10 साल की दास्तान

जदीद दास्तानगोई के सफर में एक अहम पड़ाव रिवायती दास्तानों से हटकर समकालीन विषयों पर दास्तानें तैयार करना और सुनाना था. इससे दास्तानगोई अपने दौर में हस्तक्षेप का भी एक अहम जरिया बनती दिखाई दी. इस तरह की दास्तानों में सआदत हसन मंटो पर आधारित दास्तान मंटोइयत, बिनायक सेन की अलोकतांत्रिक गिरफ्तारी पर आधारित, दास्तान-ए-सेडीशन, मुल्क के बंटवारे पर आधारित दास्तान-ए-तकसीम-ए-हिन्द, विजयदान देथा की कहानी पर आधारित दास्तान, चौबोली, एलिस इन वंडरलैंड पर आधारित दास्तान बेहद कामयाब रहीं. महमूद की ही प्रेरणा से उनके सबसे होनहार शागिर्दों में से एक अंकित चड्ढा ने भी कई नई और एकदम अनूठी दास्तानें लिखीं जिन्हें खूब सराहा गया. इन दास्तानों में अमीर खुसरो की दास्तान, कबीर की दास्तान, मोबाइल फोन की दास्तान, कॉरपोरेट जगत की दास्तान और उर्दू शायर मजाज लखनवी की दास्तान प्रमुख हैं.

अंकित कहते हैं, ‘नए विषयों पर दास्तानें लिखना मेरे लिए दास्तानगोई के फॉर्म को समझने और सीखने की एक प्रक्रिया थी. साथ ही नई दास्तानों को सुनने के बाद लोगों ने खुद आकर मुझसे कहा है कि क्या आप फलां-फलां विषय पर दास्तान लिख सकते हैं. तो इन दास्तानों को लिखना फॉर्म के विकास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव था.’

जदीद दास्तानगोई के दस साल पूरे करने के सिलसिले में हमें ये समझना जरूरी है कि यह काफी अर्सा पहले मर चुकी एक कला के दोबारा नए सिरे से जिंदा होने की परिघटना है. इसलिए पिछले दस सालों में कला और संस्कृति की दुनिया में दास्तानगोई ने एक बिल्कुल नया अध्याय जोड़ा है. साथ ही इस कला ने लोगों को फिर से वाचिक परंपरा यानी ओरल ट्रेडिशन के नजदीक ले जाने का काम किया है. देश के तमाम छोटे-बड़े शहरों में लोगों को जबान और बयान की ताकत समझाई है. दास्तानगोई ने खास-ओ-आम के भेद को मिटाते हुए हिंदुस्तान का परिचय फिर से कहानियों की उस अनमोल विरासत से कराया है जो बदलते वक्त के साथ बिसरा दी गई थीं. अंग्रेजी की आंधीवाले इस दौर में दास्तानगोई ने अवाम को उर्दू की अजमत और हुस्न का एहसास करवाया है. इस सिलसिले में महमूद फारूकी कहते हैं, ‘पिछले दस सालों में अगर दास्तानगोई को अविश्वसनीय सफलता मिली तो इसलिए क्योंकि पूरे हिंदुस्तान में हर छोटी-बड़ी जगह उर्दू के चाहनेवाले फैले हुए हैं. ये दास्तानें अगर हम उर्दू के अलावा किसी और जबान में सुनाते तो हमें कुछ खास हिस्सों में तो कामयाबी मिलती मगर पूरे हिंदुस्तान में इस तरह की कामयाबी न मिलती. इस कामयाबी की एक और वजह है- इस मुल्क का कहानियों से प्यार. ये मुल्क कहानियों से मोहब्बत करना और उनको अपना बनाना जानता है. अगर ऐसा न होता तो हातिमताई या अलिफ लैला या लैला मजनूं या मुल्ला नसीरूद्दीन की कहानियों पर यहां फिल्में और सीरियल क्यों बनते. इन कहानियों का भला हिंदुस्तान से क्या ताल्लुक. दरअसल कहानियां सुनना सुनाना, कहानियों में बात कहना इस देश की परंपरा में है.’

आधुनिक दास्तानगोई के दस साल मुकम्मल होना निश्चित तौर पर महमूद फारूकी और उनकी टीम के लिए बड़ी कामयाबी है, और इस कामयाबी का जश्न 2015 में पूरे साल अलग-अलग आयोजनों द्वारा मनाया जाएगा. 4-5 अप्रैल को दिल्ली में हुई राजा विक्रम की दास्तान इसी सिलसिले का पहला आयोजन थी. इसके साथ ही आगे के दस सालों के लिए भी महमूद के सामने कई लक्ष्य हैं. वे अगले दस सालों में हिंदुस्तान के हर बड़े शहर में कम से कम दो दास्तानगो तैयार कर देना चाहते हैं. इसके साथ ही महमूद चाहते हैं कि वे इस विशाल देश में जगह जगह छिपे कहानियों के खजाने को लोगों के सामने लाएं, और उनके जरिए से लोगों को अपनी तारीख, अपनी तहजीब, अपनी रिवायत से परिचित करवाएं जिसे लोगों ने अंग्रेजों और अंग्रेजियत के प्रभाव में आकर न जाने कब भुला दिया था.

तवील होने लगी हैं इसलिए रातें

कि लोग सुनते-सुनाते नहीं कहानी भी

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