भगाणा बलात्कार मामला और जनांदोलन

6. आपसी खींचतान चल रही थी, इसी बीच आंदोलन के नेतृत्वकर्ताओं ने पीड़िताओं पर एक किताब प्रकाशित करने का फैसला लिया. यह किताब दुसाध प्रकाशन की तरफ से ‘भगाणा की निर्भयाएं’ नाम से छपी. दुसाध प्रकाशन के सर्वेसर्वा एचएल दुसाध, प्रमोद रंजन और जितेंद्र यादव इस किताब के संपादक बने. प्रकाशक का कहना था कि किताब की बिक्री से जो पैसा आएगा वह भगाणा की पीड़ित लड़कियों को सहायता स्वरूप दिया जाएगा. 22 जून को दुसाध फेसबुक स्टेटस के जरिए किताब का मूल्य बताते हैं. वे यह भी लिखते हैं कि किताब की 200 प्रतियां पीड़ितों को दी गई हैं और किताब उनकी आय का सम्मानजनक जरिया तथा उनको न्याय दिलाने का हथियार बनेगीं. वे लोगों से अपील करते हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा संख्या में इस किताब को खरीदें.

अपनी इस किताब को बेचने का दुसाध का यह एक नायाब तरीका था. असल में उन्होंने पीड़ित लड़कियों के परिजनों से इस किताब को अपने कैंप के सामने स्टाल लगा कर बेचने के लिए कहा था. उनका कहना था कि एक किताब जितने में बिकेगी उसका आधा पैसा परिजन रखेंगे और आधा वे यानि एचएल दुसाध. मार्केटिंग का यह नया तरीका है. पहले पीड़िताओं पर किताब प्रकाशित करें और फिर उन्हीं से किताब बिकवाएं. ज्यादातर को तो पता भी नहीं है कि किताब में उनके बारे में क्या लिखा गया है. वे दिल्ली आए थे, न्याय पाने के लिए, यहां उन्हें किताब बेचने का काम थमा दिया गया. इस बारे में प्रकाशक एचएल दुसाध से बातचीत की कोशिश असफल रही.

जब हम इस बारे में जेएनयू के प्रोफेसर और दलित मामलों को लेकर सक्रिय रहनेवाले गंगा सहाय मीणा से बात कहते हैं तो कहते, ‘देखिए, आंदोलन पर किताब छापना कोई गुनाह नहीं है. यह अच्छी बात ही है. लेकिन जिस तरह से दुसाध जी ने किताब बेचने की कोशिश की है वो एकदम गलत है. ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए था.’

यह सब होता रहा और होते-होते इतना आगे बढ़ गया कि अब इस लड़ाई का पूरी तरह से सत्यानाश हो चुका है. फिलहाल जंतर-मंतर पर पीड़ितों के कुछ परिजन बैठे रहते हैं. चारों लड़कियां कुछ समय यहां रहती हैं, कुछ समय हिसार में. पीड़ित लड़कियों को हर कुछ दिन पर तारीख के लिए कोर्ट में जाना पड़ता है. उन्हें दिल्ली लाने वाले वेदपाल तंवर कुछ ही दिन पहले नई राजनीतिक पार्टी, हरियाणा जनहित कांग्रेस में शामिल हो गए हैं. अनीता भारती अपनी नियमित आंदोलनों (दूसरे) और नौकरी वाली दिनचर्या में व्यस्त हैं. प्रमोद रंजन अपनी पत्रिका का संपादन कर रहे हैं और जितेंद्र यादव उसी जंतर-मंतर पर किसी दूसरे मुद्दे को लेकर सभाएं आयोजित करवा रहे हैं. यही है आज के आंदोलन और आंदोलनकारियों का सच जिसे बलात्कार पीड़िता और उनके परिजन समझने की कोशिश करते अपनी लड़ाई खुद लड़ने की तैयारी कर रहे हैं.

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भगाणा: एक और मिर्चपुर…

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