देशद्रोही जेएनयू बनाम राष्ट्रवादी सरकार

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वे कहते हैं, ‘नारा लगाया था हिंदुस्तान की कोर्ट जिंदाबाद, वीडियो में वह सुनाई दे रहा है पाकिस्तान जिंदाबाद! पाकिस्तान जिंदाबाद का नारा वहां लगा ही नहीं. ‘कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ और ‘भारत की बर्बादी तक जंग रहेगी’ जैसे नारे जरूर लगे. लेकिन छात्रों ने ही तुरंत उन लोगों को रोका भी था. दूसरे, जिनके खिलाफ सबूत नहीं हैं, उसे गिरफ्तार किया गया. यह सब फिक्स मैच जैसा लग रहा है. यह वास्तव में रोहित वेमुला का मुद्दा दबाने के लिए किया गया. चार लोगों के नारे पर पूरे जेएनयू को नहीं लपेटा जा सकता.’

जेएनयू के ही शोधछात्र अक्षत सेठ ने बताया, ‘प्रथमदृष्टया वे नारे गलत हैं. वहां जिस तरह के नारे लगे वे आपत्तिजनक हैं, सांप्रदायिक हैं और वहाबी प्रतिक्रियावादियों की उपज हैं. जो नारे लगा रहे हैं, वे जेएनयू के नहीं लग रहे. वैसे भी, भारत की बर्बादी या टुकड़े होने वाले नारे को मैं सिरे से नकारता हूं. लेकिन कार्रवाई किस आधार पर हो रही है? पुलिस-प्रशासन इस वीडियो में नारे लगा रहे लोगों को पहचाने. इतना तय है कि इसमें कोई भी वामपंथी एक्टिविस्ट शामिल नहीं है. ऐसे नारे लगाने के जुर्म में तुरंत कार्रवाई होनी चाहिए. उन पर भी कार्रवाई होनी चाहिए जिन्होंने आनंद शर्मा पर कैंपस में हमला किया. उन पर कार्रवाई हो जो लोग एडमिन ब्लॉक के सामने खुली धमकी दे रहे थे कि पुलिस है तब तक तुम सब बचे हो और कन्हैया को किस आधार पर गिरफ्तार किया गया है, इसका जवाब दें.’

तारशंकर ने बताया, ‘चूंकि वहां पर मामला पहले से फिक्स लग रहा है. चार छात्रों की गलती के लिए पूरे कैंपस को गुनाहगार नहीं बनाया जा सकता. इस मसले पर सभी छात्र और शिक्षक एकसाथ हैं. शनिवार और रविवार को काफी संख्या में शिक्षक और छात्र प्रदर्शन के लिए उतरे. न हम गलत के समर्थन में हैं, न अन्याय बर्दाश्त करेंगे.’

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पटियाला हाउस कोर्ट के बाहरपिटाई के बाद गुस्साए पत्रकारों ने 16 फरवरी को वकीलों के खिलाफ मार्च निकाला और सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपा

हालांकि, जेएनयू के अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के संयुक्त सचिव सौरभ शर्मा ने बताया, ‘शाम को चार-पांच बजे के आसपास मैं वाइस चांसलर से मिलने गया. क्योंकि ये कहीं न कहीं ये भड़काने की बात है. किसी विश्वविद्यालय में ऐसी बात करना समाज को तोड़ना है. उस पम्फलेट में बाकायदा ‘ज्यूडीशियल किलिंग’ लिखा गया था. लेकिन वाइस चांसलर नए हैं तो उन्होंने कहा, मैं बात करता हूं. मैंने रजिस्ट्रार और डीएसडब्ल्यू को भी लेटर लिखा. जब मैंने देखा कि इनका कुछ खास इरादा नहीं है तो मैंने सारे मीडिया को मैसेज किया और हम लोग विरोध करने के लिए गए.’

कोई घटना अगर आपत्तिजनक भी हो, तो भी एबीवीपी को खुद जाकर हस्तक्षेप करने की जरूरत क्यों है? क्या इसके लिए प्रशासन की मदद नहीं ली जा सकती? एबीवीपी को खुद ही प्रशासन और अदालत क्यों बनना चाहिए? इसके जवाब में सौरभ कहते हैं, ‘हर बार ऐसा कुछ होता है तो कमेटी बनती है और रिपोर्ट आ जाती है. होता कुछ नहीं है.’ बीएचयू, इलाहाबाद, हैदराबाद या हर कैंपस में एबीवीपी ऐसी अराजकता क्यों फैलाती है, वह खुद ही मारपीट पर क्यों उतारू हो जाती है, इसके जवाब में सौरभ कहते हैं, ‘यह बिल्कुल गलत है. ऐसा बिल्कुल नहीं करना चाहिए. अब कोई किसी को पीट दे, कोई किसी की हत्या कर दे तो एबीवीपी जिम्मेदार नहीं है.’

13 फरवरी को जेएनयू कैंपस में छात्र और शिक्षकों ने करीब दो किलोमीटर लंबी ह्यूमन चेन बनाकर प्रदर्शन किया. उस दिन से जेएनयू में हड़ताल चल रही है. शिक्षकों और छात्रों की ओर से कहा गया है कि जब तक कन्हैया को पुलिस नहीं छोड़ेगी, हड़ताल और प्रदर्शन जारी रहेगा. छात्रों और शिक्षकों का कहना है कि अगर कोई घटना घटी थी तो पहले विवि प्रशासन को अपने स्तर पर जांच करके छात्रों को दंडित करना था. विश्वविद्यालय के नियमों को दरकिनार करके कैंपस के भीतर पुलिस कैसे आई? विरोध कर रहे छात्र और शिक्षक हालिया नियुक्त उप कुलपति जगदीश कुमार की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं. हालांकि, जगदीश कुमार ने 15 फरवरी को बयान जारी किया, ‘जेएनयू प्रशासन छात्रों, शिक्षकों और उनकी अभिव्यक्ति की आजादी के साथ खड़ा है.’ हालांकि, रजिस्ट्रार के दस्तखत वाला एक नोट भी सामने आया कि कैंपस में पुलिस  प्रशासन की अनुमति से आई थी.

पटियाला हाउस कोर्ट के बाहर जिन लोगों के साथ मारपीट की गई, उनमें एआईएसएफ के विश्वजीत भी शामिल थे. विश्वजीत बताते हैं, ‘मुझे देखते ही उन लोगों ने कहा देखो ये भी जेएनयू वाला है और मारपीट शुरू कर दी. यह सब देखते हुए अब हमारी समझ यह बन रही है कि नौ तारीख की नारेबाजी की घटना प्रायोजित थी. जानबूझ कर जेएनयू के पूरे लोकतांत्रिक स्पेस को खत्म करने की साजिश है. जेएनयू हमेशा लोकतंत्र के मूल्यों, वंचित तबकों, गरीब, दलित, पिछड़े, आदिवासी सबके लिए खड़ा रहा है. सिर्फ कैंपस में ही नहीं, पूरी दुनिया में जहां भी अन्याय होता है, जेएनयू उसके खिलाफ खड़ा होने वाला कैंपस है. उसे तोड़ने की पुरानी साजिश है जिसे अमल में लाया जा रहा है. सुब्रमण्यम स्वामी और संघ के मुखपत्र ये अभियान काफी पहले ही शुरू कर चुके थे. यह जेएनयू का लोकतांत्रिक स्पेस और प्रतिरोध की संस्कृति को मिटाने का प्रयास है. यूजीसी और रोहित वेमुला मसले पर रक्षात्मक मुद्रा में रही सरकार यह सब प्रायोजित कर रही है.’

विश्वजीत कहते हैं, ‘हर मसले पर लड़ने वाले जेएनयू के कुछ छात्रों ने ही सरकार को यह बहाना दे दिया कि वे हमले करें. हमारे पास लड़ने के लिए बहुत बड़े मसले हैं. हमारे पास लड़ने के लिए करोड़ों की जनता के मुद्दे हैं. जेएनयू में जो नारेबाजी है वह एआईएसएफ का मुद्दा न है, न हो सकता है. वह अतिवाद है.’

जेएनयू की प्रोफेसर वी. सुजाता के मुताबिक, ‘एक वीडियो, जिसकी कोई प्रामाणिकता नहीं है, के आधार पर छात्रों पर देशद्रोह की कार्रवाई की जा रही है. आपत्तिजनक कार्यक्रम में जो लोग शामिल थे, उनकी पहचान भी नहीं की जा सकी है. बिना प्रक्रिया पूरी किए छात्रों को जेल में डालने की इतनी जल्दी क्यों है? जबकि यही सरकार गांधी के हत्यारे की बरसी मनाने को लेकर बेहद सहिष्णु है. यह सब चिंतित करने वाला है.’

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इस पूरी कार्रवाई में हैदराबाद में रोहित वेमुला प्रकरण में काफी समानता है. इस मामले के सामने आते ही पूर्वी दिल्ली से भाजपा सांसद महेश गिरी ने एफआईआर दर्ज कराई और अपनी लिखित शिकायत में इन छात्रों को संविधान विरोधी और देशद्रोही कहा है. उन्होंने गृह मंत्री राजनाथ सिंह और मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को भी खत लिखकर कड़ी कार्रवाई करने की अपील की. राजनाथ ने भी अपूर्व तेजी दिखाते हुए ‘देशद्रोहियों’ को कड़ी सजा दिलाने का ऐलान कर दिया. स्मृति ईरानी ने भी ‘भारत माता का अपमान बर्दाश्त नहीं करने का ऐलान कर दिया.’

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उधर, दिल्ली पुलिस किसी को भी देशद्रोही साबित करने पर आमादा है. 13 फरवरी को ‘जश्न-ए-रेख्ता’ प्रोग्राम से संगवारी नामक सांस्कृतिक संगठन के तीन छात्रों को दिल्ली पुलिस ने उठा लिया. इनमें से एक देवव्रत ने बताया, ‘रेख्ता में हम लोग गुलजार को सुनने के लिए गए थे. उनका प्रोग्राम खत्म हुआ तो करीब 11.30 बजे हम बाहर चाय पीने के लिए निकले. फिर जब हम वापस हुए तो मुझे पकड़ लिया गया. सबसे पहले पुलिस ने हमारा मोबाइल छीन लिया ताकि हम किसी को बता न पाएं. हमें बिना कुछ बताए अपने साथ ले गए. ले जाने के बाद हमसे बस यही पूछा कि आप लोग जेएनयू से हैं? हमने बताया नहीं. तो पुलिस वाले ने कहा, तुम लोग दिखते हो जेएनयू वालों जैसे और तुम्हारे पास ढपली भी है. अब बैठो, पहले तुम्हारे बारे में तहकीकात करेंगे. करीब चार घंटे बाद एसएचओ जब आया उसके बाद जाने दिया.’ यह रहस्य भी बड़ा दिलचस्प है कि जिसने दाढ़ी रखी है या कुर्ता पहना है तो वह अनिवार्यतः जेएनयू से होगा और देशद्रोही गतिविधि में संलिप्त होगा.

हालांकि, कन्हैया कुमार की गिरफ्तारी के एक दिन बाद शनिवार को जेएनयू में बड़ा विरोध प्रदर्शन आयोजित हुआ था. इसमें विपक्षी दल कांग्रेस से राहुल गांधी, आनंद शर्मा, अजय माकन, सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी और सीपीआई सचिव डी. राजा भी शामिल हुए थे. कार्यक्रम से लौटते समय आनंद शर्मा पर ब्लेड से हमला हुआ था, जिसके विरुद्ध उन्होंने एफआईआर दर्ज कराई है. दूसरी तरफ वामपंथी पार्टियों की ओर से डी. राजा, सीताराम येचुरी और जदयू के केसी त्यागी ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाकात कर कन्हैया कुमार के खिलाफ पेश किए गए सबूत की ‘प्रामाणिकता’ की जांच कराने की मांग की. इस मामले में केजरीवाल ने जांच के आदेश दे दिए हैं. सीताराम येचुरी ने कन्हैया की गिरफ्तारी को गलत बताते हुए सबूतों की जांच की मांग की है. दूसरी ओर, कन्हैया की गिरफ्तारी के मुद्दे पर हैदराबाद की उस्मानिया यूनिवर्सिटी और एफटीआईआई में भी विरोध प्रदर्शन हुए.

जेएनयू में राष्ट्रविरोधी नारे लगे हों या नहीं, यह तो जांच का विषय हो सकता है, लेकिन यह विश्वविद्यालय लंबे समय से निशाने पर था. कुछ महीने पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ‘पाञ्चजन्य’ ने ‘दरार का गढ़’ शीर्षक से कवर स्टोरी की थी और जेएनयू को देशद्रोहियों का अड्डा बताया था. तब देशविरोधी नारेबाजी जैसी कोई घटना नहीं हुई थी, तब हमला जेएनयू के ‘सेक्युलर’ और ‘प्रगतिशील’ चरित्र को लेकर था. अब ‘पाञ्चजन्य’ की जगह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा भाजपा की सरकार जेएनयू को ‘देशद्रोहियों का गढ़’ बता रही है और इस बार कथित तौर पर देशविरोधी नारे का एक बहाना भी है.

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