अभियानों के अभियान पर

जानकार मेक इन इंडिया को भी वाइब्रेंट गुजरात के तर्ज की ही एक योजना के रूप में देखते हैं. यह भव्य है, इसकी माकेंर्टिंग और पैकेजिंग में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी गई है. लेकिन इस मेक इन इंडिया के तहत देश का कितना निर्माण होता है इस पर कई तरह के किंतु-परंतु हैं.

जिस मेक इन इंडिया को लेकर मोदी सातवें आसमान पर हैं और चाहते हैं कि पूरी कायनात उसे सफल बनाने में उनका साथ दंे, उस मेक इन इंडिया को उनकी मातृ संस्था आरएसएस ही लाल झंडा दिखा रही है. हाल ही में एक बयान जारी कर संघ के आनुषंगिक संगठन स्वदेशी जागरण मंच ने मेक इन इंडिया को देश के लिए आत्मघाती कदम ठहराया. मंच के अखिल भारतीय सह संयोजक भगवती प्रकाश शर्मा के मुताबिक मेक इन इंडिया बहुराष्ट्रीय कंपनियों से सामान आयात करने जैसा है. यह देश की अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक होगा. उनके अनुसार देश को मेक इन इंडिया नहीं बल्कि मेक बाई इंडिया की जरूरत है.

अपनी महत्वाकांक्षी योजना की राह आसान करने के लिए प्रधानमंत्री ने श्रम कानून में बड़े बदलाव की शुरुआत की है. इसका नाम उन्होंने श्रमेव जयते दिया है. इसकी भी विभिन्न हलकों में काफी आलोचना हो रही है. श्रमेव जयते पर सवाल उठाने का सबसे पहला काम खुद संघ ने ही किया. भारतीय मजदूर संघ के महासचिव ब्रजेश उपाध्याय कहते हैं, ‘मजदूरों से जुड़ा फैसला करते समय प्रधानमंत्री ने मजदूर संगठनों से ही कोई बात नहीं की, यहां तक की मजदूर संघ से भी नहीं. ऐसा लगता है कि औद्योगिक घरानों के हित साधने के लिए मोदी सरकार रास्ता बना रही है.’

मेक इन इंडिया भी वाइब्रेंट गुजरात के तर्ज की योजना हैं. यह भव्य है, इसकी पैकेजिंग शानदार है लेकिन इसकी राष्ट्रनिर्माण की क्षमता साबित होना बाकी है

संघ के अलावा भी अन्य कई हिस्सों से मेक इन इंडिया के विचार और उसके लिए किए जा रहे श्रम सुधारों की आलोचना हो रही है. उद्योगपतियों के लिए सस्ता श्रम उपलब्ध कराने, मजदूरों के मानवाधिकारों के साथ खिलवाड़ करने से लेकर पूंजीपतियों के फायदे के लिए कुछ भी कर गुजरने के आरोप लगाए जा रहे हैं. सामाजिक कार्यकर्ता हिमांशु कुमार इसे कुछ इस तरह बयान करते हैं, ‘आपने कहा कि कम मेक इन इंडिया यानी विदेशी कंपनियों आओ अपना माल भारत में बनाओ, यह काम तो अमीर देशों की कंपनियां दसियों सालों से कर रही हैं, यह मुनाफाखोर कंपनियां उन्हीं देशों में अपने कारखानें खोलती हैं जहां उन्हें सस्ते मजदूर मिल सकें और पर्यावरण बिगाड़ने पर सरकारें उन्हें रोक न सकें.’

सांसद आदर्श ग्राम योजना

मोदी के नवाचारों में सांसद आदर्श ग्राम योजना भी एक महत्वपूर्ण कदम है. इस योजना के अनुसार देश का हर सांसद अपने संसदीय क्षेत्र के एक गांव को गोद लेगा और उसे अगले एक साल में आदर्श गांव के रूप में विकसित करेगा. मोदी के मुताबिक यह विकास आपूर्ति पर आधारित मॉडल की बजाय मांग और जरूरत तथा जनता की भागीदारी पर आधारित होगा. योजना के तहत गांवों में बुनियादी और संस्थागत ढांचा विकसित किया जाएगा, साफ-सफाई रखी जाएगी और वहां शांति-सौहार्द के साथ लैंगिक समानता और सोशल जस्टिस पर जोर दिया जाएगा. प्रधानमंत्री के शब्दों में, ‘हमारे देश में हर राज्य में 5-10 ऐसे गांव जरूर हैं जिसके विषय में हम गर्व कर सकते हैं. उस गांव में प्रवेश करते ही एक अलग अनुभूति होती है. हमें ऐसे बहुत सारे गांव बनाने हैं.’

इस योजना के अनुसार 2016 तक प्रत्येक सांसद एक गांव को विकसित करेगाे और 2019 तक दो और गांवों का विकास होगा. प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर राज्य सरकारें भी विधायकों को इस योजना के लिए काम करने को प्रोत्साहित करें तो इसी समय सीमा में जिले के 5 से 6 और गांवों को विकसित बनाया जा सकता है.

इस योजना पर लोग दो सवाल उठाते हैं. पहला यह कि क्या देश-भर में मुट्ठीभर गांवों के आदर्श बन जाने से देश के सारे गांव आदर्श हो जाएंगे. और दूसरा यह कि क्या ये सिर्फ प्रचार पाने का तरीका नहीं है कि हम आदर्श ग्राम बनाने जा रहे हैं. क्योंकि गांवों को लेकर केंद्र और राज्य सरकार की दर्जनों योजनाएं पहले से गांवों में काम कर रही हैं. गांवों को आदर्श बनाने के लिए जब पहले से ही इतनी योजनाएं हैं तब यह योजना उन योजनाओं की संख्या में एक और वृद्धि भर नहीं है?

प्रधानमंत्री अपनी जनता से सीधे ‘मन की बात’ कह रहा है. वह चिट्ठियों के माध्यम से दूर-दराज के क्षेत्रों से भेजे गए लोगों के सवालों का जवाब भी देता है

स्मार्ट सिटी

एक तरफ जहां मोदी गांवों को आदर्श बनाने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ देश में 100 स्मार्ट शहरों को बसाने का सपना भी देख रहे हैं. सरकार का कहना है कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत जिन शहरी इलाकों को शामिल किया जाएगा वहां 24 घंटे बिजली और पानी की व्यवस्था होगी, शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधाएं होंगी, साइबर कनेक्टिविटी और ई-गवर्नेन्स की सुविधा होगी, हाईटेक ट्रांसपोर्ट नेटवर्क बहाल किया जाएगा और सीवर और कचरा निबटान का सौ फीसदी इंतजाम होगा.

मोदी के स्मार्ट शहर की योजना जमीन पर कब और कैसे आकार लेगी यह तो समय बताएगा लेकिन इसको लेकर अभी से दो हिस्से हो चुके हैं. एक तबका इसको लेकर बहुत आशान्वित है तो वहीं दूसरा इसे लेबल बदलने से ज्यादा नहीं मानता. शहरी विकास मंत्रालय के पूर्व अधिकारी ए.एस वासुदेव कहते हैं, ‘ देखिए तमाम योजनाओं के बाद भी शहरों का क्या हाल है यह हमारे सामने है. वजह ये है कि हम हवा में शहर खड़ा करने की सोचते हैं. नए शहर के लिए सबसे जरूरी है इंफ्रास्ट्रक्चर, उसमें हम कोई निवेश ही नहीं करते. यह ऐसा ही है कि आप भैंस को चारा-पानी न दें लेकिन दूध निकालने के लिए घर के सारे बर्तन लेकर पहुंच जाएं. अभी तो हम सिटी बनाने से ही दूर हैं. स्मार्ट सिटी तो कल्पना की बात है. खाली मार्केटिंग से न तो शहर बनते हैं न ही वो स्मार्ट हो जाते हैं.’

स्मार्ट सिटी पर चर्चा करते हुए देश के कुछ स्मार्ट कंस्ट्रक्शंस की बरबस याद आ जाती है. मसलन इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पिछले दो साल से टीथ्री नाम का टर्मिनल बारिश के मौसम में पानी में डूब जाता है. यात्री तैराकी करते हुए अंदर-बाहर आते-जाते हैं. दूसरी घटना हाल ही की है जब रिलायंस कंपनी द्वारा संचालित मुंबई मेट्रो में बारिश के समय चलती मेट्रो की छत से पानी बरसने लगा. ये उदाहरण प्रासंगिक इसलिए हैं क्योंकि ये दोनों ही प्रोजेक्ट हमारी चरम स्मार्टनेस का प्रतीक रहे हैं. इन पर खूब धन और मन खर्च हुआ है. इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा तो कॉमनवेल्थ खेलों के समय विशेष रूप से तैयार किया गया था. ऐसे ही कॉमनवेल्थ खेलों के समय बने पूल और मकान भी हैं जिनमें टूट-फूट की खबरें आए दिन आ रही हैं. ऐसे में स्मार्ट सिटी का विचार किस रूप में सामने आता है यह देखना दिलचस्प होगा.

जनता और सरकार के बीच मौजूद खाई को खत्म करने के लिए एक पुल बनाए जाने की आवश्यकता है. उसी का परिणाम है माईगवडॉटइन नामक वेबसाइट

मन की बात

मोदी के नए-नवेले विचारों की श्रृंखला में मन की बात एक अहम शुरुआत है. पिछले कुछ समय में जिस तरह से लोक और तंत्र के बीच दूरियां बढ़ती गई हैं, सत्ता का समाज से संवाद खत्म होता गया है उस रौशनी में इसे देखें तो यह एक अच्छी शुरुआत जान पड़ती है. पिछले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लेकर लोगों की सबसे बड़ी शिकायत यही थी कि वे बोलते नहीं थे. सोशल मीडिया पर मनमोहन सिंह का मजाक बनाते तमाम पोस्ट इसकी गवाही देते हैं. हमारे यहां स्थिति कुछ ऐसी है कि प्रधानमंत्री कुछ करें या न करें लेकिन वो चुप नहीं रहने चाहिए. इस देश का मिजाज ऐसा है कि उसे चुप रहनेवाले रास नहीं आते. यहां कहा भी जाता है कि बात करने से बहुत सारी चिंताएं और समस्याएं दूर हो जाती हैं. इतिहास में जाकर देखें तो पता चलता है कि कैसे जनता ने उन नेताओं को सर पर उठाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी जो बात करते थे, मिलते-जुलते थे, हालचाल पूछते थे. ऐसे नेता जमीनी स्तर पर बिना कुछ खास किए लंबे समय तक लोगों के दिल में राज कर सके. इस कड़ी में सबसे बड़ा उदाहरण जवाहरलाल नेहरू का है जिनके बारे में कहा जाता है कि वे जिस अधिकार के साथ ब्रिटेन के प्रधानमंत्री और महारानी से संवाद करते थे उसी सहजता के साथ देश की ज्यादातर अशिक्षित जनता के साथ भी घुलमिल जाते थे.

काफी लंबे समय से जनता और नेता के बीच का यह संवाद गायब था. मोदी ने इस टूटी हुई कड़ी को फिर से जोड़ने की कोशिश की है. इसके लिए उन्होंने बेहद जन लोकप्रिय माध्यम रेडियो को चुना है. मोदी ने तय किया है कि वो महीने में दो बार रेडियो के माध्यम से जनता को संबोधित करेंगे. जनता से हो रहे इस एकतरफा संवाद में कोई ऐसी खास बात नहीं है जो मोदी अपनी सभाओं और दूसरी जगहों पर नहीं कहते हों. इसका महत्व इस बात में छिपा है कि देश का प्रधानमंत्री अपने देश के लोगों से सीधे ‘मन की बात’ कह रहा है. वह चिट्ठियों के माध्यम से देश के दूर-दराज से भेजे गए लोगों के सवालों का जवाब भी देता है. मोदी के लिए मन की बात जनता तक पहुंचने के साधनों का विस्तार है. वो जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए हर उस माध्यम का प्रयोग कर रहे हैं जो अस्तित्व में है.

रन फॉर यूनिटी

देश के पहले गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को इस साल से मोदी सरकार ने एकता दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है. कांग्रेसी रहे पटेल की मोदी तमाम अवसरों पर तारीफ करते रहे हैं. उन्हें जानबूझकर या अनजाने में गांधी और नेहरू के बराबर या उनसे बड़ा बनाकर खड़ा करते रहे हैं. अगर हम ध्यान दें तो पिछले कुछ सालों में दो पुराने नेता बड़ी तेजी से चर्चा के केंद्र में आए हैं. एक भीमराव अंबेडकर और दूसरे सरदार पटेल. सियासत की जमीन पर तेजी से दौड़ रहे नरेंद्र मोदी ने उस तबके को रन फॉर यूनिटी के जरिए आकर्षित किया है जिसके मन में बहुत गहरे तक यह बात बैठी है कि कांग्रेस ने सरदार पटेल के साथ न्याय नहीं किया. यह वो तबका है जो मानता है कि नेहरु की जगह यदि पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री बने होते तो तस्वीर कुछ और होती. देश में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो इस तरह की शिकायत करते हुए मिल जाएंगे कि कैसे पटेल की जयंती और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का ‘बलिदान’ दिवस एक ही दिन पड़ने के बावजूद कांग्रेस इंदिरा के योगदानों पर तो चर्चा करती है लेकिन पटेल का जिक्र तक नहीं आता. एकतरफ अखबारों में इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा के आशय वाले विज्ञापन छपते हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस पार्टी में पटेल को उनके कामों के माध्यम से याद करने का प्रयास तक नहीं दिखता. कुछ लोग इसे कांग्रेस की बौद्धिक बेईमानी बताते हुए पटेल के जन्मदिन को एकता दिवस के रूप में मनाए जाने की तारीफ करते हैं. इतिहास के प्राध्यापक रहे निर्मल कोठारी कहते हैं, ‘इतिहास में मिट्टी डालने और खोदने का काम चलता रहता है. कांग्रेस ने जिस पटेल पर मिट्टी डाली थी उन्हें मोदी ने खोद निकाला है. धीरे-धीरे आप देखेंगे वो कांग्रेस के हर उस नेता को ढूंढ निकालेंगे जिन्हें जनमानस में बनाए रखने के लिए कांग्रेस ने कोई प्रयास नहीं किया. इतिहास अपने आप को इसी तरह दुरुस्त करता है.’

प्रधानमंत्री जन-धन योजना

पिछले पांच महीने में मोदी की तूफानी तेजी ने एक और योजना को जन्म दिया है. नाम है प्रधानमंत्री जन धन योजना. प्रधानमंत्री ने 68वें स्वाधीनता दिवस पर ऐतिहासिक लाल किले के अपने भाषण में पहली बार इस योजना का जिक्र करते हुए कहा था, ‘प्रधानमंत्री जनधन योजना के माध्यम से हम देश के गरीब से गरीब लोगों को बैंक खाता की सुविधा से जोड़ना चाहते हैं. देश में ऐसे करोड़ों परिवार हैं जिनके पास मोबाइल फोन तो है लेकिन बैंक में खाता नहीं है. किसान साहूकार का कर्ज नहीं दे पाता तो मजबूरन आत्महत्या कर लेता है. यह योजना ऐसे परिवारों के लिए सोचकर बनायी गयी है.’

इस योजना के तहत लोगों के या तो नए खाते खोले जा रहे हैं या फिर अगर पहले से उनके पास बैंक खाता है तो इस योजना को उससे जोड़ दिया जाएगा. योजना के तहत तहत 15 करोड़ गरीब लोगों के बैंक खाते खोले जाने हैं. इसमें 5,000 रुपए की ओवरड्राफ्ट सुविधा तथा एक लाख रुपये के दुर्घटना बीमा संरक्षण की सुविधा भी होगी. इस योजना के तहत पिछले 4 महीने में करीब 5.29 करोड़ खाते खोले गए हैं. इस योजना की घोषणा होने के बाद जो बैंक खाता खोलने में ना-नुकुर किया करते थे वे लोगों का हाथ पकड़कर खाता खुलवाते दिखे. इस योजना की तारीफ कांग्रेस के नेता भी करते दिखे. आंकड़ों के आइने में योजना की सफलता और साफ हो जाती है. योजना लागू होने के पखवारे भर के भीतर इन खातों के जरिए बैंकों के पास पांच हजार करोड़ रुपए पहुंच गए.

मेरी सरकार (mygov.in)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केन्द्र की सत्ता में अपने 60 दिन पूरे होने पर बयान दिया कि उन्हें यह महसूस हो गया है कि सरकारी कामकाज और जनता के बीच बड़ी दूरी होती है. जनता और सरकारी कामकाज की प्रक्रिया के बीच मौजूद इस खाई को खत्म करने के लिए एक पुल बनाए जाने की आवश्यकता है. उसी का परिणाम है माईगवडॉटइन नामक वेबसाइट. इसे इस रूप में विकसित किया गया है जहां आम जनता सरकार की विभिन्न योजनाओं को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दे सकती है और साथ ही अगर उसके पास शासन से जुड़ी कोई योजना है तो उसे सरकार से साझा कर सकती है. सरकार का दावा है कि इसके जरिए देश के विकास की बुनियाद में जनता की भागीदारी सुनिश्चित की जा सकती है. मोदी के मुताबिक इसके माध्यम से हर नागरिक की ऊर्जा और उसकी क्षमता का राष्ट्र के विकास के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. वेबसाइट को निर्मल गंगा, बालिका शिक्षा, स्वच्छ भारत, स्किल इंडिया, डिजिटल इंडिया जैसे कई समूहों में बांटा गया है.

वेबसाइट के पिछले कुछ समय के कामकाज से पता चलता है कि बड़ी संख्या में जनता ने सरकार के कार्यक्रमों और योजनाओं पर अपनी प्रतिक्रिया दी है. इसके साथ ही सरकार द्वारा शुरू किए जा रहे किसी कार्यक्रम की घोषणा होने के बाद उससे जुड़े विभिन्न पहलुओं जैसे- लोगो डिजाइन से लेकर अन्य विषयों पर यहां आम जनता के लिए प्रतियोगिता आयोजित की जाती है. ये सारी चीजें किसी ने किसी रूप में पहले भी थीं लेकिन अंतर यह है कि इस बार इसके लिए एक अलग मंच (वेबसाइट) का निर्माण कर दिया गया है. यह पूरी तरह से प्रतिक्रिया के लिए ही बनाई गई है.

मोदी के पिछले पांच महीने का कार्यकाल जिन कई नवाचारों और प्रयोगों से भरा है उसमें दिवाली के मौके पर उनका कश्मीर जाना भी शामिल है. दिवाली के कुछ दिन पहले मोदी ने घोषणा कर दी कि वो दिवाली कश्मीर के बाढ़ पीड़ितों के साथ मनाएंगे. मोदी वहां गए भी. इसे मोदी का बेहद चतुर राजनीतिक कदम माना गया. कई हलकों में इसकी तारीफ हुई. राज्य के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, पीडीपी की नेता महबूबा मुफ्ती समेत तमाम सियासी पार्टियों ने मोदी के इस कदम की सराहना की. जम्मू कश्मीर से देश के प्रधानमंत्री का यह संवाद एक नए संबंध की तरफ इशारा था. हालांकि उनके राजनीतिक विरोधियों ने इसे दिखावा कहकर खारिज भी किया. कुछ का ये भी कहना था कि जो लोग दिवाली नहीं मनाते उनके बीच दिवाली मनाने का क्या मतलब. अगर लगाव ही है तो ईद मनाने क्यों नहीं आए. लोगों ने उसे आगामी राज्य विधानसभा चुनाव के प्रचार के रूप में भी देखा. कश्मीर के वरिष्ठ पत्रकार मीर इमरान कहते हैं, ‘मोदी राजभवन आए और वहां पहले से चुने हुए लोगों से मिल कर चले गए. आम कश्मीरी तो बाढ़ से तबाह अपने घर को बनाने में लगा है. उसको क्या पता कौन आ रहा है कौन जा रहा है.’ खैर अपनी इसी कश्मीर यात्रा में मोदी सियाचिन भी गए. वहां जाकर सैनिकों से मिले और उन्हें दिवाली की बधाई दी. ये पहली बार था जब भारत का कोई प्रधानमंत्री किसी त्योहार के मौके पर सियाचिन की दुर्गम चोटियों पर जाकर सैनिकों से मिल रहा था. इन कदमों का अपना एक प्रतिकात्मक महत्व है और नरेंद्र मोदी इसके माहिर नेता माने जाते हैं. मोदी की इस सक्रियता और उनकी प्लानिंग को कई लोग इवेंट मैनेजमेंट करार देते हैं. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर उन्हें पीएम की जगह ईएम अर्थात इवेंट मैनेजर बताते हैं. वो कहते हैं, ‘सभी देशों के पास ‘पीएम’ (प्राइम मिनिस्टर) होता है, हमारे पास ‘ईएम’ (ईवेन्ट मैनेजर) है.’

फिलहाल नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा जो कुछ किया जा रहा है वह सब बहुत विशाल दिख रहा है. एक भव्य आयोजन की तरह. चाहे उनकी अमेरिका यात्रा हो या नेपाल की. हर जगह लगता है मानों मोदी गए और छा गए. जानकारों के मुताबिक अभी शुरुआत है इसलिए लोगों का रुझान बना हुआ है लेकिन जल्द जनता इससे ऊब जाएगी. उसे कुछ ठोस चाहिए होगा. वो जानना चाहेगी कि अमेरिका में उनका प्रधानमंत्री खाली घूमने और ओबामा के साथ फोटो खिंचावाने गया था या वहां से देश के लिए कुछ लेकर भी आया. पांच साल के बाद चुनावों में जनता के पास जाने के लिए मोदी के पास कुछ जमीनी बताने लायक होना चाहिए. इन योजनाओं और अभियानों की सारी सफलता आनेवाले कुछ दिनों में जमीन पर महसूस कर सकने लायक बदलाव से तय होगी. प्रधानमंत्री का हनीमून पूरा हो चुका है, लेकिन जनता का हनीमून जारी है. अभी वो इस बात से ही खुश है कि उनका प्रधानमंत्री उनसे बात करता है, लालकिले से बुलेटप्रूफ शीशे के बगैर बात करता है. विदेश में जाता है तो माहौल बना देता है. आम मजदूरों की तरह फावड़ा लेकर मिट्टी निकालता है, झाड़ू लगाता है, अपने घर-परिवार वालों को कोई लाभ नहीं पहुंचाता है. गाहेबगाहे अपने पड़ोसी को ललकारता भी है. इस खुशनुमा माहौल को बनाए रखने में सिर्फ एक ही चीज नरेंद्र मोदी के काम आएगी वह है आनेवाले कुछ दिनों में इन सारी योजनाओं से होनेवाले कुछ स्थायी और वास्तविक जमीनी बदलाव. अगर जल्द ही जनता यह बदलाव महसूस नहीं करती है तो फिर मोहभंग की शुरुआत भी हो सकती है.

4 COMMENTS

  1. वास्तविकता है पीएम मोदी एक बहुत बड़े इवेंट मैनेजर है और उनकी योजना और प्रयासों में कितनी मजबूती है . ये तो समय ही बताएगा। आपने अच्छा लिखा है…

  2. मोदी बहुत मेहनती है। ………। पर मैं तहलका के संपादक से पूछना कि इसका प्रिंट वाराणसी में नहीं मिल रहा है। …क्यो…। बताये। …

  3. नरेंद्र मोदी ने देश को पाॅलिटिकल मार्केटिंग का फण्डा बताया है। लेकिन लोकतंत्र में यह प्रयोग हर बार सफल होगा। मुमकिन नहीं। आखिर, गुणवत्ता भी कोई शब्द है जिसे सार्थक करना सरकार का दायित्व है। मोदी सरकार इस पर कहीं खरा नहीं उतरती।

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