कुनन-पोशपोरा सामूहिक बलात्कार कांड : किताब में दर्ज हुआ दर्द | Tehelka Hindi

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कुनन-पोशपोरा सामूहिक बलात्कार कांड : किताब में दर्ज हुआ दर्द

1991 में कश्मीर के कुनन और पोशपोरा गांवों में बलात्कार की शिकार हुई महिलाओं को अब भी न्याय की आस है. इनकी पीड़ा और व्यवस्था की असंवेदनशीलता को पांच महिलाओं ने किताब की शक्ल में दर्ज किया है.

रियाज़ वानी 2016-05-31 , Issue 10 Volume 8
डू यू रिमेंबर कुनन-पोशपोरा किताब की लेखिकाएं नताशा राथर, इफराह बट, मुनाज़ा राशिद, समरीना मुश्ताक और इस्सर बतूल (बाएं से दाएं)

डू यू रिमेंबर कुनन-पोशपोरा किताब की लेखिकाएं नताशा राथर, इफराह बट, मुनाज़ा राशिद, समरीना मुश्ताक और इस्सर बतूल (बाएं से दाएं)

16 दिसंबर, 2012 को दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था. जाहिर है कश्मीर भी इस घटना से अछूता नहीं था जहां बलात्कार की शिकार तमाम महिलाओं को कब का भुला दिया गया है. इस घटना ने उनके जख्मों को फिर से हरा कर दिया था. वर्ष 1991 में 23 फरवरी कश्मीर के इतिहास में काले दिन के रूप में दर्ज है. उस रोज उत्तरी कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के कुनन और पोशपोरा गांवों में तकरीबन 30 महिलाओं के साथ सामूहिक बलात्कार हुआ था, जिसका आरोप सेना पर है. इस घटना के तकरीबन 22 साल बाद जनवरी 2013 में घाटी की 50 महिलाओं ने बलात्कार की शिकार इन महिलाओं की मदद के लिए एक समूह का गठन किया. इस समूह में विद्यार्थी, सामाजिक कार्यकर्ता, घरेलू महिलाएं, डॉक्टर और सरकारी कर्मचारी थे.

समूह ने इन महिलाओं को उस मानसिक सदमे से उबारने का संकल्प लिया तो वहीं मीडिया ने बलात्कार के इन मामलों की फिर से जांच करवाने की अपील की. जांच के लिए एसएसपी रैंक के अधिकारी के नेतृत्व में एसआईटी का गठन किए जाने की मांग को लेकर एक याचिका पर जागरूक नागरिकों के हस्ताक्षर लिए गए. जून 2013 में इस समूह की सक्रियता से प्रभावित होकर एक स्थानीय अदालत ने मामले में आगे की जांच करने और दोषियों की पहचान किए जाने के निर्देश सरकार को दिए. हालांकि मामले में नया मोड़ पिछले साल मार्च में तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने मामले की दोबारा जांच शुरू करने पर सेना की आपत्ति के बाद इस पर रोक लगा दी.

बहरहाल पांच कश्मीरी महिलाओं- इस्सर बतूल, इफराह बट, समरीना मुश्ताक, मुनाज़ा राशिद और नताशा राथर ने उन बर्बर घटनाओं को कलमबद्ध करने की ठानी. उनकी किताब ‘डू यू रिमेंबर कुनन पोशपोरा?’ का लोकार्पण बीते जनवरी में जयपुर साहित्य महोत्सव में हुआ वहीं श्रीनगर में किताब का लोकार्पण 23 फरवरी को हुआ.

भारत के इस सबसे बड़े सामूहिक बलात्कार कांड में  न्याय तो दूर की बात है सरकार इन अत्याचारों को सामने लाने के प्रयासों के प्रति भी निष्ठुर बनी रही

इस्सर बताती हैं, ‘किताब उन महिलाओं के अनुभवों के माध्यम से न्याय प्रक्रिया, सरकार की जिम्मेदारी, लांछन और इस सदमे के लंबे असर की पड़ताल करती है. भारतीय सेना द्वारा कुनन और पोशपोरा में किए गए सामूहिक बलात्कारों पर दोबारा चर्चा कुछ हद तक दिसंबर 2012 में हुए निर्भया कांड के कारण हुई. उस लड़की के साथ हुई बलात्कार की घटना ने कश्मीरियों पर गहरा असर डाला. दिल्ली की इस पीड़िता के लिए सभी ने व्यापक तौर पर एकजुटता महसूस की. ऐसे में हमारा ध्यान इस ओर गया कि दिल्ली में हुई एक घटना ने पूरे देश में सनसनी फैला दी लेकिन कश्मीर के दो गांवों में महिलाओं के पूरे समूह के साथ हुए बलात्कार ने बीते वर्षों में शायद ही किसी का ध्यान खींचा होगा.’ इस फर्क को लेकर लेखिका इस्सर व्यथित हैं. वे कहती हैं, ‘एक ऐसे देश में जो सारी दुनिया में खुद के ‘सबसे बड़ा लोकतंत्र’ होने का दम भरता है, वहां सेना द्वारा किए गए बलात्कारों को माफ कैसे किया जा सकता है?’

किताब लिखने वाली नताशा, इस्सर और समरीना सामाजिक कार्यकर्ता हैं. मुनाज़ा वकील हैं, वहीं इफराह ‘अंतरराष्ट्रीय संबंधों’ की पढ़ाई कर रही हैं. ऐसा नहीं था कि इन्होंने शुरू से ही किताब लिखने का फैसला कर लिया था. बलात्कार पीड़िताओं से बात करने के दौरान यह विचार उनके दिमाग में आया. समरीना बताती हैं, ‘दोबारा जांच शुरू किए जाने के लिए याचिका दायर करने के दौरान ही हम लगातार

इन गांवों में जा रहे थे. ये महिलाएं भी कुनन और पोशपोरा मामले से संबंधित कार्यक्रमों के सिलसिले में श्रीनगर आती रहती थीं. ऐसे ही कार्यक्रमों के दौरान और कभी-कभार कोर्ट में हम इन पीड़िताओं से मिलते थे. हमें उनका पूरा सहयोग मिला. अगर उन्होंने हम पर यकीन न किया होता तो हम यहां तक नहीं पहुंच पाते.’

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2013 में एक कार्यक्रम के दौरान इन लेखिकाओं की मुलाकात बलात्कार की शिकार हमीदा (बदला हुआ नाम) से हुई. हमीदा ने अपनी कहानी यूं बताई, ‘उस रात जब सेना मेरे पति को उठा ले गई तब घर में मैं अपने दो छोटे बच्चों के साथ अकेली थी. सैनिकों ने मेरी गोद से मेरे छोटे बेटे को छीन लिया और मेरे कपड़े फाड़कर मुझे जमीन पर धकेल दिया… मेरा बेटा ये सब देख लगातार रो रहा था, वहीं मुझे कुछ पता नहीं था कि उन्होंने मेरे दूसरे बेटे को कहां रखा था. मेरे गिड़गिड़ाने के बावजूद उन्होंने मुझे पूरी रात नहीं जाने दिया.’ 1991 की उस भयावह रात को बयान करते हुए हमीदा रो पड़ती हैं. उस वक्त वे केवल 24 वर्ष की थीं.

भारत के इस सबसे बड़े सामूहिक बलात्कार कांड की शिकार हमीदा को न्याय की उम्मीद तब तक नहीं थी जब तक कार्यकर्ताओं के समूह ने 2013 में दोबारा न्याय की लड़ाई शुरू नहीं कर दी. न्याय तो दूर की बात है सरकार इन अत्याचारों को सामने लाने के प्रयासों के प्रति भी निष्ठुर रही.

2012 में पब्लिक सर्विस ब्रॉडकास्टिंग ट्रस्ट (पीएसबीटी) के बैनर तले और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय से सहायता प्राप्त इस घटना पर आधारित डाॅक्यूमेंट्री ‘ओशन आॅफ टियर्स’ को प्रदर्शित करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ा.  कश्मीर विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में फिल्म की स्क्रीनिंग को दो बार रोका गया. पीएसबीटी द्वारा यू-ट्यूब पर अपलोड किए गए इस डाॅक्यूमेंट्री के सात मिनट के ट्रेलर को अपलोड करने के दो महीने बाद हटा दिया गया. इस दौरान इसे 1,49,000 लोगों ने देखा था. हालांकि इन लेखिकाओं के जुनून पर इसका कोई असर नहीं पड़ा बल्कि इनका अब तक का अनुभव इसके बिल्कुल उलट रहा है. उन्हें न केवल जयपुर साहित्य महोत्सव में आमंत्रित किया गया बल्कि श्रीनगर में भी बेरोकटोक किताब का लोकार्पण संपन्न हुआ. लोकार्पण के समय प्रकाशक उर्वशी बुटालिया भी मौजूद थीं. हालांकि किताब की लेखिकाएं इस भुलाए जा चुके सामूहिक बलात्कार कांड के मामले को किताब के जरिए फिर से चर्चा में लाए जाने का श्रेय नहीं लेना चाहतीं. उनका कहना है कि कुनन और पोशपोरा के लोग खामोश नहीं रहे हैं.

‘यह याचिका नए संघर्ष की शुरुआत थी; संघर्ष अपराध की अनदेखी और सरकार के झूठ के खिलाफ. यह संघर्ष अपराधियों को लोगों की नजर में लाने का भी है’

समरीना बताती हैं, ‘न्याय के लिए इन महिलाओं की लड़ाई कोई आज की नहीं है. इन महिलाओं ने न सिर्फ एफआईआर दर्ज करवाई बल्कि मामले की जांच ही इसलिए शुरू हो सकी कि इन्होंने चुप रहना स्वीकार नहीं किया.’ इन पीड़िताओं में से एक ने समरीना को यह भी बताया कि एफआईआर इसलिए दर्ज करवाई कि ये महिलाएं नहीं चाहती थीं कि सेना द्वारा उनके या फिर किसी और गांव में इस तरह की कोई ज्यादती दोबारा हो. 2013 में जब इन लेखिकाओं ने दोबारा जांच के लिए याचिका दायर की तो वे एक कहीं बड़े उद्देश्य से प्रेरित थीं. इस किताब के एक अंश के मुताबिक, ‘यह याचिका एक नए संघर्ष की शुरुआत थी; एक कानूनी संघर्ष, संघर्ष लगातार मिलती सजाओं की माफी और सरकार के झूठ के खिलाफ. संघर्ष अपराधियों को भूलने और उनके अपराध की अनदेखी के खिलाफ, संघर्ष इन अपराधियों को लोगों की नजर में वापस लाने का और कुनन-पोशपोरा की पीड़ित महिलाओं के समर्थन का.’

कुनन-पोशपोरा की घटना को लेकर लोगों में आज भी गुस्सा है. लोग समय-समय पर इसके विरोध में प्रदर्शन करते रहते हैं

कुनन-पोशपोरा की घटना को लेकर लोगों में आज भी गुस्सा है. लोग समय-समय पर इसके विरोध में प्रदर्शन करते रहते हैं

कुनन और पोशपोरा में 23 फरवरी, 1991 की उस भयावह रात को कश्मीर में भुलाया नहीं जा सकता. नई पीढ़ी अपने परिवार की महिलाओं के साथ हुई ज्यादती के सदमे के साथ बड़ी हो रही है. यहां के लोग बताते हैं कि  पड़ोसी गांवों के लोग इन दो गांवों की बेटियों को अच्छी निगाह से नहीं देखते और उनके बेटे अपने साथियों और शिक्षकों के कटाक्ष सुनकर लगातार स्कूल छोड़ रहे हैं. उन यादों के घाव अब तक हरे हैं और दुखते हैं. इस्सर बताती हैं, ‘23 फरवरी को हर साल सारा गांव मातम में डूब जाता है. उस रोज शायद ही गांव में कोई चूल्हा जलाता है.’

(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 8 Issue 10, Dated 31 May 2016)

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