दीप्ति श्रीराम, Author at Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
दीप्ति श्रीराम
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Articles By दीप्ति श्रीराम
‘अगर आप वोट करने की उम्र से ऊपर हैं और राजनीति को संदेह से देखते हैं तो आपको बच्चों की पेंटिंग प्रतियोगिता में हिस्सा लेना चाहिए’

‘अवॉर्ड वापसी’  के चलते आप चर्चा में हैं. लोगों का कहना है कि ऐसा तो हमेशा से होता आया है तो फिर अब ऐसी कौन सी बात हुई है जो एक फिल्मकार इस पर बात कर रहा है. आप इस पर क्या कहेंगे? जब सिख विरोधी दंगे हुए तो उस  

अस्तित्व की लड़ाई

‘कॉल मी कैटलिन’ (मुझे कैटलिन बुलाएं), उसने कहा और पूरी दुनिया भड़क उठी. यह प्रसिद्ध पत्रिका ‘वैनिटी फेयर’ के जुलाई 2015 के कवर पर लिखा वाक्य था, जो हाल ही में ऑपरेशन के जरिये पुरुष से महिला में तब्दील हुए प्रसिद्द अमेरिकी एथलीट और अभिनेता ब्रूस जेनर (अब कैटलिन जेनर)  

तथ्यों पर भारी तेजी

बहुत से लोगों को ये पता भी नहीं होगा कि प्रसारण पत्रकारिता के इतिहास के सबसे बड़े क्षण ने एक बड़े विवाद को जन्म दिया था. 1967 में डेविड फ्रॉस्ट अपने शो ‘फ्रॉस्ट प्रोग्राम’ में एमिल सवुंद्रा से सवाल-जवाब कर रहे थे. सवुंद्रा श्रीलंकाई काले बाजार के एक व्यापारी थे  

‘मुझे माओवादी आंदोलन के शहरी चेहरे के रूप में पेश करना एक बड़े षडयंत्र का हिस्सा है’

लगभग 90 प्रतिशत विकलांग साईबाबा को नागपुर जेल के बदनाम ‘अंडा सेल’ में रखा गया. इस दौरान उचित देखभाल और स्वास्थ्य सेवाओं के बिना साईबाबा की तबीयत कई बार बिगड़ी. साईबाबा ने अपनी गिरफ्तारी और पुलिस प्रताड़ना के बारे में दीप्ति श्रीराम से बात की  

महिलाएं और न्यायिक सुधार

अरुणा शानबाग को इच्छामृत्यु देने का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो न्यायाधीश भी असमंजस में पड़ गए. जानते हैं कुछ ऐसे ही मामले को, जहां महिलाओं ने न्याय व्यवस्था पर सवाल खडे़ किए और महत्वपूर्ण बदलाव लाने में सफल रहीं  

किसकी इच्छा से मृत्यु

42 साल तक अचेतावस्था में रहने के बाद मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में बलात्कार की शिकार अरुणा शानबाग की मौत से देश में एक बार फिर ‘यूथनेशिया’ यानी ‘इच्छा मृत्यु’ पर बहस छिड़ गई है. भारतीय संविधान सभी नागरिकों को ‘सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार’ देता है. ऐसे में क्या सालों से निष्चेष्ट पड़े इंसान को ऐसे जीवन को खत्म करने का अधिकार नहीं होना चाहिए? इस मुद्दे से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर दीप्ति श्रीराम और दीपा फिलिप...  

किसकी इच्छा से मृत्यु

सरकार और विभिन्न धर्म ‘लिविंग डेड’ के बारे में समान रूप से अनिश्चितताओं से घिरे हैं. इनके बीच एक समानता देख सकते हैं, वो ये है कि कैसे दोनों कुछ ‘विशेष’ लोगों को अपनी मृत्यु का अधिकार चुनने की आजादी दे रहे हैं. सरकार द्वारा जंग के मैदान में भेजे  

दोराहे  पर  राय

वैवाहिक बलात्कार को लेकर न्यायपालिका और संसद की प्रतिक्रिया बताती है कि भारत में घरेलू हिंसा और लैंगिकता को लेकर रवैया कितना वर्चस्ववादी है