कुछ समाज ने मारा, बाकी संरक्षण ने

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मनीषा यादव

संरक्षण गृहों तथा नारी निकेतनों में किशोरियां विशेष और विकट परिस्थितियों के कारण लाकर रखी जाती हैं. इन्हें मजिस्ट्रेट के आदेशों पर यहां लाया जाता है और उनके आदेशों से ही ये यहां से निकल सकती हैं. यहां की निवासिनियां गृह के दरवाजे से बाहर कदम नहीं निकाल सकतीं. उनका खाना पीना, पढ़ाई, इलाज सब इसी गृह की चारदीवारी के भीतर ही होने का कानून है. संरक्षणगृह परिस्थितियों के बीच फंसी किशोरी की शरणस्थली तो हैं पर दरवाजे़ पर ताला और पहरेदार भी हैं, बाहर जाना मना है, बाहरी लोगों का आना मना है, चिट्ठी भेजना, टेलीफोन करना मना है.

इसलिए यह बंदीगृह है या संरक्षणगृह इस बात का निर्णय करना कठिन है.

संरक्षणगृह में निरपराध किशोरियां रखी जाती हैं, केवल तीन या चार प्रतिशत बाल अपराधिनियां होती हंै, जिन्हें नये ज्युविनाइल जस्टिस एक्ट 2000 की दृष्टि से अपराधी कहना मना हो गया है क्योंकि बच्चे का अपराध अधिकतर वयस्क द्वारा प्रेरित होता है. अतः सुधार की दृष्टि से ये यहां रहती हैं. गृह में कुछ ऐसी किशोरियां भी हैं जो ‘मॉरल डेंजर’ नामक प्रावधान के अन्तर्गत यहां आईं क्योंकि वे ‘भटकती हुई पाई गईं’ थीं. इनके अतिरिक्त अधिकांश वे किशोरियां हैं जो किसी ‘लड़के के साथ पकड़ी गईं’. इनका कहना है कि ये बालिग हैं और इन्होंने विवाह किया है पर इनके पिता का कहना है कि ये नाबालिग हैं और लड़का इन्हें भगा ले गया. गृह में निरुद्ध 60 प्रतिशत लड़कियां पति और पिता के बीच विवाद की शिकार हैं और यहां फंसी हुई हैं.

यहां पर कुछ ऐसी ही लड़कियों के विषय में बात करते हैं और उनसे जुड़े गंभीर मुद्दों को समझने की कोशिश करते हैं.

नसीमा

लखनऊ के संरक्षण गृह में हमें एक लड़की मिली – नसीमा. कम उम्र, यही लगभग अट्ठारह उन्नीस साल. हमें बताया गया कि उसके घर वालों को बुलाया गया था, पर कोई उसे लेने ही नहीं आया.

मूलतः मोहनलालगंज की रहने वाली नसीमा ने हमें बताया कि उसके पिता के देहांत के बाद उसके चाचा ने उसकी मां से शादी कर ली. फिर एक दिन नसीमा को बाग़ में भेज दिया. अकेली. वहां पर उसके दोस्त फखरू ने नसीमा के साथ बलात्कार किया. थाने में रिपोर्ट लिखी गई. चाचा ने नसीमा पर दबाव डाला कि तुम कोर्ट में फखरू का नहीं जुम्मन का नाम लेना. चाचा अपने दुश्मन को फंसाना चाहता था. नसीमा ने कहा कि अपराध तो फखरू ने किया है मैं गलत नाम क्यों लिखवाऊं. नसीमा ने बयान नहीं बदला. चाचा नसीमा को घर नहीं ले गया. मजिस्ट्रेट ने नसीमा को संरक्षणगृह में रखने का आदेश कर दिया.

जाहिर था कि जब चाचा आता, तभी नसीमा छूट पाती. न वह आया- न वह छूटी. वैसे भी चाचा की इच्छा यही रही होगी कि जमीन की हकदारी वाली भतीजी होम में पड़ी रहे तो बेहतर. होम के अधिकारियों ने पत्र भेजकर अपना कर्तव्य पूरा कर दिया और नसीमा के दिन यों ही कटने लगे.

नसीमा का नसीब कि इस बीच उसकी मुलाकात हमारे स्वयंसेवी संगठन सुरक्षा की कांउसलर डॉ कविता उपाध्याय से हो गई. कविता ने उसकी फाइल देखी. नसीमा गर्भवती थी. 18 वर्ष की कम उम्र लड़की बलात्कार से गर्भवती – पारिवारिक रंजिश की निर्दोष शिकार होम से तभी छूटे जब घरवाले ले जाएं या किसी से शादी हो जाए. घरवाले ही अपराधी हैं, वे तो आएंगे नहीं, अब क्या होगा, सब पसोपेश में. उसके परिवार का पता लगाया गया. एक बहन भी थी और जीजा भी. उन्हें गर्भ की बात बताएं या नहीं-अपराध की शिकार, शर्मिंदगी का शिकार भी क्यों बने. खूब सोच-समझकर पहले केवल बहन को बुलाकर समझाया, फिर उसकी सहमति से नसीमा के जीजा को. वे लोग हमारी यह सलाह मान गए कि वे होने वाले बच्चे को गोद ले लेगें और नसीमा को अपने साथ रख भी लेगें.

नियमानुसार मजिस्ट्रेट अभिभावक के हाथ ही किशोरी को सौंपता है. वकील की मदद से हम लोगों ने बहन-जीजा से एफिडेविट बनवाया कि वे ही अभिभावक हैं. इस प्रकार यह गर्भवती किशोरी होम से निकाल कर बहन के संरक्षण में सौंप दी गई.

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मनीषा यादव

नसीमा का वृतान्त हमारे सामने कई प्रश्न खड़े करता है. सरकार ने ‘मॉरल डेन्जर’ यानी नैतिक खतरा नामक प्रावधान बनाया है. जो लड़कियां नाबालिग किशोरियां हंै, जो घर से भाग गईं, जो ‘भटकती पाई गईं’ उन पर नैतिक खतरा मंडरा रहा है, सो पहले उन्हें गृह में संरक्षण दो फिर उन्हें उनके घरवालों को सौंप दो. पर जिन किशोरियों के प्रति उनके घर वालों ने ही अपराध किया, जो घर से त्रस्त होकर भागीं और ‘भटकती पाई गईं’ उन्हें घरवालों के हाथों में ही सौंपकर हम उन्हें किस खतरे से बचाते हैं? बाहरी समाज से उन्हें बचाने के नाम पर हम फिर उन्हें शोषक परिवार को सौपते हैं. होम की नियमावली में इनके घरवालों को समझाने, जिम्मेदार ठहराने, और सजा दिलाने का शायद कोई प्रावधान ही नहीं है. परिवार की जिन शोषक परिस्थितियों से ये लड़कियां भागीं या निकाल फेंकी गईं, उन परिस्थितियों को बदलने का कोई भी प्रयास किए बगैर इन्हें उसमें वापस भेज दिया जाता है.

संविधान के अनुसार बालिग होने की उम्र है अट्ठारह वर्ष. किशोरी अट्ठारह की होने के बाद शादी तय करके ब्याह दी जाती है या पिता के हाथों सौंप दी जाती है. पति या पिता – इक्कीसवीं शताब्दी में मनुस्मृति के सूत्रों का अक्षरशः पालन हो रहा है. एक बेपरवाह उदासीनता के साथ.

सावित्री

मलीहाबाद की रहनेवाली सावित्री का नसीब नसीमा से बेहतर है. कम से कम वह गर्भवती तो नहीं है. उसका अपराध है प्रेम विवाह. वह चमार है, सुरेन्द्र पासी के साथ भाग गई. दोनों ने विवाह कर लिया. पिता ने थाने में एफआईआर. लिखवा दी. सुरेन्द्र फरार हो गया. मजिस्ट्रेट ने सावित्री को संरक्षणगृह भेज दिया क्योंकि सुक्खू चमार ने पिता के रूप में रिपोर्ट तो लिखा दी पर बेटी को ले नहीं गया. अपराधी फरार, शिकार कैद में.

जब हमें मिली, उस दिन सावित्री की खाना बनाने की ड्यूटी थी, दाल ,कद्दू, चावल और 120 रोटियां. चेहरा तमतमाया हुआ और पसीने से तर. होम में  गैस होते हुए भी, खाना लकड़ी के चूल्हे पर ही बनवाया जाता है. हमने उससे पूछा तुम सुरेन्द्र के साथ जाओगी या पिता के साथ. वह बोली सुरेन्द्र के साथ, उसे बस एक बार बुलवा दें.

मजिस्ट्रेट के सामने अनेक पेशियां हुई, हर बार सावित्री ने सुरेन्द्र के साथ जाने की बात कही. सुरेन्द्र का हमने पता लगवाया. पता चला वह दो बच्चों का पिता था. सुक्खू ने उस पर बलात्कार और नाबालिग के अपहरण का इल्जाम लगाया था, सो कैद के डर से वह दूसरी जगह रहने लगा था. वह नहीं आया. गांव जाकर हमने वहां के लोगों से बातचीत की. गांव की टीचर बोली सावित्री चमार हो कर पासी के साथ क्यों भागी, आखिर 14 साल की है, उसे पता होना चाहिए था कि सुरेन्द्र का पासी बाप चमार की लड़की कभी नहीं आने देगा.’ हमने कहा गलती सुरेन्द्र की है, जो दो बच्चों का पिता था, सावित्री तो नादान है. पर गांववालों का मत था कि चौदह साल की लड़की नादान नहीं होती.

जो घर से त्रस्त होकर भागीं और ‘भटकती पाई गईं’ उन्हें घरवालों के हाथों में ही सौंपकर हम उन्हें किस खतरे से बचाते हैं?

आखिरकार निराश होकर सावित्री ने पिता के ही घर वापस जाने के लिये हामी भर दी. पुलिस अपनी जीप में सावित्री को उसके पिता के घर ले गई. पिता ने कहा नाक कटानेवाली बेटी नहीं चाहिए. प्रेमी तो खैर अपने घर से भाग ही चुका था. सावित्री उल्टे पैरों फिर संरक्षण गृह वापस आ गई.

नियमानुसार होम के अधिकारियों ने ‘भले लड़के’ देखकर आठ बालिग लड़कियों की शादी तय कर दी, उनमें एक सावित्री भी थी. एक दिन जब हम लोग होम पहुंचे  तो उसने खिड़की के सींखचों के पीछे से आवाज लगाकर कहा, ‘हमें शादी से डर लग रहा है.’ हम लोगों ने अधीक्षिका से अनुरोध किया कि वे जल्दी न करें. मगर दो महीने बाद विवाह की तैयारियां होने लगी. हमने सावित्री से पूछा, ‘अब तुम तैयार कैसे हो गई, हमने तुम्हारे पिता से बात की है वह तुम्हें वापस लेने को तैयार है.’ सावित्री ने मुंह फुलाकर कहा, ‘अब हम नहीं जाएगें, उन्होंने पहले हमें क्यों नहीं वापस आने दिया?’

बाद में हमें सूचना दी गई है, कि सावित्री की शादी  शिवलाल से हो गई है, वह कुर्मी है, बरेली में टेम्पो चलाता है, उसकी पहली पत्नी शादी के दो महीने बाद ही उसे छोड़ गई थी. मामला क्या था और इस बारे में अधिक क्या जानकारी जुटाई गई है, हमारे यह पूछने पर होम की अधीक्षिका ने कहा, ‘बाल तो मैडम देखिये आजकल सभी काले कर लेते हैं सो उसकी असली उम्र क्या है यह तो पता नहीं चल सकता पर वह सुमित्रा के लिए जो सलवार सूट और शॉल लाया है उससे पता चलता है कि उसकी चॉयस अच्छी है.’

शायद सावित्री सुखी हो.

सावित्री के प्रकरण में दोष किसका है? पिता ने बेटी के प्रेमी के विरुद्ध रिपोर्ट लिखवा दी – अपहरण और बलात्कार की – पर स्वयं बेटी को लेने नहीं आया, बल्कि जब पुलिस उसके घर उसकी बेटी को पहुंचाने गई तो दरवाजे से उसे लौटा दिया. पितृसत्ता को पूरी कुरूपता और नृशंसता से लागू करने में पिता की भूमिका प्रेमी से भी भयानक है. इस तथ्य को इसलिए भी रेखांकित करना जरूरी है क्योंकि दहेज हत्या के प्रकरणों में भी अधिकतर यही पाया जाता है कि जिनके पिता ने उन्हें वापस घर नहीं लौटने दिया, वे ही लड़कियां  मारी गईं.

पिता ऐसा क्यों करते हंै, शायद इसलिए कि समाज यही सोचता है. गांववालों ने कहा कि 14 साल की लड़की नादान नहीं होती, दूसरी बिरादरी के लड़के के साथ भागी क्यों? पर होम की ही नौ अन्य लड़कियों का प्रश्न है कि हमने तो अपनी ही बिरादरी वाले के साथ ब्याह रचाया था, फिर भी बाप ने क्यों पकड़वा दिया?

प्रश्न है लड़की भागी क्यों? सावित्री वगैरह पांच बहने हैं. मां के मरने के बाद सारा दिन घर का काम करना और मवेशी चराना, न स्कूल, न पढ़ाई, न खेल. हमने गांव में सामूहिक चर्चा करके बात उठाई कि बच्ची को प्यार नहीं मिला होगा, तभी प्यार की तलाश में भागी. गांव के लोगों ने कहा – प्यार क्या होता है? बाप चाहता तो खुद दूसरी शादी कर लेता, सौतेली मां नहीं लाया यही क्या कम है? बेटी ही हरामखोर हैं.

किसी भी बच्ची को बाप द्वारा कहे गए प्यार के कोई शब्द याद नहीं. ऐसे में सावित्री सुरेंद्र के साथ भाग जाए तो उसमें आश्चर्य क्यों होना चाहिए?

हमारे काम के दौरान ही छह नई किशोरियां लखनऊ के होम में लाई गईं जो मुर्शिदाबाद से ‘बरामद’ की गई थीं. लड़कों  के साथ  पकड़े जाने की वजह से. पिताओं ने सावित्री के पिता की तरह रपट तो लिखा दी पर बेटी को ले नहीं गए. अपने घरों में ही यह किशोरियां क्या पाती थीं, कैसा था इनका जीवन, ये अपने जीवन के किन क्षणों को याद करती हैं यह जानने की उत्कंठा में इनसे लंबी बातचीत की गई. वे पढ़ने नहीं भेजी जाती थी, मवेशी चराती थीं और सारा दिन खाना बनाती थीं. उनकी कोई सहेलियां-मित्र नहीं थे और उन्होंने कोई खेल नहीं खेला. सैंतीस में से केवल एक लड़की ने यह बताया कि वह खूब पहिया चलाती थी, डंडी से पहिया चलाने में मजा आता था और कभी-कभी माचिस की तीलियों से भी खेलती थी. यह लड़की गांव से नहीं शहर की ही मलिन बस्ती से यहां आई थी. ऐसा बेरंग नीरस जीवन जीने वाली किशोरियां थोड़े भी प्रेम या सहानुभूति से फुसलाई जा सकती हैं यह बात समझने के लिए किसी बड़ी भारी स्टडी की जरूरत नहीं है. परिवार किशोरी को बाल श्रमिक के रूप में घर में इस्तेमाल का रहा है. किसी भी बच्ची को बाप द्वारा कहे गए प्यार के कोई शब्द, स्नेह का कोई स्पर्श याद नहीं. ऐसे में सावित्री सुरेंद्र के साथ भाग जाए तो उसमें आश्चर्य क्यों होना चाहिए?

सुमित्रा का प्रेमी सुरेन्द्र पासी विवाहित था, आयु में उससे काफी बड़ा और दो बच्चों का पिता. हमारे बुलवाने के बावजूद वह सुमित्रा को लेने नहीं आया. यह बात और है कि इस व्यवस्था में पिता की शिकायत पर, प्रेम विवाह करनेवाली लड़की तो तुरन्त पकड़कर होम भेज दी गई पर एक साल गुजर जाने के बाद भी पुलिस, न्यायालय, और सरकारी अफसर उस पुरुष को गिरफ्तार न कर सके.

1 COMMENT

  1. नेपथ्य के पीछे घटनेवाली लड़कियों की अमानवीय घटनाओं ने न केवल झकझोर कर रख दिया वरन क्रूर सच्चाइयों से भी अवगत कराया। शालिनी जी हमेशा ही समस्या की तह में जाकर ,गहरी पड़ताल कर अपनी बात तार्किक ढंग से रखती हैं।
    madhu kankaria

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