लोग गाते-गाते गरियाने लगे हैं!

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Shambhu Nath2एक मशहूर टीवी न्यूज चैनल के एंकर ने एक बार मुझे बताया कि अब काम करना बड़ा मुश्किल होता जा रहा है. उनकी हर स्टोरी पर लोग-बाग इस तरह रिएक्ट करते हैं कि लगता है अगर उन्हें वे अकेले पा जाएं तो मार ही दें. यह कहने वाले कोई आम या सड़कछाप लोग नहीं हैं बल्कि वे लोग हैं जो प्रभावशाली पदों पर बैठे हैं और सरकार के चहेते हैं. मुझे यह तो अंदेशा था कि उन्हें धमकियां मिलती होंगी पर कोई सरकार का असरदार व्यक्ति ऐसी धमकी देगा मुझे भरोसा नहीं हो रहा था. लेकिन पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम की मृत्यु हो जाने पर जिस तरह से उन एंकर ने उसी असरदार नेता की प्रतिक्रिया लेते हुए उसे सर कह कर संबोधित किया तो मेरा माथा ठनका. मैंने गौर किया कि उस नेता की प्रतिक्रिया लेते वक्त उस नामी एंकर ने एक बार भी टीवी पर सामने की तरफ अपना चेहरा नहीं किया. यह दुखद है. असरदार लोग अब सीधे ही पत्रकारों को नहीं धमकाते बल्कि उनके मालिकों पर भी दबाव डालते हैं कि अपने उस पत्रकार को या तो काबू करो अथवा उसे चलता करो. यह पीड़ा अकेले उन्हीं एंकर की नहीं है बल्कि वे सभी पत्रकार आजकल ऐसे हमलावर तेवरों वाले नेता और उनके फालोअरों से तंग हैं. एक महिला टीवी पत्रकार ने तो अपने साथियों से कहा था कि उसे अक्सर फोन आते हैं कि तुमने अगर अपने को न सुधारा तो तुम्हारा रेप कर दिया जाएगा. वह बेचारी बस सरकार की नाकामियों को कुछ ज्यादा ही तीखे अंदाज में उजागर कर रही थी. इसी तरह एक अखबार के संपादक को भी ऐसी ही धमकी अक्सर दी जाती हैं.

यह गंभीर चिंता का विषय है कि आखिर लोग इतने असहिष्णु और अमर्यादित क्यों होते जा रहे हैं. क्यों जरा-सी भी वह बात उन्हें सहन नहीं होती जो परंपरागत लीक से हटकर हो. याकूब मेनन की फांसी पर कुछ लोगों ने राष्ट्रपति से अपील क्या कर दी कि तत्काल कुछ लोगों ने उन्हें राष्ट्रद्रोही साबित कर दिया. सवाल इस बात का है कि अब क्या समानांतर रेखा पनपने नहीं दी जाएगी. अब तक हम यही तुलना सदैव अपने समानांतर रेखा से करनी चाहिए पर जब समानांतर रेखा ही समाप्त कर देंगे तो तुलना का प्रश्न ही नहीं उठता. लोगों में कितना गुस्सा और नफरत भरी हुई है यह जानना हो तो आज सोशल मीडिया को देखिए. कुछ भी ऐसा लिख दिया जाए जो सरकार की अंध लाइन के विरोध में हो तत्काल लोग ऐसे टूट पड़ते हैं मानो पता नहीं कौन-सा कहर आन पड़ा. किसी ने मोदी सरकार की किसी नीति की निंदा कर दी तो तत्काल उसे देशद्रोही होने का फतवा जारी कर दिया जाएगा. किसी ने भी कथित भारतीय सभ्यता के छिद्रों पर हमला किया तो उसे धर्मद्रोही करार दे दिया जाएगा. मानों राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति और समूचे हिंदू धर्म का ठेका इन्हीं असहिष्णु लोगों ने ले रखा हो. अभी कुछ वर्ष पूर्व तक हालात यह नहीं थे. लोग अलग राय रखते और उस पर दृढ़तापूर्वक खड़े भी रहते थे लेकिन क्या मजाल कि कोई उन पर हमला करे फौरन उनके पक्ष के लोग अपने-अपने तर्कों के साथ आ जाते थे. पर अब उलटा है अगर आप पर हमला हो रहा है तो भी आप की बात पर समान राय रखने वाले लोग या तो डर से चुप रहेंगे अथवा आग में घी डालने का काम करेंगे.

यह एक तरह की गुंडागर्दी है, अराजकता है कि अलग राय रखने वाले को अकेला कर देना और उसे उसकी राय को लेकर अपराधी करार दे देना. जो लोग इस अभियान को चला रहे हैं वे सफल हो रहे हैं क्योंकि वे भारी पड़ते जा रहे हैं. फेसबुक पर, ट्विटर पर या टीवी चैनलों पर अलग राय रखने वाले पहचान में आ जाते हैं इसलिए उन पर हमले शुरू हो जाते हैं. सवाल यह उठता है कि क्या सरकार समर्थक राय रखना ही देशभक्ति की निशानी है. सरकार के विरोध में खिसकने का मतलब राष्ट्रद्रोह कब से हो गया? लोकतंत्र में मीडिया की आजादी ही उसके मजबूत पायों की निशानी है. अगर किसी लोकतंत्र में मीडिया को खुलकर बात रखने की आजादी नहीं है तो वह लोकतंत्र भले हो मगर बीमार कहा जाएगा. आज देश में अभिव्यक्ति की आजादी खतरे में है. अभिव्यक्ति की बात करते समय अराजकता अथवा गुंडागर्दी का समर्थन नहीं कर रहा बल्कि मेरा आशय यह है कि सरकार को अगर अपनी निंदा सुनने का साहस नहीं है तो वह लोकतंत्र एक तरह का भीड़तंत्र है जिसमें भेड़ें हांकी जाती हैं और ये भेड़ें अपना दिमाग तो रखती नहीं. वे बस वही रास्ता पकड़ती हैं जो लीक उन्हें समझा दी जाती है. इस तरह हमारे देश का डिजिटल संसार यदि रोबोट पैदा कर रहा है तो क्या फायदा होगा. जहां मशीनें तो होंगी लेकिन संजीदा लोग नहीं होंगे. यह एक पूरी पीढ़ी को बरबाद कर देने की तैयारी है जो उनके स्वतंत्र विचार को कुंद कर रही है और इसका खामियाजा आगे आने वाली पीढि़यों को भुगतना पड़ेगा.

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