प्रियंका दुबे, Author at Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
प्रियंका दुबे
प्रियंका दुबे

संवाददाता, दिल्ली

Articles By प्रियंका दुबे
सुर्खियों के बाद

दिल्ली | अप्रैल 2013 ‘शीला दीक्षित बोलीं कि मेरे पास रोज 500 बलात्कार के मामले आते हैं. मैं किस-किस को देखूंगी’ गुड़िया के लिए यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी सहित तमाम नेता बड़े-बड़े वादे कर गए थे, लेकिन हुआ कुछ नहीं. पांच साल की गुड़िया अब अपने हाल पर है दिल्ली  

अगवा बचपन, बंधुआ बचपन

राजधानी दिल्ली में जहांगीरपुरी की एक झुग्गी बस्ती में रहने वाला 14 साल का महेंद्र सिंह सात अगस्त, 2008 की सुबह रोज की तरह घर से शौच के लिए निकला था. इसके बाद उसका कुछ पता नहीं चला. घरवालों ने उसे तलाशने की न जाने कितनी और कैसी-कैसी कोशिशें कीं,  

उपचार की आड़…जिंदगी से खिलवाड़

परेशान, कुछ-कुछ डरे-से मरीज, बेखौफ अपराधी-से कई डॉक्टर और चिरंतन काल से गहरी नींद में सरकार… बात किसी असफल अफ्रीकी देश की नहीं बल्कि अपने देश के मध्य प्रदेश के अस्पतालों की हो रही है. यहां के कुछ डॉक्टर अपने दिन की शुरुआत ही महान यूनानी चिकित्सक हिप्पोक्रेट्स की उस  

दस बलात्कार, दो हत्याएं, चार साल जांच… नतीजा शून्य

दृश्य एक- मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में मुलताई तहसील का चौथिया गांव. अभी दिन की शुरुआत ही हुई है और इस कस्बे में सूरज की नर्म रोशनी धीरे-धीरे खेतों में फैल रही है. तभी अचानक लगभग 2,000 लोगों की एक हिंसक भीड़ ट्रैक्टरों और जेसीबी मशीन के साथ खेतों  

मासूम गिरोहों की दिल्ली

गर्मियों की एक दोपहर. नई दिल्ली रेलवे स्टेशन. नई-दिल्ली-गुवाहाटी राजधानी एक्सप्रेस अपनी यात्रा पूरी कर चुकी है. यात्रियों को प्लेटफॉर्म पर उतारने के बाद खाली हो चुकी ट्रेन धुलाई-सफाई के लिए रेलवे स्टेशन के पीछे बने यार्ड की तरफ बढ़ रही है. अचानक एक कोच के दरवाजे पर 14-15 साल  

क्या बाल सुधार गृह को ‘बाल बिगाड़ गृह’ कहना ज्यादा सही है?

रमेश, विनय और सुशील (बदले हुए नाम) देश की राजधानी दिल्ली के दक्षिणपुरी इलाके की एक झुग्गी बस्ती में रहते हैं. दो अगस्त, 2012 की रात ये तीनों दोस्त अपने घर लौट रहे थे कि रास्ते में एक टेंट मालिक से उनका झगड़ा हो गया. एक मोटरसाइकिल के जमीन पर  

हिंदी साहित्य में स्वेतलाना एलेक्सीविच की जरूरत

इस साल साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित बेलारूस की खोजी पत्रकार और नॉन फिक्शन (गैर काल्पनिक) लेखिका स्वेतलाना एलेक्सीविच की सबसे चर्चित किताब ‘वॉयसेज फ्रॉम चर्नोबिल’ के बारे में पढ़ते हुए मेरा ध्यान सबसे पहले भोपाल गैस त्रासदी के साहित्यिक दस्तावेजीकरण की तरफ गया. यह किताब वर्ष 1986 में  

हिंदी बनाम अंग्रेजी : पत्रकारिता के दो रंग

अपने एक कमरे के छोटे-से किराये के ‘घर’ के दरवाजे पर ताला मारकर मैं दौड़ी-दौड़ी घर के सामने वाले चौराहे पर पहुंची. ‘ब्लू डार्ट’ से मेरे लिए एक लिफाफा आया था. जल्दी से दस्तखत कर कुरियर वाले को पर्ची पकड़ाई और लिफाफा लेकर वापस कमरे की तरफ दौड़ी. लिफाफे के  

स्ट्रिंगर : नींव के निर्माता

साल 2011 की गर्मियों में दमोह से छतरपुर को जोड़ने वाले उबड़-खाबड़ सड़कों पर लगभग हर दस मीटर में बड़े-बड़े गड्ढे मौजूद थे. नर्मदा घाटी के जंगलों में खड़े विशाल टीक के पेड़ों के धूलधूसरित पत्तों से छनकर अप्रैल की कड़ी धूप उनके चेहरे पर गिर रही थी. एक सफेद  

…तो मैं तुमसे प्रेम नहीं कर पाऊंगी

(इस लेख में ‘मैं’ आज के भारत में रहने वाली एक सचेत, जागरूक और संवेदनशील स्त्री है. प्रेम और देह को लेकर इस स्त्री की संवेदनाएं जितनी दिल्ली-मुंबई की किसी लड़की के विचारों से जुड़ती हैं उतनी ही बैतूल-हरदा के कस्बों में डर-छिपकर प्रेम करने वाली कस्बाई लड़की से भी)