संघर्ष की पगडंडी पर 30 साल

0
134

बड़वानी जिले के डूब क्षेत्र में आने वाले गांव छोटा बरदा के निवासी और नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता महादेव भगवान दास का कहना है, ‘हम भले ही बांध बनने से नहीं रोक पाए हों लेकिन अब तक हम यहां संघर्ष की वजह से ही टिके हुए हैं. अगर आंदोलन नहीं होता तो हम 15-20 साल पहले ही उजाड़ दिए गए होते.’ आंदोलन के भविष्य को लेकर उनका कहना है, ‘हमें मुआवजे के बलबूते नहीं रहना है. हम जीवन की लड़ाई लड़ रहे हैं और इसे आगे भी जारी रखेंगे.’

नर्मदा बचाओ आंदोलन के पूर्णकालिक कार्यकर्ता और भीलखेड़ा गांव (बड़वानी) के कैलाश अवास्या का कहना है, ‘तीस साल बाद भी लोग हटे नहीं बल्कि पूरी ताकत के साथ डटे हुए हैं. लोग यह लड़ाई सिर्फ अपने लिए नहीं सभी गांवों के लिए लड़ रहे हैं, हम आगे भी लड़ते और संघर्ष करते रहेंगे.’

आंदोलन से जुड़े मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव शरदचंद्र बेहार कहते हैं, ‘इस आंदोलन ने तथाकथित विकास के मॉडल के खिलाफ पहली बार आवाज उठाई. यह पहला उदाहरण था जिसने यह रास्ता दिखाया कि कैसे बड़ी विकास परियोजनाओं का भी विरोध किया जा सकता है. इससे पहले ऐसी परियोजनाओं को सिर्फ अच्छा ही माना जाता था. विकास के इस स्याह पक्ष को सरकार के साथ-साथ जनता भी नजरअंदाज करती थी. इस पक्ष को सामने लाना और उसे स्थापित करना ही इस आंदोलन की पहली बड़ी उपलब्धि रही है. दूसरी उपलब्धि यह है कि इसने बताया कि बड़े बांधों के दुष्प्रभावों से मात्र इंसानों को ही नुकसान नहीं होता है बल्कि इसका डूब क्षेत्र बनने से जमीन, वहां का इतिहास, स्थानीय पेड़-पौधे, पर्यावरण, संस्कृति भी डूबते हैं. इस तरह से बड़े बांधों से होने वाले मानवीय, सामाजिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक आघात को विमर्श के केंद्र में लाने में इस आंदोलन की महत्वपूर्ण भूमिका रही है. इसके प्रभाव से ही यह संभव हो सका कि अब नाभिकीय और खनन जैसी बड़ी परियोजनाओं के खिलाफ लगातार आंदोलन हो रहे हैं. इसने उन्हें रास्ता दिखाने का काम किया है. यह इस आंदोलन की ही साख थी कि जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विश्व बांध आयोग बना तो मेधा पाटकर को भी सदस्य बनाया गया.’

 

[box]

गहरे जख्म छोड़ गया देश का सबसे बड़ा विस्थापन

विजय मनोहर तिवारी

एक साल पहले इंदिरा सागर बांध के इलाके में एक बार फिर जाने का मौका मिला. तब मुझे 2004 के मानसून के विकट दिन याद आ गए. इस परियोजना में करीब 250 गांव डूबे. हरसूद नाम का छोटा सा शहर जून 2004 में डूब क्षेत्र में आया था. दुनिया भर के मीडिया ने तब दिखाया था कि एक हजार मेगावाट बिजली हजारों परिवारों के लिए किस कदर अंधेरा लेकर आई थी. ज्यादातर लोग मामूली मुआवजा लेकर निकले या निकाले गए. हरसूद वालों के लिए छनेरा नाम की जगह पर एक उजाड़ पथरीला मैदान दिया गया था, जहां बीच बारिश में विस्थापितों को अपने घर बनाने थे. सब कुछ बेहद अमानवीय ढंग से हुआ.

10 साल के कांग्रेस राज में बांध एक तरफा ढंग से बनता गया. पुनर्वास के नाम पर कुछ हुआ नहीं था. 2003 में उमा भारती के नेतृत्व में भाजपा की सरकार मध्य प्रदेश में बनी. विकास का राग अलापने वाली सरकार के लिए हरसूद देश में विस्थापन और पुनर्वास का एक शानदार मॉडल बनाने का मौका था, जो बेलगाम और भ्रष्ट अफसरशाही के हाथों उसने गंवा दिया गया. खाने-कमाने वाली राजनीति के खेल में नेता बेगुनाह नहीं थे. पदों की अंधी होड़ में उन्हें ऐसी कोई ट्रेनिंग ही नहीं दी जाती, जब उन्हें सिखाया जाए कि आम आदमी के हितों से जुड़े इस तरह के संवेदनशील मसलों पर वे किस तरीके से पेश आएं. ज्यादातर नेताओं के पास अपना कोई नजरिया ही नहीं है. वे इतने ईमानदार भी नहीं हैं कि अफसर डर से खुद बेईमानी न करें. यह विस्थापन इनके मकड़जाल में उलझी एक दर्दनाक कहानी है.

दिग्विजय सिंह ने दस साल एकछत्र राज किया था. पिछले 12 साल में भाजपा सरकार में तीन मुख्यमंत्री हुए. शिवराजसिंह चौहान को दस साल से ज्यादा हो गए. उन्हें तीन बार लगातार अच्छे-खासे बहुमत से चुना गया. हांलाकि किसी के भी राज में इस तरह कोई खास कदम नहीं उठाए गए. आप आज भी हरसूद, छनेरा, काला पाठा, चैनपुर और सतवास के पुनर्वास स्थलों पर जाकर देख सकते हैं कि इस सरकार को मिली ताकत यहां किसी के कुछ काम नहीं आई. मुझे अफसोस के साथ यह स्वीकार करना पड़ रहा है कि यह विस्थापन हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक तंत्र की नाकामी की एक घृणित मिसाल है.

भ्रष्ट अफसरों के लिए यह इलाका एक टकसाल बन गया था. जांच एजेंसियों ने 13 अफसरों को रिश्वत लेते हुए पकड़ा था. वे उन चील-गिद्धों की तरह पेश आए जो अपने हिस्से का मांस नोचने के लिए जमीन पर पड़े मुर्दों के ऊपर मंडराते हैं. यहां डेढ़ लाख की बेदखल आबादी उनके लिए पौष्टिक आहार की तरह उपलब्ध थी. ढाई हजार से ज्यादा भुक्तभोगी खंडवा की अदालत में सालों तक चक्कर लगाते रहे. ऐसे कई परिवार हैं, जो बीते 11 सालों में तीन-तीन शहरों में बसने की नाकाम कोशिश में लगे रहे हैं. हरसूद के एक प्रतिष्ठित परिवार से आने वाले आरटीआई एक्टीविस्ट धर्मराज जैन ने आरटीआई के जरिए एक कामयाब लड़ाई लड़कर अपना हक हासिल तो कर लिया मगर इसमें एक पूरी पीढ़ी बर्बाद हो गई. दस साल में बांध से 2500 करोड़ रुपये की बिजली बनी. छह साल का मुनाफा ही करीब 1800 करोड़ रुपये का था. यह आंकड़ा इसलिए ध्यान देने योग्य है, क्योंकि यहां से बेदखल हुए लोगों को उनकी संपत्तियों का कुल मुआवजा मिला था सिर्फ 1170 करोड़ रुपये. इसमें हरसूद शहर का मुआवजा था मात्र 68 करोड़ रुपये!

नर्मदा बचाओ आंदोलन के सुविधाहीन और सक्रिय कार्यकर्ताओं ने इस अमानवीय और लोगों के दिलों पर गहरे जख्म छोड़कर गए विस्थापन को गुमनाम नहीं रहने दिया. बांध पूरा बनने के बावजूद 91 गांवों में भूअर्जन ही शुरू नहीं हुआ था. नर्मदा बचाओ आंदोलन ने हाईकोर्ट की शरण ली. बांध में पानी पूरा न भरने के लिए याचिका लगाई गई. विस्थापितों की बात सरकार ने नहीं, अदालत ने सुनी. चीफ जस्टिस रवींद्रन ने कहा कि सरकार को यह हक ही नहीं था कि वह इन गांवों के लोगों को जाने के लिए कहें. पूरे इलाके में ऐसी अनगिनत उलझनें थीं, जिनमें हजारों लोग फंसे हुए थे. हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में लंबित तीन याचिकाएं नर्मदा बचाओ आंदोलन की टीम को विस्थापन के दस साल बाद भी व्यस्त बनाए रहीं. जो कुछ भी ठीक हुआ वह आलोक अग्रवाल, शिल्वी, चितरूपा जैसे कार्यकर्ताओं के संघर्ष का नतीजा है, जिन्हें मध्य प्रदेश के व्यापमं ब्रांड सरकारी तंत्र ने हमेशा हतोत्साहित किया.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्होंने हरसूद विस्थापन का कवरेज करते हुए इसे करीब से देखा और इसे अपनी किताब ‘हरसूद 30 जून’ में संकलित किया है)

[/box]

[ilink url=”http://tehelkahindi.com/continued-part-of-narmada-bachao/” style=”tick”]आगे पढ़ें [/ilink]

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here