मोदी की शह पर फिर भाजपा के शाह

उनके पहले कार्यकाल के बारे में वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय कहते हैं, ‘अमित शाह का जो पहला कार्यकाल है वह बड़ी उम्मीदों का रहा है. उम्मीद मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि भाजपा की केंद्र में सरकार बन गई थी. एक सत्तारूढ़ पार्टी के वे अध्यक्ष बने. 11, अशोक रोड पर सरकार बनने के बाद बहुत भीड़ होती थी. एक व्यवस्था अमित शाह ने ये बनाई थी कि मंत्री पार्टी मुख्यालय में बैठें और कार्यकर्ताओं की परेशानी को सुनें. शुरू-शुरू में मंत्री आकर सुनते भी थे. आज भी आते हैं, लेकिन लोगों का काम नहीं हुआ. इसलिए अमित शाह के बारे में लोगों में शिकायत फैलने लगी. पहली कि अमित शाह लोगों और कार्यकताओं से मिलते नहीं हैं. दूसरी शिकायत मंत्री पार्टी मुख्यालय में बैठते तो हैं, लेकिन काम नहीं होता है. तो एक तरह से निराशा धीरे-धीरे फैली और बिहार व दिल्ली विधानसभा चुनाव में जो परिणाम आया उसका कारण यह भी रहा. हर पार्टी के कार्यकताओं को यह उम्मीद होती है कि जब उनकी सरकार आए तो उनका जायज काम आसानी से हो जाए. जब यह नहीं होता है तो इसका दोष अध्यक्ष पर जाता है और इसके जरिये सरकार पर जाता है.’

भाजपा अध्यक्ष के रूप में अमित शाह के कामकाज पर सवाल दूसरे विश्लेषक भी उठाते हैं. अभय दुबे कहते हैं, ‘अमित शाह के कार्यकाल के दौरान जिन राज्यों में भाजपा अपनी सरकार बना पाई है, इन राज्यों में हरियाणा को छोड़कर वोट बैंक में लोकसभा चुनाव के मुकाबले गिरावट आई है. इसके अलावा वहां पर भाजपा को विपक्ष के बिखराव का फायदा मिला. झारखंड, महाराष्ट्र और जम्मू-कश्मीर में कांग्रेस के गठबंधन टूटने से भाजपा जीतने में सफल हुई है. इसके अलावा दिल्ली और बिहार ने अमित शाह के साथ-साथ मोदी की साख को भी बहुत नुकसान पहुंचाया है. कुल मिलाकर कहा जाए तो अमित शाह का अभी का कार्यकाल बहुत अच्छा नहीं रहा है. उन्होंने केंद्रीकरण को बढ़ावा दिया है. उनसे मिलने में लोगों को दिक्कतें होती हैं. वह भाजपा के दफ्तर में नौकरशाह की तरह बैठे रहते हैं. किसी भी नेता यहां तक कि मंत्रियों और सांसदों को उनसे मिलने में दिक्कतें होती हैं. वह सांगठनिक सत्ता के बड़े केंद्र हैं, लेकिन अगर ऐसा नेता लोगों को साथ लेकर नहीं चलता तो असंतोष फैल जाता है.’  हालांकि ऐसा सभी का कहना नहीं है. पार्टी कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की सोच इससे भिन्न है.’

लोकसभा चुनाव के दौरान शाह के साथ काम कर चुके और अभी उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष लक्ष्मीकांत वाजपेयी कहते हैं, ‘अमित शाह के साथ मेरा काम करने का अनुभव अविस्मरणीय रहा है. लोकसभा चुनाव में वे उत्तर प्रदेश के प्रभारी थे. तत्काल निर्णय लेना और उसे तुरंत पूरा करना उनकी सबसे बड़ी खूबी है. इसी का असर रहा कि पार्टी ने महाराष्ट्र, झारखंड, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में बेहतर प्रदर्शन किया. आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा का चुनाव हम अमित शाह के नेतृत्व में मजबूती से लड़ेंगे. जिस प्रकार की आवश्यकता उस प्रकार का व्यवहार उनकी सबसे बड़ी खासियत है. यदि हम अनुशासन की दृष्टि से बात करें तो सख्त व्यवहार और अगर साथ में बैठकर खाना खा रहे हैं तो यह पता ही नहीं चलेगा कि इस व्यक्ति ने हमें अभी इतनी बुरी तरह से डांटा था.’

भाजपा कार्यकर्ता अरुण कुमार कहते हैं, ‘अमित शाह कम बोलते हैं इसलिए लोगों को गलतफहमी हो जाती है. वैसे भी जब भी हिंदी बेल्ट के बाहर से पार्टी का अध्यक्ष चुना जाता है, तो लोगों को संवाद बनाने में थोड़ी परेशानी होती है. लेकिन वह भी समय के साथ दूर होती है. नितिन गडकरी के साथ भी शुरुआत में ऐसा हुआ था, लेकिन बाद में सब ठीक हो गया. अमित शाह की सबसे बड़ी खूबी है कि वह पार्टी की हर छोटी-बड़ी गतिविधि व कार्यक्रम पर पैनी नजर रखते हैं और कार्यकर्ताओं को खूब छूट देते हैं. हमेशा मनोबल बढ़ाते रहते हैं.’ कुछ ऐसा ही मानना उत्तर प्रदेश भाजपा के मीडिया प्रभारी मनीष शुक्ला का है. वे कहते हैं, ‘अमित शाह चुनावी राजनीति के माहिर आदमी हैं. जहां वह अनुशासन में कड़े हैं, वहीं कार्यकर्ताओं के प्रति बहुत विनम्र हैं. उनके नेतृत्व में भाजपा कार्यकर्ताओं के लिहाज से दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनी है. कार्यकर्ताओं के लिए उनसे मिलना बहुत आसान है.’ बहरहाल अमित शाह की टीम पर हमेशा सवाल खड़े होते हैं.

जानकारों का कहना है कि अमित शाह का संगठन अब तक का सबसे कमजोर संगठन रहा है. एक ऐसे समय में जब पार्टी सत्ता में है तो संगठन को मजबूत किया जाना चाहिए था, लेकिन शाह इसमें नाकाम रहे. अभी उनके पदाधिकारी सरकार के कार्यक्रमों को जनता के बीच ले जाने में पूरी तरह से असफल रहे हैं. राम बहादुर राय कहते हैं, ‘जब वे अध्यक्ष बने तो उन्होंने ऐसी टीम बनाई जिसका कोई चेहरा ही नहीं है और कहना होगा कि वह ऐसे लोगों की टीम थी, जो दरअसल गणेश परिक्रमा के लिए जाने जाते हैं. मतलब कि वह जनता के बीच में नहीं सत्ता के इर्द-गिर्द परिक्रमा करने वाले हैं. इससे भी भाजपा के कार्यकर्ता को निराशा हुई. अगर आप राजनाथ की टीम और गडकरी की टीम को देखें तो ऐसा बिल्कुल नहीं था. नितिन गडकरी में एक दृष्टि थी. उनका मानना था कि जब वे अध्यक्ष पद से हटें तो ऐसे नए लोग तैयार रहें जो यह जिम्मेदारी उठा सकें. उन्होंने धर्मेंद्र प्रधान, भूपेंद्र यादव, जेपी नड्डा जैसे नेताओं को आगे बढ़ाया. उस दृष्टि से देखें तो अमित शाह की टीम बहुत कमजोर रही.’

Shah-Modi-web

अमित शाह की टीम में जातीय समीकरण भी ठीक नहीं रहा है. राजनीतिक विश्लेषक चंद्रभान प्रसाद कहते हैं, ‘यदि हम पिछड़े और दलित लोगों के संदर्भ में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के कार्यकाल का आकलन करें तो कुछ बहुत बेहतर नहीं रहा है. कोई भी बड़ा दलित नेता अभी अमित शाह की टीम में नहीं है. वैसे भी दलित भाजपा का कभी कोर वोट बैंक नहीं रहा है. लेकिन राष्ट्रीय पार्टी के नाते भाजपा को दलित नेतृत्व को आगे बढ़ाना चाहिए. अब उन्हें नया कार्यकाल मिला है तो हम उम्मीद करते हैं कि वह नए कार्यकाल में दलित नेतृत्व का ख्याल रखेंगे. एक नया दलित नेतृत्व भाजपा में उभरकर सामने आएगा.’ इस बात से इत्तेफाक अजय बोस भी रखते हैं. वे कहते हैं, ‘दलित प्रतिनिधित्व का मामला भाजपा में हमेशा कमजोर रहा है. अमित शाह इसमें बदलाव नहीं ला पाए हैं. इस दौरान दलितों और पिछड़ों की बात तो बहुत हुई, लेकिन न तो कोई नया दलित नेतृत्व सामने आया और न ही जमीनी स्तर पर दलितों को जोड़ने में पार्टी सफल रही है.’

अगर हम अमित शाह के अध्यक्षीय कार्यकाल में किए गए कामों के बारे में देखें तो उनकी वेबसाइट पर कहा गया है कि उन्होंने अपने 18 महीने के कार्यकाल में पार्टी के विभिन्न कार्यक्रमों के अंतर्गत प्रतिदिन 495 किमी के औसत से कुल 2,65,600 किमी की यात्रा की. चुनाव के अतिरिक्त किसी और प्रयोजन के लिए पार्टी के पदाधिकारियों द्वारा निजी विमान के उपयोग पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया. इसके अलावा सामान्य परिस्थितियों में प्रवास के दौरान महंगे होटलों में ठहरने पर रोक लगाकर सरकारी गेस्ट हाउस में रुकने के लिए पार्टी के पदाधिकारियों को प्रोत्साहित किया. वह स्वयं भी इस नियम का पालन करते हैं. उनके नेतृत्व में पार्टी ने सदस्यता के पूर्व के सारे कीर्तिमानों को तोड़ते हुए सदस्यों की संख्या 2,47,32,439 से पांच गुना बढ़ाकर 11,08,88,547 तक पहुंचा दी. हालांकि सदस्य संख्या बढ़ाने के तरीके पर सवाल भी उठते रहे हैं. पार्टी ने मिस कॉल और एसएमएस के जरिये भी सदस्यता अभियान चलाया है, जिससे बड़ी संख्या में फर्जी सदस्यता की खबरें आईं.

‘अमित शाह कम बोलते हैं इसलिए लोगों को गलतफहमी हो जाती है. वैसे भी जब भी हिंदी बेल्ट के बाहर से पार्टी का अध्यक्ष चुना जाता है, तो लोगों को संवाद बनाने में थोड़ी परेशानी होती है. लेकिन वह भी समय के साथ दूर हो जाती है’

राम बहादुर राय कहते हैं, ‘हम भाजपा द्वारा बताई जा रही सदस्य संख्या पर भरोसा तो नहीं कर सकते हैं, लेकिन इतना जरूर है कि शाह ने इस दिशा में बहुत मेहनत की है. अमित शाह की एक ताकत है. संगठन का उनको अनुभव है. उनका स्वभाव भी परिश्रमी है. अब बिहार चुनाव का ही उदाहरण लीजिए. दूसरे नेता जो हेलीकाॅप्टर से घूमते थे. बड़े होटलों में रुकते थे. चुनाव प्रचार कर वापस फिर वहीं आ जाते थे. उससे भिन्न अमित शाह जहां जाते थे, वहीं कार्यकर्ताओं के घर या साधारण गेस्ट हाउस में रुकते थे. उन्होंने भाजपा की पुरानी परंपरा को जिंदा रखा.’

वहीं राजनीतिक विश्लेषक आर राजगोपालन कहते हैं, ‘अमित शाह ने भाजपा अध्यक्ष के रूप में बहुत ही बेहतरीन काम किया है. केवल बिहार में ही उन्हें असफलता हाथ लगी. लेकिन उनका नया कार्यकाल उम्मीदों भरा है. असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश उनके सामने चुनौती हैं लेकिन अमित शाह इससे बढ़िया तरीके से निपटने में सक्षम हैं. सबसे बड़ी बात कि संघ का समर्थन उनके पास है. इसके अलावा मार्गदर्शक मंडल भी अब उनके पक्ष में है. आडवाणी का हालिया बयान इसकी पुष्टि करता है. वैसे भी अमित शाह एक कुशल राजनीतिज्ञ हैं. इस कार्यकाल में वह उन सारी कमियों को दूर करेंगे, जिसका आरोप उनके ऊपर लगता रहा है.’

भाजपा अध्यक्ष के रूप में अमित शाह की तुलना हमेशा उनके पूर्ववर्ती लोगों से की जाती है. लंबे समय से भाजपा से जुड़े अरुण कुमार पिछले दो अध्यक्षों से तुलना करते हुए कहते हैं, ‘एक कार्यकर्ता के रूप में यदि मैं कहूं तो पूर्व भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह और नितिन गडकरी का जनसंवाद बहुत बेहतर रहा है. यह बात नितिन गडकरी की किताब के विमोचन के दौरान अमित शाह ने स्वीकार भी की है. नितिन जी के कार्यकाल में पार्टी कार्यालय में काम करने वाले कार्यकर्ताओं की तनख्वाह बढ़ाई गई. भाजपा के कार्यालयों को बेहतर बनाया गया. वह पार्टी कार्यकर्ताओं का बहुत ख्याल रखते थे. वहीं राजनाथ जी की अधिकतम सक्रियता गरीबों और किसानों के बीच रही. वह जातिगत भावना से ऊपर उठकर काम करते थे. वो जहां जाते थे वहां ग्रामीण लोगों की भीड़ लग जाती थी. लोग आसानी से उनके साथ मिल जाते थे. जब से अमित शाह का नेतृत्व भाजपा में आया है, तब से पार्टी की कार्यप्रणाली में बहुत बदलाव आया है. उन्होंने बड़े पैमाने पर मतदाताओं और कार्यकर्ताओं का डाटाबेस तैयार कराया है. करीब दस करोड़ लोगों का डाटा तैयार किया गया है. महासम्पर्क अभियान के जरिये वह जमीनी स्तर पर लोगों को जोड़ने में कामयाब रहे. इसका फायदा हमें आगामी चुनावों में मिलेगा’

जानकार कहते हैं कि अमित शाह को दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनाए जाने के फैसले पर इसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मुहर लगाई. भाजपा का अध्यक्ष अमित शाह को दोबारा बनाना चाहिए या नहीं इस पर जलगांव में 6 से 8 जनवरी तक संघ परिवार के प्रमुख स्वयंसेवक ही चिंतन करते हैं. चिंतन के बाद 17 जनवरी को सह सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल प्रधानमंत्री मोदी को जानकारी देते हैं. उनकी राय लेते हैं और प्रधानमंत्री की पूर्ण सहमति या इच्छा मानकर 18 जनवरी को कृष्ण गोपाल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह से मिलते हैं, उन्हें खुशखबरी देते हैं.

अब संघ के सामने अमित शाह से बेहतर कोई विकल्प क्यों नहीं था इस सवाल पर राम बहादुर राय कहते हैं, ‘अमित शाह की सबसे बड़ी ताकत यह है कि उनके अलावा कोई और नरेंद्र मोदी सरकार के साथ तालमेल बिठाकर चलने में सक्षम नहीं होगा. इसी वजह से उन्हें नया कार्यकाल मिला है. संघ ने तय कर लिया है कि नरेंद्र मोदी सरकार से उसको किसी तरह की शिकायत नहीं है. ऐसी परिस्थिति में भाजपा का अध्यक्ष कोई ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जो संघ, पार्टी और प्रधानमंत्री के बीच किसी तरह का भ्रम पैदा करने का अवसर न दे. इस पैमाने के प्रति अमित शाह पर संघ का विश्वास है. दो-तीन महीने पहले से यह बात चल रही थी कि अमित शाह को हटाया जाएगा और दूसरा कोई अध्यक्ष बनेगा. लेकिन संघ ने यह पाया कि अमित शाह सबसे बेहतर हैं. वह ठीक समन्वय के माध्यम हो सकते हैं. हमारे यहां यह सवाल हमेशा से सत्तारूढ़ पार्टी के साथ बना रहा है कि अध्यक्ष कौन हो. इसका सबसे अच्छा विकल्प यह है कि कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे प्रधानमंत्री के साथ-साथ पार्टी का भी विश्वास हासिल हो. आप देखेंगे कि कांग्रेस में आजादी के साथ ही यह समस्या आ गई. कृपलानी उस समय कांग्रेस के अध्यक्ष थे. नेहरू तब कृपलानी से बिना पूछे काम किया करते थे. कृपलानी ने इसे मुद्दा बनाकर इस्तीफा दे दिया. इसके बाद पी. सीतारमैया अध्यक्ष बने जो नेहरू के विश्वासपात्र थे. इसी तरह वाजपेयी जब प्रधानमंत्री बने तो कुशाभाऊ ठाकरे अध्यक्ष बने, लेकिन वह कुछ ऐसे सवाल उठाते रहे जो सरकार के लिए परेशानी का कारण बनते थे. अंततः कुशाभाऊ ठाकरे को इस्तीफा देना पड़ा. फिर जे. कृष्णामूर्ति अध्यक्ष बने. यह पहले से ही चलता रहा है. इस समय अमित शाह दोनों के विश्वासपात्र हैं. यही इनकी सबसे बड़ी ताकत है.’

‘मोदी के प्रति आलोचना का भाव रखते हुए भी संघ नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता है. कहा जाए तो जैसे गलत शादी हो जाती है तो पूरा परिवार मिलकर उसे ढोता है. वही हालत भाजपा, संघ, मोदी और शाह की है. सारे लोग एक गलत शादी को सही करने में लगे हैं’

हालांकि अभय दुबे इससे इत्तेफाक नहीं रखते. वह कहते हैं, ‘संघ मोदी के प्रति आलोचना का भाव रखते हुए भी उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता है. मोदी की छवि गिरने का मतलब पूरी सरकार की छवि खराब होगी. कुल मिलाकर कहा जाए तो जैसे गलत शादी हो जाती है तो पूरा परिवार मिलकर उसे ढोता है, वही हालत भाजपा, संघ, मोदी और शाह की है. सारे लोग एक गलत शादी को सही करने में लगे हैं.’

वैसे अमित शाह के फिर से भाजपा अध्यक्ष बनने से साफ हो गया है कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी ही पार्टी को 2019 लोकसभा में नेतृत्व देगी. संघ का समर्थन हासिल करने में उनके व्यक्तित्व ने एक बड़ी भूमिका अदा की है. वे बहुत कम बोलते हैं, पार्टी की विचारधारा के प्रति समर्पित हैं, पार्टी-सरकार के बीच सही संतुलन रखते हैं. शाह को संघ के बड़े नेताओं का पूरा समर्थन हासिल है. साल 2014 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद कई विधानसभा चुनावों में शाह ने संघ कार्यकर्ताओं का बढ़िया इस्तेमाल किया. पार्टी और संघ के जमीनी कार्यकर्ताओं से उनका सीधा संपर्क है. अभी अमित शाह के नेतृत्व के चलते मोदी के पास अपनी सरकार का एजेंडा लागू करने के लिए पूरी आजादी होती है. अब यह आगे भी रहेगी. वैसे भी देखा जाए तो पार्टी और सरकार के बीच वर्तमान में तनाव पूरी तरह से गायब है.

राम बहादुर राय कहते हैं, ‘भाजपा आडवाणी के अध्यक्ष पद से हटने के बाद से ही संक्रमण के दौर से गुजर रही है. वह संक्रमण अमित शाह के अध्यक्षीय कार्यकाल में खत्म हो जाएगा. यानी एक ऐसा अध्यक्ष भाजपा को मिल रहा है जो अपने ढंग से पार्टी को पुनर्गठित करेगा. जैसा कि आडवाणी ने लंबे समय तक किया था. अमित शाह की समझ और निष्ठा में किसी को संदेह नहीं है. उन्हें असफलता तभी हाथ लग सकती है अगर वह नई पीढ़ी की आकांक्षाओं को पूरा करने में असफल रहते हैं. ऐसे में पार्टी अपना जनाधार खो देगी.’