के समय ब्राह्मणों को दरकिनार कर दिया गया था. जेपी आंदोलन के समय इस तरह का एक नारा चला था- लाला, ग्वाला और अकबर के साला वाली जाति की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है. मणि संभावना टटोलले हुए कहते हैं कि बिहार में अब आगे दूसरे रूप में ब्राह्मणों का राजनीतिक महत्व बढ़ने की गुंजाइश दिखाई देती है क्योंकि जीतन राम मांझी ने दलित राजनीति के नये अध्याय की शुरुआत कर दी और दलित जब राजनीति में अपना आयाम तलाशेगा तो अतिपिछड़ों के साथ ब्राह्मणों का ही समीकरण बनाना उसके लिए सबसे बेहतर होगा. ब्राह्मणों को दलितों के नेतृत्व का साथ देना होगा और इससे ब्राह्मण समूह को कोई परेशानी भी नहीं होगी. ऐसा पहले भी होता रहा है.

राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन ने बातचीत में कहा, ‘ब्राह्मणों को ऐतिहासिक सम्मोह छोड़ना होगा. वे अब भी अतीत में जी रहे हैं इसलिए उनकी यह गति तो होनी  थी. रही बात भूमिहार और राजपूतों को तवज्जो मिलने की तो उसकी एक वजह यह है कि इन दोनों अगड़ी जातियों का एक हिस्सा समाजवादी और वामपंथी आंदोलन में सक्रिय भूमिका में रहा इसलिए उनकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है. सुमन कहते हैं कि एक और बात पर आप गौर करें कि 1980 से 90 के बीच ब्राह्मणों का वर्चस्व बिहार की राजनीति में रहा और रामलखन सिंह यादव जैसे दिग्गज कांग्रेसी नेताओं को दरकिनार कर विंदेश्वरी दुबे और भागवत झा ‘आजाद’ को मंत्री और मुख्यमंत्री बनाया गया था.  यह प्रकृति और राजनीति का नियम है कि शीर्ष पर पहुंचने के बाद ढलान की बारी आती है. कुछ वर्षों बाद ओबीसी राजनीति का भी पराभव काल शुरू होगा जिसकी दस्तक सुनायी देने लगी है.

Pages: 1 2 Single Page

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 7 Issue 6, Dated March 17, 2015)

Type Comments in Indian languages