प्रदीप सती, Author at Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
प्रदीप सती
प्रदीप सती

संवाददाता, दिल्ली

Articles By प्रदीप सती
खाई में सीबीआई

  छह महीने पुरानी बात है. प्रधानमंत्री पद पर नरेंद्र मोदी की ताजपोशी के अगले दिन यानी 27 मई को एक खबर आई जो बहुत चर्चा में रही. यह खबर प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव की नियुक्ति को लेकर थी. खबर के मुताबिक इस पद पर भारतीय दूरसंचार नियामक आयोग (ट्राई)  

रहेगा नरेगा?

साल 2005 में जब महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) कानून बनकर जमीन पर उतरी, तो इसके बारे में सुनकर दिल्ली, गुड़गांव और नोएडा जैसे कई छोटे बड़े शहरों में दिहाड़ी मजदूरी करने वाले बहुत से लोग वापस अपने गांव लौटने लगेे. इसकी वजह यह थी कि इस कानून  

मायावती और सतीश चंद्र मिश्र

मायावती और मिश्र की इस जोड़ी ने दलित और सवर्ण जातियों के साथ ऐसा तालमेल बिठाया कि पहली बार बसपा को पूर्ण बहुमत मिल गया. मिश्र ने बसपा का कलेवर बहुजन से सर्वजन कर दिया  

अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी

अटल-आडवाणी की जोड़ी ने अपनी शानदार सांगठनिक क्षमता का उपयोग किया और 80 के दशक में जनसंघ को भाजपा बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया. इन्होंने उदार और कट्टर हिंदुत्व का ऐसा तालमेल स्थापित किया कि आम चुनाव में भाजपा दो सीटों से 89 सीटों तक पहुंच गया  

अम्मा के जाने के बाद

अपनी राजनीतिक यात्रा के चरम पर जेल जाने वाली जयललिता की पार्टी और तमिलनाडु की राजनीति आने वाले समय में किस तरह के बदलाव देख सकते हैं?  

जिन्होंने पहले से ही विवादित संस्था को और भी विवादित बना दिया है

हमारे देश के कई हिस्सों में एक बेहद प्रचलित कहावत है, – ‘जब मेड़ ही खेत को खाने लगे तो बेचारे खेत का क्या होगा?’ इन दिनों यह कहावत देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी मानी जानेवाली सीबीआई पर अक्षरश: लागू होती जान पड़ती है. सत्ता प्रतिष्ठानों के इशारों पर  

पद की पिटी भद

जब तमाम उदाहरण उस मर्यादा के ध्वस्त होने का संकेत दे रहे हों जो संविधान निर्माताओं ने राज्यपाल के लिए बनाई थी तो क्या इस पद का कोई मतलब बचता है?  

टाइमबम !

जीवीके की इस विद्युत परियोजना का इतिहास बताता है कि यह बिजली की नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी आपदा की परियोजना साबित हो सकती है  

क्षतिपूर्ति  से हितपूर्ति

हजारों करोड़ रु के जिस कैंपा फंड का मकसद उद्योगों के चलते जंगलों को हुए नुकसान की भरपाई करना है वह छत्तीसगढ़ में जेबें भरने का जरिया बन गया है  

आरटीआई:सूचना! पूछ ना

एक साल तक सूचना के अधिकार का ही इस्तेमाल करने के बाद तहलका ने पाया कि प्रशासन में पारदर्शिता और जिम्मेदारी लाने के मकसद से लागू हुए इस अहम कानून पर प्रशासनिक अव्यवस्था और लापरवाही ही चोट कर रही है