मजबूत भी मजबूर भी

इसी तरह नीतीश यात्राओं पर भी जमकर निकलते हैं. सेवा यात्रा, विकास यात्रा, न्याय यात्रा वगैरह-वगैरह. यात्राओं के दौरान जो भी आवेदन उन्हें मिलते हैं, उसे भी अधिकारी ठंडे बस्ते में रखते हैं. इसके बजाय नीतीश कुमार के पास शासन का दूसरा मॉडल भी था. वे अधिकारियों को ज्यादा जवाबदेह बना सकते थे. सिस्टम को ठीक कर सकते थे. दस सालों के शासन में सिस्टम को ही इतना चुस्त-दुरुस्त कर सकते थे कि लोगों को छोटी-छोटी फरियाद लेकर उनके पास नहीं आना पड़ता. लेकिन वह खुद को ही केंद्र में रखकर शासन करने की उनकी प्रक्रिया में लगे रहे, जिससे उनका नुकसान ही हुआ.

पॉपुलर पॉलीटिक्स बनाम कार्यकर्ताओं की उपेक्षा

नीतीश कुमार पॉपुलर पॉलीटिक्स करने के माहिर खिलाड़ी बनते रहे. कुछ साल पहले जब विधायक फंड खत्म करने की घोषणा की तो इसकी चौतरफा प्रशंसा हुई. जब आरटीएस को लागू करवाया तो प्रशंसा हुई. जब देश में अन्ना आंदोलन उफान मार रहा था, तो उन्होंने खुलकर समर्थन किया, राइट टू रिकाॅल पर अन्ना के पक्ष में बयान दिया. यह सब नीतीश को लोकप्रिय बनाते हैं. नीतीश वक्त की नजाकत समझने में माहिर हैं, इसलिए अन्ना आंदोलन के दिनों में उन्होंने एक भ्रष्ट अधिकारी का घर जब्त कर उसमें स्कूल खोल वाहवाही भी लूटी. किसी समाचार चैनल द्वारा सामान्य सम्मान मिलने पर भी सरकारी फंड से बड़े-बड़े होर्डिंग लगते रहे. अखबारों में विज्ञापन का बजट बढ़ाकर भी वह लोकप्रियता के सूत्र तलाशते रहे. यह सब अच्छा रहा लेकिन इस बीच नीतीश यह भूलते रहे कि वे सत्ताधारी पार्टी के नेता हैं और आगे की लड़ाई के लिए सिर्फ उनकी इकलौती लोकप्रियता काफी नहीं होगी बल्कि उन्हें एक टीम भी चाहिए. सत्ताधारी पार्टी के कार्यकर्ताओं संभाले रखना बहुत मुश्किल काम होता है.

‘नीतीश सब काम सरकारी तंत्र से करवाते रहे. सरकारी तंत्र तो किसी का होता नहीं. वह आज आपके साथ है, कल देखेगा कि दूसरा मजबूत है, अपना चरित्र बदल लेगा. नीतीश की यह सबसे बड़ी भूल रही’

उन्होंने अपनी छवि बनाने के लिए जिला प्रशासन और थानों तक परोक्ष तौर पर यह आदेश दिया कि किसी की बात न सुनी जाए. इसका असर यह हुआ कि प्रभावशाली लोगों की बात तो प्रशासन सुनती रही, पुलिस भी मानती रही लेकिन जदयू कार्यकर्ताओं को सत्ताधारी से जुड़ाव के बावजूद अपनी औकात में रहना पड़ा. वे अपने इलाके में छोटी पैरवी करने में भी असमर्थ हो गए. विधायक फंड खत्म होने से छोटे-छोटे ठेके-पट्टे के काम भी मिलने बंद हो गए. नीतीश कुमार सरकार को प्रशासन के जरिये चलाने में पूरी ऊर्जा लगाए रखे, उनकी तमाम योजनाएं सरकारी तंत्रों से संचालित होती रही और जदयू कार्यकर्ता हाशिये पर जाते रहे. नतीजा यह हुआ कि जिला स्तर पर भी कई जगहों पर जदयू का संगठन खड़ा नहीं हो सका. इतने सालों तक सत्ता में रहने के बावजूद पार्टी का एक स्वरूप नीतीश कुमार खड़ा नहीं कर सके, इसका असर अब उनकी पार्टी पर दिख रहा है. कार्यकर्ताओं को उन्होंने पेड़ लगाकर सदस्यता अभियान चलाने के उपक्रम में लगाया. जाहिर सी बात है कि ऐसे अभियान की हवा निकलनी थी. लोगों की बात कौन करे, जदयू कार्यकर्ताओं ने नीतीश के इस अभियान में साथ नहीं दिया. शिवानंद तिवारी कहते हैं, ‘इसका गहरा असर होगा. जो भी क्षेत्र में कार्यकर्ता होता है, नेता होता है, वह दिन-रात मेहनत कर अपनी साख बनाता है. उसकी इतनी अपेक्षा रहती है कि वह भी जनता के बीच नेता की तरह माना जाए. वह भी किसी की मदद कर सके. उसकी बात भी कहीं न कहीं शासन में सुनी जाए, लेकिन नीतीश कुमार ने ऊपर से आदेश देकर किसी को भी मदद नहीं करने की बात कह दी तो कार्यकर्ता इनके पास रहेंगे कैसे?’ उनके अनुसार, ‘नीतीश ने अपनी योजनाएं चलाने के लिए भी कार्यकर्ताओं को पर्याप्त छूट नहीं दी. सब सरकारी तंत्र से करवाते रहे और सरकारी तंत्र तो किसी का होता नहीं. वह आज आपके साथ है, कल देखेगा कि दूसरा मजबूत है, अपना चरित्र बदल लेगा. नीतीश की यह सबसे बड़ी भूल रही.’

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