आम्बेडकर की डगर पर दलित राजनीति का सफर

लेखक और विचारक कंवल भारती कहते है, ‘इन दलों और नेताओं के लिए आम्बेडकर ऐसे चेक बन गए हैं, जिसे वे जब चाहें भुना सकते हैं. इन दलों को आम्बेडकर के विचारों से कुछ लेना-देना नहीं है या यूं कहें इन्हें आम्बेडकर की विचारधारा की एबीसी भी नहीं पता है. यह किसी भी तरह से आंबडेकर और दलितों के हित में नहीं है. उन्होंने हमेशा दलित वर्ग की बात की, लेकिन आज के दौर में सारे राजनीतिक दल जातियों की बात कर रहे हैं और हर दल किसी जाति का प्रतिनिधित्व कर रहा है. आम्बेडकर ने खुद ही कहा था जाति के नाम पर आप कोई भी निर्माण अखंड नहीं रख पाएंगे. देश को हिंदू राष्ट्र बनाने से आम्बेडकर ने आपत्ति जताई थी, ये दल उसी हिंदू राष्ट्र की वकालत करने वाली विचारधारा से गठजोड़ कर रहे हैं, यह आम्बेडकर के विचारों की हत्या है. इन दलों के नेता अपने निजी स्वार्थ के चलते ऐसा कर रहे हैं.’

‘आम्बेडकर सत्ता से तो जुड़े, लेकिन एक बड़े मकसद के लिए. वे सत्ता में रहे, तो पूरे दलित समुदाय को मजबूत किया. कांशीराम भी सत्ता से जुड़े, लेकिन दलाली के लिए’

हालांकि वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे इससे इतर राय रखते हैं, ‘जो आम्बेडकर की राजनीति और विचारों में अपनी जरूरत के हिसाब से संशोधन करने में सफल रहा वह दलित राजनीति में आगे गया. वहीं जो आम्बेडकर के किताबी ज्ञान में उलझा रहा वह असफल हो गया. कांशीराम जो मायावती के गुरु थे, उन्होंने आम्बेडकर के विचारों में अपने हिसाब से बदलाव किया. आम्बेडकर ने कहा था जाति को तोड़ देना चाहिए, तो कांशीराम ने कहा कि जातियों को मजबूत किया जाना चाहिए, क्योंकि हमें जातियों के जरिये ही नुमाइंदगी मिलती है. इस वजह से ही बहुजन समाज पार्टी आगे बढ़ी. जहां तक सवाल दलित दलों द्वारा सत्ता के लिए किए जाने वाले गठजोड़ का है तो आम्बेडकर ने खुद ही कहा था कि राजसत्ता मास्टर चाबी है, उसे प्राप्त करना है. इसी को कांशीराम ने कहा कि राजसत्ता मास्टर चाबी है. उन्होंने उसी को ध्यान में रखा. बहुजन समाज पार्टी ने इसी को ध्यान में रखा. वह हमेशा चुनाव के समय सक्रिय होती है. आम्बेडकर खुद हमेशा सत्ता के साथ रहे. जब अंग्रेजों की सत्ता थी तो वह उनके साथ रहे और जब कांग्रेस की सत्ता आई तो वह उसके कैबिनेट में शामिल हो गए. वे जानते थे कि राजसत्ता के साथ ही रहकर वे दलितों का उद्धार कर सकते हैं. वर्तमान दौर में भी दलित राजनीति बहुत ही कामयाब है. इसने भारतीय राजनीति में अपनी स्वीकार्यता सिद्ध कर दी है. आज दलित राजनीतिक दलों से दूसरे बड़े दलों को गठबंधन करना पड़ रहा है. उन्हें पूरी भागीदारी देनी पड़ रही है.’

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वहीं बद्री नारायण कहते हैं, ‘भीमराव आम्बेडकर सत्ता के साथ तो जुड़े, लेकिन वह एक बड़े मकसद के लिए था. वह सत्ता में रहे, तो पूरे दलित समुदाय को मजबूत बनाया. कांशीराम भी सत्ता के साथ जुड़े, लेकिन वह दलाली के लिए था.’

कुछ ऐसी ही राय कंवल भारती की भी है. वे कहते हैं, ‘जब आम्बेडकर ने राजनीति की, उस समय दलित चेतना-शून्य थे, उनकी कोई राजनीतिक समझ नहीं थी और हिंदू समाज उन्हें कोई भी अधिकार देने को तैयार नहीं था. ऐसे समय में जब आम्बेडकर अंग्रेजों से मिले, तो वह मंत्रिपद या अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं गए थे, वे पूरे समुदाय के हित के लिए गए थे. लेकिन आज के हालात दूसरे हैं. आज के नेता अपने हितों के चलते दलितों के हितों को ताक पर रख देते हैं.’

हालांकि अरुण कुमार त्रिपाठी दलित राजनीतिक दलों की सत्ता में हिस्सेदारी को गलत नहीं मानते हैं. उनका कहना है, ‘जब तक आप सत्ता में नहीं आएंगे, तब तक आप सामाजिक बदलाव नहीं ला पाएंगे. दलितों के लिए स्थितियां देश में आज भी बहुत ही अच्छी नहीं है. उत्तर प्रदेश को छोड़कर दलित राजनीतिक दल अपने दम से सत्ता में आने की स्थिति में कहीं नहीं आए हैं. ऐसे में उन्हें गठबंधन का सहारा लेना पड़ता है. गठबंधन बनाने पर दूसरे दल भी फायदा ले जाते हैं. दलित दलों को अभी लंबी लड़ाई लड़नी है. वैसे भी सत्ता में आने से दलितों में स्वाभिमान का विकास होता है, मुझे नहीं लगता कि सत्ता के लिए गठबंधन करने वाले दलित दलों को गलत कहना सही होगा.’

गठबंधन और दलित राजनीति से जुड़े सवाल पर भाजपा के सांसद उदित राज कहते हैं, ‘आम्बेडकर के नाम पर की गई दलित राजनीति अभी अधूरी है. अभी हमें लंबी लड़ाई लड़नी है. वैसे भी जातिवादी समाज में अपनी पार्टी खड़ी करना मुश्किल काम है. ऐसी परिस्थिति में यदि हम लोकसभा में जाने और अपने लोगों की आवाज उठाने के लिए दूसरी पार्टियों का सहारा ले रहे हैं, तो कोई बुराई नहीं है. मैंने भाजपा का दामन अपने लोगों की भलाई के लिए ही थामा है.’

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