2003 में नीतीश कुमार इन्हीं नरेंद्र मोदी की तारीफ कर रहे थे

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बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी. फोटो:विकास कुमार
बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी. फोटो:विकास कुमार

भाजपा के साथ रहने से नीतीश कुमार को काफी मजबूती मिल रही थी. अब साथ छूटने के बाद आप सरकार के कामकाज पर किस तरह का दुष्प्रभाव देख रहे हैं?
निश्चित तौर पर गठबंधन टूटने से सरकार के कामकाज पर नकारात्मक असर पड़ेगा. प्रशासनिक स्तर पर इसका सबसे अधिक असर दिखेगा. हमने सरकार के कामकाज में कभी कोई अड़चन नहीं पैदा की बल्कि इसे सुचारू बनाए रखने में मदद की थी. लेकिन अब यह सरकार कमजोर हो गई है. यहां फिर से जोड़-तोड़ की राजनीति शुरू हो गई है. ऐसे में सरकार को निश्चित ही समझौते करने पड़ेंगे.

जदयू-भाजपा की सरकार ने बिहार में विकास की राजनीति को एक नई परिभाषा दी थी. विकास पर इस टूट का क्या असर होगा?
इस गठबंधन का टूटना बिहार के लिए अहितकर है. बिहार में विकास का जो माहौल बना था, वह कहीं न कहीं प्रभावित होगा. दूसरे कार्यकाल के बारे में वैसे ही लोगों में यह धारणा बन रही है कि इस बार कम काम हो रहा है. बड़ी मुश्किल से हम लोगों ने मिलकर बिहार में निवेश को लेकर एक सकारात्मक माहौल बनाने की कोशिश की थी. जिसका नतीजा धीरे-धीरे दिखने लगा था. बाहर की कंपनियां बिहार में निवेश करने लगी थीं और कई बड़ी कंपनियों ने दिलचस्पी दिखाई थी. लेकिन इस राजनीतिक अस्थिरता के माहौल से निवेश पर भी बुरा असर पड़ेगा. क्योंकि निवेशक वहीं निवेश करते हैं जहां राजनीतिक स्थिरता का माहौल होता है.

आगामी चुनावों को लेकर आपका अनुभव क्या कहता है?
इस बात से नीतीश कुमार भी सहमति व्यक्त करेंगे कि कांग्रेस के प्रति लोगों में जबरदस्त गुस्सा है और जनता चाहती है कि कांग्रेस केंद्र की सत्ता से बेदखल हो. नरेंद्र मोदी के तौर पर भाजपा एक बेहतर विकल्प देश की जनता के सामने रख रही है. वे आज देश के सबसे लोकप्रिय राजनीतिक चेहरे हैं. इसका फायदा भाजपा को देश भर में मिलेगा और बिहार में भी हम उम्मीद कर रहे हैं कि लोकसभा चुनावों में हमारी सीटों की संख्या में बढ़ोतरी होगी.

गठबंधन की टूट को भाजपा विश्वासघात करार दे रही है और जदयू गठबंधन धर्म की याद दिला रही है. आखिर गलती किससे हुई है?
जिन नरेंद्र मोदी को लेकर नीतीश जी को इतनी आपत्ति है, 2003 में तो वे उनकी तारीफ कर रहे थे. नरेंद्र मोदी को भाजपा ने प्रधानमंत्री का उम्मीदवार तो घोषित नहीं किया था, उन्हें तो सिर्फ चुनाव अभियान समिति का प्रमुख बनाया गया था. इसलिए इस मामले को इतना तूल देना वाजिब नहीं था. गठबंधन धर्म की बात वे करते हैं लेकिन इसी गठबंधन धर्म का तकाजा यह है कि सहयोगियों के आंतरिक मामलों में दखल नहीं दिया जाए. वे तो भाजपा के ऊपर अपनी शर्तें थोप रहे थे. पार्टी के सबसे लोकप्रिय चेहरे के प्रति उनकी आपत्ति का मतलब तो यह हुआ कि वे नहीं चाहते कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरे. मुझे ऐसा लगता है कि नीतीश जी के मन में कहीं न कहीं प्रधानमंत्री बनने की इच्छा है.

बिहार को तथाकथित जंगल राज से मुक्त कराने का जनादेश मांगने के लिए नीतीश-सुशील की जोड़ी एक साथ जनता के बीच गई थी. अब यह जोड़ी जनता के बीच एक-दूसरे के खिलाफ दिखेगी. क्या यह लोगों को थोड़ा अटपटा नहीं लगेगा?
आप ठीक कह रहे हैं. एक टीम के तौर पर हमने बिहार को आगे ले जाने का सपना देखा था और हम उस पर काम कर रहे थे. इस सफर को बीच में छोड़ने का दुख न सिर्फ हमें है बल्कि बिहार की जनता और बिहार से बाहर रहने वाले प्रदेश के लोग भी इससे दुखी हैं. अब हम रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाएंगे. आने वाले दिनों में हमारी कोशिश यह होगी कि प्रदेश में भाजपा को एक विकल्प के तौर पर पेश करें.

विश्वासमत के दौरान भाजपा के वॉकआउट का क्या मतलब है? कुछ लोग यह कह रहे हैं कि भाजपा के कुछ विधायक सदन में मौजूद नहीं थे इसलिए भाजपा ने अपने आंतरिक मतभेद को छिपाने के लिए वॉकआउट का सहारा लिया.
नहीं, ऐसा नहीं है. भाजपा पूरी तरह से एकजुट है. हमने कभी भी नीतीश जी के बहुमत को चुनौती नहीं दी. हमने वॉकआउट इसलिए किया कि जनादेश साझा था. हम कोई भी ऐसा काम नहीं करना चाहते जिससे यह सरकार अस्थिर हो. हां, अगर सरकार खुद गिरती है तो उसमें हम कुछ नहीं कर सकते. हम कोई भी ऐसा काम नहीं करेंगे जिससे बिहार की जनता पर मध्यावधि चुनाव का बोझ पड़े.

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