एक शून्य के बाद दूसरा शून्य

0
344

Anil Yadv

इंटरनेट न होने का बहाना भी नहीं चल सकता. यूरोप में भटक रहा हूं. जैसे हमारे यहां गांव में किसी अतिथि के आने पर पानी दिया जाता है वैसे ही यहां किसी घर, होटल या पब में पहुंचने पर वाईफाई मिल जाता है. जिंदगी तकनीक पर इस कदर निर्भर हो चुकी है कि दरवाजों पर सेंसर, किचन में बरतन धोने वाली मशीनें और यांत्रिक मुखमुद्राएं देखते हुए डर लगता है कि क्या जल्दी ही मशीनें आदमी को गुलाम बना लेंगी. तब उसके सुविधाओं के निरंतर आदी होते शरीर और अनिश्चित परिस्थितियों में नया रास्ता खोज लेने वाले स्वतंत्रचेता दिमाग का क्या होगा. इस भय को खंगालने वाली फिल्मों और फिक्शन की रेलमपेल के बीच ऑस्ट्रिया में ऐसे लोगों की बस्तियां बसने लगी हैं जो टेलीविजन, मोबाइल फोन और हर बात के लिए इंटरनेट का इस्तेमाल नहीं करते. हो सकता है कि कभी वहां जाकर अपने ही रचे जंजाल से बचने का रास्ता खोजने वाले मन से मिलने का मौका मिले.

इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि मैं विक्रम हूं या नहीं लेकिन हर पखवाड़े मेरा सामना बेताल यानि इस कॉलम से होता है. जवाब नहीं देने पर सिर के छिन्न-भिन्न हो जाने की अपनी प्रसिद्ध शर्त का जिक्र किए बिना वह मुझसे प्रश्न करता है इसबार क्या लिखोगे? मुझे कुछ समझ नहीं आता, सिर्फ सन्नाटे में बेताल की भारी सांसों की आवाज सुनाई पड़ती है, मेरे भीतर पानी की तरह रिसती हुई बेचैनी भरने लगती है. लिखने के मुद्दे इफरात में सामने सजे हैं और कॉलम लिखने वाली कोई मशीन होती तो कितना अच्छा होता, मैं उसे झट से खरीद लेता.

अभी ऐसा नहीं है इसलिए मैं खुद से सवाल करने लगता हूं, तुम इस तत्परता से लिखने वाले होते कौन हो. क्या तुम्हें दुनिया के बारे इतना पता है कि अपने पाठकों को कुछ नया बता सको. क्या सूचना एवं प्रसारण मंत्री समेत प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति या जिंदगी भर किसी एक विषय पर ही छेनी चलाने वाले ज्ञानी को भी इतना पता होता है? हर आदमी सीमित ज्ञान और विराट अबोधता के बीच न जाने किस आत्मविश्वास से संतुलन बनाए हुए झूल रहा है. हर बार मुझे यह त्रस्त कर देने वाला झूला दिख जाता है और मेरा दिल बैठने लगता है. हां, हर आदमी दुनिया को ऐसे जैविक कोण से जानता है कि कोई दूसरा वैसे नहीं जान सकता. यहीं एक गुंजाइश दिखती है कि अपने इस नजरिए के बारे में बात हो सकती है. विचारों और अनुभूतियों को साझा करना आदमी की नैसर्गिक जरूरत है. अतीत में कभी उसे इस डर से चुप बैठा नहीं पाया गया कि वह कम जानता है इसलिए नहीं बोलेगा. वह तो इस डर के बारे में ही बात करने लगेगा.

 यहां आकर एक जादू जैसी चीज घटित हुई है. गोरा कम गोरा, भव्य कम भव्य लगने लगा है. नीली आंखें विलक्षण नहीं, आंखों का सिर्फ एक और प्रकार लगने लगी हैं. यूरोप में अपने घर में खड़ा आदमी वैसे आत्मविश्वास से भरा नहीं दिखता जैसे वह भारत में अपने से गरीब, कद-काठी में कमजोर और किंचित चकित लोगों के सामने दिखता है. उसके चेहरे पर अकेलापन और उन प्रपंचों की परछाइयां आती-जाती दिखने लगी हैं जिनसे उनकी जिंदगी दो-चार है. यही सापेक्षता का फंडा समझ में आता है. हर चीज एक-दूसरे की तुलना में ऐसी या वैसी है वरना वह अपने आप में कैसी भी नहीं है.

 एक शाम जर्मनी से इटली के मेलपान्सा एयरपोर्ट पहुंच कर काफी देर तक टूलने के बाद भी मेरी मेजबान अलेस्सांद्रा कांउसेलारो का पता नहीं चला जो मुझे लेने अंजारा गांव से आने वाली थीं. फोन मिलाने पर आवाज आती थी  इल नुमेरो दालेई सेलेत्सियानो नोन्न एजिस्ते (जो नंबर आपने डायल किया है मौजूद नहीं है). थोड़ा वक्त और बीता, कई तरह की बेंचों पर बैठते और मशीनों से परिचय पाते हुए अचानक डर लगा कि एकदम अनजाने इतालवी शहर में अब कहां जाऊंगा. उसी डर के भीतर एक उत्तेजना भी थी कि आज से तुम्हारी वास्तविक यात्रा की शुरुआत होने वाली है. खैर वह मुझे एयरपोर्ट के भीतर तेज कदमों से जाती हुई दिख गईं, वह मुझे खोजने के लिए अनाउंसमेंट कराने जा रही थीं. मैंने पूछा कि आप का नंबर लग क्यों नहीं रहा है. उन्होंने मेरा फोन लेकर नंबर डायल किया और कहा, आपने एक ही जीरो लगाया है, इंटरनेशनल कॉल के लिए दो जीरो लगाने चाहिए थे. मैंने यूरोप से अब तक यही एक चीज सीखी है कि ज्ञान एक शून्य के बाद दूसरा शून्य है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here