अनिल यादव, Author at Tehelka Hindi — Tehelka Hindi
अनिल यादव
Anil Yadav
Articles By Anil Yadav
मंच पर लंपट

इन दिनों देश और धर्म के लिए मुचैटा लेने वालों की भरमार हो गई है. यह वैसा बोलना नहीं है जैसा किसी लोकतांत्रिक समाज में होता है. यह गालियों और धमकियों से लदी भाषा है जो अपने से इतर नजरिया रखने वाले को थप्पड़ मारने के लिए मचल रही है.  

भारत एक देश नहीं विचार है

इन दिनों जब एक धार्मिक रंगत वाला रक्तपिपासु राष्ट्रवाद और भारतीयता सत्ता का संरक्षण पाकर बलबला रहे हैं, यह सवाल हर आदमी को खुद से जरूर पूछना चाहिए क्योंकि यह जिंदगी और मौत का मसला बनता जा रहा है. ये स्वयंभू राष्ट्रवादी धार्मिक भावनाओं को आहत करने, देशविरोधी काम करने,  

डिजिटल इंडिया में टाइपराइटर

इस बार मैं अभी गुजरे कवि वीरेन डंगवाल की स्मृति में एक कविता कहना चाहता हूं. हफ्ता न मिलने से सांड़-सा बौराया लखनऊ का पुलिसवाला है जो बूट की ठोकरों से राजभवन को जाती सदर सड़क के फुटपाथ पर एक टाइपराइटर तोड़ रहा है, वहीं तमाशा देखने वालों से घिरा,  

विचार के जवाब में गोली का जमाना

कर्नाटक में धर्मांधता, पाखंड विरोधी लेखक एम एम कलबुर्गी की हत्या के बाद कई धुंधली चीजों पर रोशनी गिरी है और वे फिर से चमक उठी हैं. अक्सर निराश लेखक बड़बड़ाते पाए जाते हैं कि हमें कौन पढ़ता है, लिखे का क्या असर होता है, समाज पर जिनका अवैध वर्चस्व  

एक शून्य के बाद दूसरा शून्य

इंटरनेट न होने का बहाना भी नहीं चल सकता. यूरोप में भटक रहा हूं. जैसे हमारे यहां गांव में किसी अतिथि के आने पर पानी दिया जाता है वैसे ही यहां किसी घर, होटल या पब में पहुंचने पर वाईफाई मिल जाता है. जिंदगी तकनीक पर इस कदर निर्भर हो  

हर शाख पे उल्लू बैठा है

पत्रकारिता के अव्वल, दोयम और फर्जी संस्थानों से हर साल सपनीली आंखों वाले लड़के-लड़कियों के झुंड बाहर निकल रहे हैं. इनमें से बहुतेरे किसी दोस्त, परिचित के हवाले से मुझसे मिलते हैं. कॅरिअर के बारे में सलाह मांगने के बीच में अचानक उतावले होकर बोल पड़ते हैं, सर! कोई नौकरी  

रोजे बिना इफ्तार कैसा!

धर्मनिरपेक्षता लोकतंत्र से जुड़ा एक आधुनिक विचार है जिसे भारतीय नेताओं ने अवसरवाद की ट्रिक में बदल दिया है. धार्मिक अवसरों पर राजनीति करने वाले ये चेहरे आजकल जालीदार टोपी में नजर आ रहे हैं  

लुगदी, घासलेट, अश्लील, मुख्यधारा… साहित्य के स्टेशन

मिलिट्री डेयरी फार्म, सूबेदारगंज, इलाहाबाद. लौकी की लतरों से ढके एस्बेस्टस शीट की ढलानदार छतों वाले उन एक जैसे स्लेटी, काई से भूरे मकानों का शायद कोई अलग नंबर नहीं था. हर ओर ऊंची पारा और लैंटाना घास थी. कंटीले तारों से घिरे खेत थे जिनके आगे बैरहना का जंगल  

एक साल दो मोदी

राजपाट संभालने के बाद से मोदी संसद और सार्वजनिक कार्यक्रमों में बहुत कम मुस्कराते पाए गए पर जब वे विदेश में होते हैं तब सहज, प्रसन्न होते हैं. क्या वास्तविक मोदी विदेश में ही दिखते हैं?  

सलमान एक परपीड़क विचार है

न्यायपालिका में हमेशा से थोड़े से लाइसेंसशुदा ड्राइवर तबीयत के लोग होते आए हैं जिन्हें तगड़ा बोध होता है कि चालू व्यवस्था की स्टीयरिंग उनके हाथ में है. वे दो बातों का बहुत ख्याल रखते हैं. एक तो यह कि पब्लिक में न्यायपालिका का खौफ बना रहे, दूसरे कुछ चमकदार