सीएए : विधेयक-विरोध, हिंसा-प्रतिहिंसा

नागरिकता संशोधन विधेयक यानी कैब अब कानून बन चुका है। लेकिन इसके बाद जैसे ही केन्द्र सरकार ने जैसे ही असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स ऑफ इंडिया यानी एनआरसी के अनुरूप काम कराना शुरू किया, असम के साथ-साथ पूरे देश में इसका विरोध शुरू हो गया। असम में एनआरसी के अनुरूप नागरिकता प्रमाण-पत्रों के जमा कराने को लेकर जहाँ बाहरी लोगों में उबाल है, वहीं सीएए के लागू होने से असम के लोगों में भी गुस्सा है।

असम के लोगों का कहना है कि यदि सीएए के अनुसार काम होगा, तो बाहरी लोगों का असम पर कब्ज़ा हो जाएगा। बता दें कि सीएए लागू करने के बाद इसी शीत सत्र में कुछ दिन पहले गृहमंत्री अमित शाह ने राज्य सभा में कहा था कि जल्द ही पूरे देश में एनआरसी लागू किया जाएगा। उस समय उनकी बात को कुछ ही लोगों ने गम्भीरता से लिया, जिसमें आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह भी शामिल थे। लेकिन अब जब लोक सभा के बाद राज्य सभा में भी सीएए विधेयक पारित हो गया, पूरे देश में इसका विरोध शुरू हो चुका है। हालाँकि सीएए के बारे में बहुत से लोगों को ठीक से जानकारी ही नहीं है। सीएए को कई राज्यों में लागू कर दिया गया है। वहीं इसके प्रत्युत्तर में जनता ने विरोध-मार्च निकालने शुरू कर दिये हैं। लेकिन अब ये विरोध-मार्च हिंसा और हिंसा से प्रतिहिंसा में तब्दील होने लगे हैं। कुछ लोग पुलिस पर हिंसा का आरोप लगा रहे हैं, तो कुछ लोग प्रदर्शनकारियों पर। लेकिन इसके पीछे के कारण क्या हैं? पहले यह जानना भी बहुत ज़रूरी है। दरअसल, यह समझने-समझाने में कहीं कुछ लोचा है कि सीएए और एनआरसी विधेयक हैं क्या? क्योंकि अगर यह समझ में आ जाता, तो न तो सरकार को इसे बिना किसी बेहतर तैयारी के इसे अचानक लागू करना पड़ता और न ही लोग असंतुष्ट होकर विरोध-मार्च निकालते। तो पहले तो यही जानना ज़रूरी है कि सीएए क्या है? और एनआरसी क्या है?

क्या है सीएए?

नागरिकता संशोधन विधेयक यानी सिटीजनशिप अमेनमेंट बिल यानी सीएए का मतलब है कि देश में रह रहे अफगानी, पाकिस्तानी, बांग्लादेशी से 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले आये हिन्दू, बौद्ध, सिख, जैन, पारसी और ईसाई धर्मों के अवैध प्रवासियों के लिए 11 साल वाली शर्त 5 साल कर दी गयी है। सीएए-2019 सिटीजनशिप एक्ट-1955 का संशोधित रूप है। इस कानून के तहत इन छ: धर्मों के उन प्रवासियों को अवैध माना जाएगा, जो बिना किसी प्रामाणिक पहचान दस्तावेज़ के भारत में आये हैं। जबकि प्रामाणिक पहचान दस्तावेज़ के साथ आये लोगों की पहचान कर भारत में पैदा हुए लोगों को नागरिकता प्रदान की जाएगी। सीएए नागरिकता अधिनियम-1955 यानी सिटीजनशिप एक्ट-1955 में भारत के विदेशी नागरिक यानी ओवरसीज सिटीजन्स ऑफ इंडिया (ओसीआई) का रजिस्ट्रेशन रद्द करने मौज़ूद प्रावधानों में एक नया प्रावधान जोडऩे की बात करता है, जिसके अंतर्गत ऐसे लोग अपना रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं, जिनका जन्म भारत में हुआ है अथवा जिनके पति/पत्नी भारतीय मूल के हैं। ऐसे लोगों को भारत में घूमने, रहने, शिक्षा और काम करने की अनुमति होगी। इस बिल के पास होने से कुछ लोग काफी भयभीत और उलझन में और परेशान हैं। दरअसल, विधेयक लाने के दौरान गृहमंत्री ने कहा था कि नागरिकता संशोधन बिल न तो अनुच्छेद-14 का उल्लंघन करता है और न ही यह किसी भी तरह से गैर-संवैधानिक है। उन्होंने यह भी कहा कि सरकार मुसलमानों की विरोधी नहीं है। यहाँ बता देना ज़रूरी है कि इस बिल के बाद यह बात फैल रही है कि सरकार ने सीएए में मुसलमानों को शामिल नहीं किया यानी सरकार मुसलमानों को देश से बाहर या बाहरी यानी विदेशी बना देना चाहती है। हालाँकि, यह पूर्णत: सत्य नहीं है। क्योंकि जिन मुसलमानों को पास भारतीय दस्तावेज़ हैं, वे बाहरी नहीं माने जाएँगे। जैसा कि ऊपर बताया जा चुका है कि यह विधेयक 31 दिसंबर, 2014 से पहले आये छ: धर्मों के लोगों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना चाहती है। लेकिन उसकी भी शर्तें हैं। परन्तु इस तारीख के बाद आये किसी भी धर्म के लोगों को भारतीय नागरिकता का इस विधेयक में कोई प्रावधान नहीं है। हालाँकि पाँच साल की भारतीय प्रामाणिकता का भी प्रावधान रखा गया है।

किसे आसानी से मिल जाएगी भारतीय नागरिकता?

सीएए के तहत अफगानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान से गैर-मुस्लिम शरणर्थियों यानी हिन्दू, सिख, पारसी, ईसाई, बौद्ध और जैन धर्म के लोगों को भारत की नागरिकता मिलनी आसान हो जाएगी। इसके लिए उन्हें भारत में कम से कम छ: साल बिताने होंगे। इससे पहले 11 साल भारत में बिताने पर भारतीय नागरिकता के पात्र होने का प्रावधान था। भारतीय नागरिकता के लिए इन लोगों को भारत में पैदा होने या पति/पत्नी के भारतीय होने और खुद के छ: साल से अधिक समय भारत में रहने के दस्तावेज़ पेश करने होंगे। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से आये मुसलमानों के लिए भारतीय नागरिकता की छूट नहीं है।

एनआरसी क्या है?

राष्ट्रीय नागरिक रजिस्ट्रार यानी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स ऑफ इंडिया यानी एनआरसी अभी लागू नहीं हुआ है। हालाँकि असम में एनआरसी रजिस्टर के हिसाब से लोगों की नागरिकता तय भी हुई है। मगर यह पूरे देश में लागू नहीं है। दरअसल, सीएए लागू होने के बाद एनआरसी रजिस्टर के हिसाब से ही लोगों की पहचान की जानी है। लेकिन सरकार भी समझ रही है कि अगर पूरे देश में एनआरसी को लागू कर दिया गया, तो हालात बेकाबू हो जाएँगे। इसीलिए एनआरसी का •िाक्र करने के बाद एनआरसी से पहले सीएए को लागू किया गया। यहाँ यह भी जान लेना ज़रूरी है कि लोगों को न तो सीएए के बारे में ठीक से जानकारी है और न ही एनआरसी के बारे में, जिससे  उनकी नागरिकता के प्रमाण देने में उन्हें परेशानी तो हो ही रही है, साथ ही उन्हें कुछ अन्धी कमाई करने वालों के ज़रिये डराया भी जा रहा है। यही वजह है कि सीएए के लागू होने बाद अधिकतर लोगों ने सीएए को ही एनआरसी मान लिया है और सरकार तथा एनआरसी के िखलाफ देश भर में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो चुके हैं। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि इस शीत सत्र में सीएए लागू करने से पहले अमित शाह ने कहा था कि अवैध लोगों की पहचान के लिए पूरे देश में एनआरसी लागू होगा और इसमें सभी धर्मों और सम्प्रदायों के लोगों को शामिल किया जाएगा।

इसके साथ ही होंगे, जिससे अधिकतर लोगों को परेशानियाँ हो सकती हैं। इसके साथ ही असम में सीएए लागू करने के बाद एनआरसी के अनुसार दस्तावेज़ माँगे जा रहे हैं। असम में इस विधेयक के लागू होने से 19 लाख लोग भारतीय नागरिकता से बाहर हो गये। इसका वहाँ भरपूर विरोध भी हुआ, जो अभी तक जारी है। इस बात का भी पूरे देश पर असर पड़ा है और विरोध शुरू हो गया। बता दें कि अगर देश भर में एनआरसी लागू हो गया, तो एनआरसी के हिसाब से वे लोग भारतीय नागरिकता से बाहर कर दिये जाएँगे, जो 25 मार्च, 1971 से बाद के भारत से बाहर और भारत के किसी राज्य के नागरिक हैं, जो दूसरे राज्य में बस गये हैं और उनके पास छोड़े हुए राज्य का कोई प्रमाण नहीं होगा। ऐसे में नागरिकों को वे प्रमाण पेश करने होंने, जिससे यह साबित हो कि उनके बुजुर्ग 25 मार्च, 1971 या उससे पहले से ही भारतीय मूल के नागरिक थे। हालाँकि एनआरसी लागू करना इतना आसान नहीं है।

एनआरसी पर उठते सवाल?

सीएए के लागू होते ही एनआरसी के मामले में सरकार का विरोध पूरे देश में शुरू हो चुका है। असम के बाद त्रिपुरा, बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत अनेक राज्यों में लोग इसका विरोध कर रहे हैं। ऐसे क्या कारण हैं, जिनके चलते लोग इस विधेयक का ज़बरदस्त विरोध कर रहे हैं? यह जानने से पहले कई अनसुलझे सवालों पर नज़र डालनी होगी। पहला सवाल यह कि ग्रामीण क्षेत्रों में रह रहे लोग, खासतौर से वे लोग जिनके पास कोई ज़मीन नहीं है; कहाँ से 25 मार्च, 1971 से पहले के प्रमाण लाएँगे? क्योंकि ग्रामीण इलाकों में घरों के कोई दस्तावेज़ नहीं होते। क्या इन दस्तावेज़ों को बनवाने के लिए उन लोगों से ठगी नहीं की जाएगी? क्या फर्ज़ी दस्तावेज़ बनवाने का काम शुरू नहीं हो जाएगा? क्या लालफीताशाही और अधिकृत अफसर अवैध काम नहीं करेंगे? क्या इससे घुमक्कड़ जातियों के लोग, जिनके पास न कोई ज़मीन है, न कोई घर, न कोई प्रमाणित दस्तावेज़, इस कानून से गैर-भारतीय नहीं मान लिए जाएँगे? इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में भी बहुत से ऐसे लोग हैं, जिनके पास कोई ज़मीन  नहीं है; न ही उन्हें अपने खानदान की ठीक से जानकारी है। ऐसे में अगर उनके पास कोई टूटा-फूटा घर है, तो उसके कगज़ नहीं हैं। इसका एक कारण यह है कि गाँवों में बने घरों की रजिस्ट्री आज भी नहीं होती है, पुराने बसे हुए गाँवों में लोग कई पीढिय़ों से रहते आ रहे हैं। साथ ही कुछ लोग इतने गरीब हैं कि वे अपने कागज़ बनवाने के लिए सौ रुपये खर्च करने तक की हैसियत नहीं रखते। ऐसे में वे लोग 25 मार्च, 1971 और उससे पहले के प्रमाण कैसे दे पाएँगे? ग्रामीण तो दूर शहर में रहने वालों में भी अधिकतर 20-25 साल पहले जन्में लोगों के पास बहुत से दस्तावेज़ नहीं होते, जैसे- जन्म प्रमाण-पत्र, मूल निवास प्रमाण-पत्र, को क्या वे भारतीय नहीं माने जाएँगे? वे लोग जो अपने गाँव छोडक़र शहरों या दूसरे राज्यों में सन् 1971 के बाद आकर बस गये और उनकी गाँवों में कोई भी प्रामाणिक पहचान या वहाँ के दस्तावेज़ नहीं हैं; क्या वे लोग अपने ही देश में विदेशी घोषित कर दिये जाएँगे? क्या हर व्यक्ति को उस राज्य का माना जाएगा, जहाँ का मूल रूप से उसका परिवार रहने वाला है? उन लोगों के लिए कौन-सा विकल्प दिया जाएगा, जिनके माँ-बाप या दादा-दादी दो राज्यों के रहे हैं? जिनके परिवार आज भी दो राज्यों या उससे अधिक जगहों पर रह रहे हैं और उनकी 1971 से पहले की मूल पहचान नष्ट हो चुकी है, क्या उन्हें विदेशी घोषित कर दिया जाएगा?

सरकार को पहले खँगालने थे रिकॉर्ड, फिर करानी थी जनगणना

अगर एक्सपर्ट या बुद्धिजीवीयों की मानें, तो सरकार को सीएए जैसा विधेयक पारित करने से पहले प्रामाणिक दस्तावेज़, जैसे- भू-प्रमाण, नागरिकता-दस्तावेज़ और अन्य तरह के भारतीय दस्तावेज़ खंगालने चाहिए थे और उसी के आधार पर जनगणना कराकर यह पता लगाना चाहिए था कि कितने लोग भारतीय मूल के हैं और कितने लोग विदेशी हैं? साथ ही यह भी पता लगाना चाहिए था कि कितने भारतीय ऐसे हैं, जिनके पास भारतीय मूल के ठोस या पूरे प्रमाण नहीं हैं? इससे यह होता कि जो लोग डरे हुए हैं, वे डरते नहीं और न ही विरोध-प्रदर्शन होते। साथ ही एनआरसी का हौवा लोगों को नहीं दिखाना चाहिए था।

आखिर क्यों होने लगी हिंसा?

सवाल यह है कि आिखर पूरे देश में इसके विरोध में प्रदर्शन होते-होते हिंसा क्यों होने लगी? इसका सीधा-सा उत्तर है कि पुलिस को विरोध-प्रदर्शन पर उतरे लोगों पर लाठीचार्ज नहीं करनी चाहिए थी। पुलिस द्वारा की गयी इस हिंसा के फलस्वरूप प्रदर्शन कर रहे लोगों की तरफ से प्रतिहिंसा शुरू हो गयी और असम के बाद बिहार और दिल्ली में पुलिस तथा प्रदर्शनकारियों में हिंसक झड़पें तथा आगजनी की घटनाएँ हुई हैं। बेहतर होता, अगर सरकार लोगों के विरोध-प्रदर्शन पर उन्हें सीएए और एनआरसी पर जानकारी देती और लोगों में बैठे इन विधेयकों के डर और संदेह को दूर करती। लेकिन जैसे ही लोगों ने विरोध-प्रदर्शन शुरू किये, उन पर पुलिस ने लाठियाँ भाँजनी शुरू कर दीं, जिसकी प्रतिक्रिया हिंसक झड़पों और आगजनी के रूप में सामने आने लगी।

एनडीए में भी हो रहा है विधेयक का विरोध

भले ही दबी ज़ुबान से ही सही, लेकिन एनडीए की केन्द्र सरकार में ही सीएए का विरोध हो रहा है। वहीं जब यह विधेयक पास होने का प्रस्ताव रखा गया था, तब पूर्वोत्तर में भारतीय जनता पार्टी की साथी असम गण परिषद् ने विधेयकों का खुले तौर पर विरोध किया था। असम गण परिषद् का कहना था कि विधेयक लाने से पहले सरकार ने सहयोगी दलों से बात नहीं की; जबकि उसने इस पर सहयोगी दलों से बात करने का वादा किया गया था।

क्या भाजपा को होगा फायदा?

विरोधी दल कह रहे हैं कि सीएए और एनआरसी लागू करके भाजपा अपने राजनीतिक हित साधने और तानाशाही तरीके से हमेशा के लिए भारत पर शासन करने की योजना बना चुकी है। सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में भाजपा को इससे लाभ होगा? बता दें कि देश में लोक सभा चुनाव से पहले और असम तथा बंगाल आदि राज्यों में भाजपा ने घुसपैठियों का मुद्दा उठाया था। और एनआरसी को लागू कर विदेशी घुसपैठियों को देश से बाहर करने की बात कही थी। जिसका पार्टी को जनाधार का फायदा भी मिला। अब जब पश्चिम बंगाल, दिल्ली जैसे राज्यों में चुनाव आने वाले हैं, भाजपा सीएए और एनआरसी लागू कर रही है। ऐसे में विपक्षी और विरोधी दल इसे भाजपा और एनडीए सरकार के राजनीतिक फायदे से जोडक़र देख रहे हैं।

अगर सीएए और एनआरसी विधेयक लागू होते हैं, तो दो कैटेगरी के अनुरूप अपने दस्तावेज़ नागरिकों को प्रमाण के तौर पर पेश करने होंने। जैसा कि असम में इन दस्तावेज़ों की माँग की गयी थी और इन दस्तावेज़ों में कमी के चलते तकरीबन 19 लाख लोग शरणार्थी मान लिये गये। इन कैटेगरी में ‘ए’ और ‘बी’ सूची बनायी गयी है। आइये जानते हैं, कौन-सी सूची में किस तरह के दस्तावेज़ दिखाने होंगे?

सूची ‘ए’ के तहत माँगे गये दस्तावेज़

आवश्यक : इस सूची में माँगे गये प्रमाण-पत्रों में कोई भी 24 मार्च, 1971 से पूर्व का नहीं होना चाहिए। लेकिन अगर किसी राज्य में बसे व्यक्ति के पास कोई प्रमाण 24 मार्च, 1971 से पहले का नहीं है, तो वह अन्य राज्य में बसे अपने खानदान के बुजुर्गों के प्रमाण दिखा सकता है।

1951 का एनआरसी प्रमाण

परिवार या कुल का 24 मार्च, 1971 तक का मतदाता सूची में नाम

जमीन के मालिकाना हक के दस्तावेज़ अथवा किरायेदार होने का प्रमाण

भारतीय नागरिकता के प्रमाण-पत्र

मूल-निवास प्रमाण-पत्र

अगर विदेशी हैं, तो शरणार्थी पंजीकरण प्रमाण-पत्र

किसी भी सरकारी प्राधिकरण द्वारा जारी प्रमाण-पत्र/कोई लाइसेंस आदि

सरकार अथवा सरकारी उपक्रम के तहत नियुक्ति प्रमाण-पत्र

बैंक या पोस्ट ऑफिस में खाता

जन्म प्रमाण-पत्र

विद्यालय, महाविद्याल या विश्वविद्यालय से शैक्षणिक प्रमाण-पत्र

अदालत के आदेश-पमाण

पासपोर्ट

एलआईसी पॉलिसी

सूची ‘बी’ में माँगे गये ज़रूरी दस्तावेज़

इस सूची में दिये गये दस्तावेज़ दिखाकर नागरिक को अपने दादा-दादी/माता-पिता से उनका कोई दस्तावेज़ दिखाकर सम्बन्ध साबित करना होगा। यानी नागरिक के दस्तावेज़ में उसके दादा-दादी/माता-पिता आदि का नाम शामिल होना चाहिए।

जन्म प्रमाण-पत्र

ज़मीन के दस्तावेज़

किसी विद्यालय, महाविद्यालय अथवा विश्वविद्यालय के शैक्षणिक प्रमाण-पत्र

बैंक या पोस्ट ऑफिस या बीमा पॉलिसी के दस्तावेज़

राशन कार्ड

मतदाता सूची में नाम

कानूनी रूप से स्वीकार्य अन्य दस्तावेज़

विवाहित महिलाओं के केस में सर्कल अधिकारी या ग्राम पंचायत सचिव द्वारा दिया गया प्रमाण-पत्र