निराशा के बीच आशा

कोरोना महामारी के चलते हुई तालाबंदी से जर्जर होती
अर्थ-व्यवस्था को कृषि एवं सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र से उम्मीदें

वित्त वर्ष 2020-21 ऐसा रहा, जिसने पूरी दुनिया को प्रभावित किया और बहुत कुछ बदल गया। कोविड-19 की दूसरी लहर ने भारत को झकझोर दिया है और अप्रैल-मई, 2021 के हालात अर्थ-व्यवस्था के लिए झटके वाले संकेत देते हैं। इस दौरान तरक़ी्क़ी की राह पर ब्रेक, विवेकाधीन ख़र्च, बेरोज़गारी का बढऩा और निवेश में भारी कमी का रुझान देखा गया। हालाँकि इसी बीच बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान और कृषि व सूचना प्रौद्योगिकी यानी आईटी क्षेत्र का बेहतर प्रदर्शन निराशा में एक आशा की उम्मीद जगाता है। इन्हीं तथ्यों पर आधारित भारत हितैषी की रिपोर्ट :-

कोरोना वायरस के नये वैरिएंट के संक्रमणों का प्रभाव ‘यू’ आकार का प्रतीत होता है। यू आकार से मतलब यह है कि वे सभी प्रभावित हैं सिवाय कृषि और आईटी सेक्टर के। यू की ढलान पर एक तरफ़ संगठित और स्वचालित निर्माण होते हैं और दूसरी तरफ़ ऐसी सेवाएँ, जिन्हें दूरस्थ रूप से वितरित कर सकते हैं। इनमें उत्पादकों व उपभोक्ताओं को स्थानांतरित करने की ज़रूरत नहीं होती है। ये गतिविधियाँ महामारी प्रोटोकॉल के तहत जारी रखी जाती हैं। सबसे कमज़ोर ब्लू कॉलर समूह होता है, जिन्हें जीवित रहने के लिए और शेष समाज के लिए जोखिम उठाना पड़ता है; जैसे कि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी। नगरपालिका कर्मियों, दैनिक आजीविका चलाने वाले व्यक्ति, छोटे व्यवसाय, संगठित और असंगठित क्षेत्र को नीतियों में प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।

रिजर्व बैंक की राहत
अर्थ-व्यवस्था को राहत देने के लिए रिजर्व बैंक ने फिर से अहम क़ीदम उठाया है। आरबीआई ने 21 मई को घोषणा की कि वह वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए भारत सरकार को 99,122 करोड़ रुपये का अधिशेष हस्तांतरित करेगा। यह लाभांश 01 जुलाई, 2020 से 31 मार्च, 2021 तक नौ महीने की अवधि के लिए होगा। घोषित लाभांश पहले से घोषित 73.5 फ़ीसदी अधिक है। वित्तीय वर्ष 2020 के लिए 57,128 करोड़ हस्तांतरित किये गये थे। भारत सरकार ने आरबीआई से कुल लाभांश के रूप में 53,511 करोड़ रुपये की कमायी का बजट रखा था। यह 2022 के लिए बजट की गयी राशि का क़ीरीब दोगुना है। बढ़े हुए भुगतान से भारत सरकार को अपने बजटीय दायित्वों को पूरा करने और अर्थ-व्यवस्था के पुनरुद्धार में मदद मिलेगी।
लाभांश एक राहत के रूप में होता है, क्योंकि माँग के झटके से अप्रत्यक्ष कर लक्ष्यों पर दबाव बढ़ जाता है। बढ़े हुए लाभांश से सरकार को महामारी की दूसरी लहर से उपजी स्वास्थ्य देखभाल पर ख़र्च में अप्रत्याशित वृद्धि को पूरा करने में भी मदद मिल सकेगी।

रिजर्व बैंक की चेतावनी
केंद्रीय बैंक ने 17 मई को जारी अपने मासिक बुलेटिन में बताया था कि कोविड-19 की दूसरी लहर का सबसे बड़ा झटका लोगों की माँग में कमी है। इससे नकारात्मकता के संकेत दिये हैं। मसलन-इनवेंटरी संचय के अलावा गतिशीलता, विवेकाधीन ख़र्च और बेरोज़गारी का बढ़ना।


बढ़ती बेरोज़गारी
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई) के नवीनतम आँकड़ों से पता चलता है कि 23 मई को समाप्त सप्ताह में बेरोज़गारी दर दोहरे अंकों में दर्ज की गयी। इससे पता चलता है कि घरेलू और राज्यवार लॉकडाउन (तालाबंदी) ने अर्थ-व्यवस्था और नौकरियों को नक़ीसान पहुँचाना शुरू कर दिया है। अखिल भारतीय साप्ताहिक बेरोज़गारी दर 23 मई तक सप्ताह में 14.7 फ़ीसदी तक पहुँच गयी, जो पिछले सप्ताह के 14.5 फ़ीसदी से मामूली ज़्यादा है। सीएमआईई के आँकड़ों के अनुसार, शहरी भारत में साप्ताहिक बेरोज़गारी दर 17.4 फ़ीसदी रही, जो 16 मई को 14.7 थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह 13.5 फ़ीसदी थी, जो अगले सप्ताह 14.3 फ़ीसदी दर्ज की गयी।
सीएमआईई के प्रबन्ध निदेशक और सीईओ महेश व्यास ने अपनी वेबसाइट पर लिखा, हाल के दिनों में देखी गयी दो अंकों की बेरोज़गारी दर इंगित करती है कि कोरोना के चलते लगायी गयीं पाबंदियाँ भी अर्थ-व्यवस्था पर भारी पड़ रही हैं। उन्होंने कहा कि अप्रैल 2021 की शुरुआत से शहरी बेरोज़गारी दर बढ़ रही है। 01 अप्रैल को 30 दिवसीय चलती औसत शहरी बेरोज़गारी दर 7.2 फ़ीसदी थी। 01 मई तक यह 9.6 फ़ीसदी और फिर 23 मई तक 12.7 फ़ीसदी पर पहुँच गयी। व्यास ने कहा कि ग्रामीण भारत में बेरोज़गारी का बढऩा हाल की घटना है।

कमायी में कमी
एक नई रिपोर्ट ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2021 : वन ईयर ऑफ कोविड -19’, जिसे हाल ही में अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय द्वारा जारी किया गया है, इसमें कहा गया है कि महामारी के कारण अधिकांश श्रमिकों की आय में भारी गिरावट आयी है। इसके परिणामस्वरूप ग़रीबी में अचानक वृद्धि दर्ज की गयी है। रिपोर्ट भारत में कोविड-19 के एक वर्ष के प्रभाव, नौकरियों, आय, असमानता और ग़रीबी पर दस्तावेज़ों का आकलन किया गया है। रिपोर्ट से पता चलता है कि महामारी ने अनौपचारिकता को और बढ़ा दिया है और अधिकांश श्रमिकों की कमायी में भारी गिरावट आयी है, जिसके परिणामस्वरूप ग़रीबी बढ़ी है। महिलाओं और युवा श्रमिकों को असमान रूप से प्रभावित किया है। परिवारों ने भोजन का सेवन कम करने, उधार लेने और सम्पत्ति बेचने जैसी चुनौतियों का सामना किया है। सरकारी राहत ने संकट के सबसे गम्भीर रूपों से बचने में मदद की है। लेकिन सबसे कमज़ोर कुछ श्रमिकों और परिवारों को छोडक़र सहायता उपायों की पहुँच अधूरी ही है।

रिपोर्ट के मुख्य रूप से यह निष्कर्ष है कि देशव्यापी अप्रैल-मई 2020 तालाबंदी के दौरान क़ीरीब 10 करोड़ लोगों ने नौकरियाँ गँवायीं। अधिकांश जून, 2020 तक काम पर वापस आ गये थे; लेकिन 2020 के अन्त तक भी क़ीरीब 1.5 कर्मचारियों को काम नहीं मिला। आमदनी भी कम ही रही। अक्टूबर, 2020 में प्रति व्यक्ति औसत मासिक घरेलू आय 4,979 रुपये रही, जो जनवरी, 2020 में 5,989 रुपये के स्तर पर थी। सबसे ज़्यादा कोरोना मरीज़ों वाले राज्यों में सबसे ज़्यादा नौकरियाँ गयीं। महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और दिल्ली ने नौकरी छूटने वालों की तादाद सबसे ज़्यादा रही।
तालाबंदी के दौरान और इसके बाद के महीनों में 61 फ़ीसदी कामकाजी पुरुष कार्यरत रहे और 7 फ़ीसदी ने रोज़गार गँवा दिया और काम पर नहीं लौटे। महिलाओं की बात करें, तो केवल 19 फ़ीसदी कार्यरत रहीं और 47 फ़ीसदी को तालाबंदी के दौरान स्थायी नौकरी से हाथ धोना पड़ा और 2020 के अन्त तक भी काम पर नहीं लौटीं। युवा श्रमिकों पर सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ा। अच्छी नौकरी के चक्कर वालों को भी कोई मौक़ीा नहीं मिल सका। 15-24 वर्ष आयु वर्ग के 33 फ़ीसदी श्रमिक दिसंबर, 2020 तक भी रोज़गार पाने में नाकामयाब रहे। 25-44 वर्ष समूह में यह संख्या केवल 6 फ़ीसदी थी।
हालाँकि आय में कमी हर जगह देखी गयी। महामारी ने ग़रीब परिवारों पर सबसे ज़्यादा असर डाला है। गत अप्रैल और मई में 20 फ़ीसदी सबसे ग़रीब परिवारों ने अपनी पूरी आय ही गँवा दी। इसके विपरीत, धनी परिवारों को अपनी पूर्व-महामारी आय के एक-चौथाई से भी कम का नक़ीसान हुआ। पूरे आठ महीने की अवधि (मार्च से अक्टूबर) में निचले तबक़ीे में से 10 फ़ीसदी में एक औसत परिवार को 15,700 रुपये या सि$र्फ दो महीने की आय का नक़ीसान हुआ।
परिवारों ने भोजन का सेवन कम कर दिया, सम्पत्ति बेच दी और दोस्तों, रिश्तेदारों और साहूकारों से अनौपचारिक रूप से क़ीर्ज़ लिया। अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी कोविड लाइवलीहुड फोन सर्वे में 90 फ़ीसदी हिस्सा लेने वालों ने बताया कि तालाबंदी के परिणामस्वरूप घरों में भोजन की मात्रा में कमी आयी है। इससे भी अधिक चिन्ता की बात यह है कि 20 फ़ीसदी ने बताया कि तालाबंदी के छ: महीने बाद भी भोजन की गुणवत्ता में सुधार नहीं हुआ है।
इसमें सुझाव दिया गया है कि संकट से मज़बूत होकर उबरने के लिए साहसिक उपायों की आवश्यकता होगी, लेकिन अभी तक भारत की कोविड-19 पर सरकारी मदद ख़ास नहीं रही है। रोकथाम के साथ-साथ कल्याण के मामले में महामारी का सामना करने के लिए राज्यों की वित्तीय हालत भी बहुत अच्छी नहीं है। इस प्रकार केंद्र सरकार के लिए अब अतिरिक्त ख़र्च करने के लिए मजबूर करने वाले कारण हैं। पीडीएस के तहत जून से मुफ़्त राशन का विस्तार कम-से-कम 2021 के अन्त तक करने का प्रस्ताव दिया है। तीन महीने के लिए 5,000 रुपये का नक़ीद हस्तांतरण कमज़ोर परिवारों को किया जाना चाहिए। खातों, मनरेगा पात्रता को 150 दिनों तक विस्तार और कार्यक्रम मज़दूरी को संशोधित करके राज्य न्यूनतम मज़दूरी को बढ़ा सकते हैं। मनरेगा के बजट को कम-से-कम 1.75 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाया जाना चाहिए। इसने सबसे अधिक प्रभावित •िालों में एक पायलट शहरी रोज़गार कार्यक्रम का भी सुझाव दिया है, जो सम्भवत: महिला श्रमिकों पर केंद्रित है।

टीकाकरण अभियान
3 जनवरी, 2021 को भारत ने औपचारिक रूप से दो टीकों के आपातकालीन उपयोग को मंज़ूरी दी और 16 जनवरी को, इसने दुनिया का सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू किया। इस वर्ष प्राथमिकता सूची में क़ीरीब 30 करोड़ लोगों को टीका लगाने की योजना है। संकट के समय इस पर वैश्विक समर्थन भी मिला है, जिसमें 40 से अधिक सरकारें भारत को आवश्यक चिकित्सा के साथ मदद करने को आगे आयी हैं। विश्व व्यापार संगठन के महानिदेशक गोजी ओकोंजोवियाला ने ट्वीट किया- ‘भारत ने नि:स्वार्थ रूप से अपने टीकों का 40 फ़ीसदी से अधिक निर्यात किया। भारत को इस पर समर्थन मिलने का समय आ गया है। अमेरिका ने वैक्सीन से सम्बन्धित कच्चे माल को टीकों के उत्पादन के लिए भारत भेजने का फ़ैसला किया है। अमेरिका की दो बड़ी फार्मास्युटिकल कम्पनियाँ गिलियड साइंसेज और मर्क ने स्वैच्छिक लाइसेंसिंग मार्ग के माध्यम से भारत में अपनी दवाओं तक पहुँच बढ़ाने के लिए क़ीदम उठाये हैं। रेमडेसिवीर बनाने वाली भारतीय कम्पनियों को समर्थन देने के साथ-साथ 450,000 शीशियाँ सहयोग के तौर पर पहुँचायी हैं। रूस ने 01 मई, 2021 से भारत को स्पुतनिक वी वैक्सीन का निर्यात शुरू किया, जिसे आपातकालीन मंज़ूरी भी दे दी गयी है। ऑक्सीजन सांद्रक, तरल ऑक्सीजन, क्रायोजेनिक ऑक्सीजन टैंक, ऑक्सीजन सिलेंडर, मोबाइल ऑक्सीजन उत्पादन संयंत्र और वेंटिलेटर समेत अन्य चिकित्सा उपकरणों के लिए कई अन्य देशों ने मदद की है। इनमें सिंगापुर से प्लेन और समुद्र के रास्ते से सहायता पहुँची हैं। इसके अलावा अमेरिका, यूके, फ्रांस, जर्मनी, संयुक्त अरब अमीरात, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सऊदी अरबय हांगकांग, और थाईलैंड ने भी मदद की है। एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने भारत में महामारी पर सहयोग करने के लिए 1.5 अरब अमेरिकी डॉलर राशि की मंज़ूरी दी है।

किससे है उम्मीद?
यह सच है कि नाउम्मीदी के बीच उम्मीद की किरणें हैं। मई की पहली छमाही के अन्त में सबसे घने शहर मुम्बई में कोरोना संक्रमण की दर सबसे ज़्यादा थी। दूसरी लहर में सबसे ज़्यादा प्रभावित रहने वाली मायानगरी में अप्रैल की शुरुआत में 26.6 फ़ीसदी संक्रमण दर थी, जो अब घटकर 7.9 फ़ीसदी हो गयी। मुम्बई में रोजाना नये मामले 7 अप्रैल को 10,000 के हाल के शिखर से घटकर अब क़ीरीब 2400 से कम हो गये हैं। स्वस्थ होने वाले मरीज़ों की तादाद भी दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। 12 अप्रैल को 90,000 के शिखर से गिरकर वर्तमान में क़ीरीब 40,000 है। भारत की दूसरी लहर ने पहले मुम्बई (और महाराष्ट्र) को प्रभावित किया, इसके बाद देश के अन्य राज्यों में भी इसका व्यापक असर देखने को मिला।

इस बीच सोने ने एक अभूतपूर्व चमक पायी, जिसने अगस्त में सर्राफा की क़ीमतों में 25.1 फ़ीसदी की वृद्धि दर्ज की। पिछले वर्ष में 18.3 फ़ीसदी की वृद्धि के साथ एक सर्वकालिक उच्च बढ़ोतरी देखी। सुरक्षित आश्रय की माँग और अभूतपूर्व हालात ने 2020 में सर्राफा को शीर्ष प्रदर्शन करने वाली सम्पत्ति बना दिया। 2021 में सोने की क़ीमतों में अब तक गिरावट दर्ज की गयी है। क्योंकि सुरक्षित पनाहगाह की माँग कम होने के साथ-साथ डॉलर की मज़बूती के कारण भी बिकवाली हुई है। हाल के महीनों में सोने के आयात में तेज़ी से वृद्धि हुई है। अप्रैल में मार्च में रिकॉर्ड सोने के आयात के शीर्ष पर मूल्य और मात्रा दोनों के सन्दर्भ में लगातार सातवें महीने तक जारी रहा। जेम्स एंड ज्वैलरी एक्सपोर्ट प्रमोशन काउंसिल (जीजेईपीसी) के अनुसार, प्रमुख निर्यात स्थलों में माँग की स्थिति में सुधार, त्योहारी सीजन के साथ पहले स्थगित शादियों की घरेलू माँग ने सोने और आभूषणों की माँग बढ़ा दी है। व्यापार और उपभोक्ता की स्थिति में सुधार, सीमा शुल्क में कमी के चलते अगस्त, 2020 में रिकॉर्ड शिखर से सोने की क़ीमतों में गिरावट 2020-21 में अमेरिकी डॉलर की तुलना में भारतीय रुपये की स्थिति ने भी सोने में खुदरा निवेश को आकर्षित किया है। सोने की चमक को देखते हुए चाँदी के लिए भी साल अच्छा रहा। बेस मेटल्स, जिसमें साल के शुरुआती महीनों में तेज़ गिरावट देखी गयी थी, 2021 में ज़ोरदार रिकवरी हुई।

अन्य देशों की तलुना करने से पता चलता है कि भारत अन्य अर्थ-व्यवस्थाओं की तुलना में आगे बढ़ रहा है। देश के छ: सबसे बड़े राज्यों – महाराष्ट्र, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, गुजरात और पश्चिम बंगाल में सार्वजनिक स्थलों पर 87 फ़ीसदी लोगों की मौज़ूदगी देखी गयी, जो महामारी (मिंट ट्रैकर) में अब तक का सबसे अच्छा स्तर है। समग्र माँग स्थितियों ने या तो हाल के लाभ को समेकित किया है या गति को मज़बूत करने के लिए बचत का इस्तेमाल किया गया है। बिजली की खपत में सालाना आधार पर 5.0 फ़ीसदी की वृद्धि हुई, जिसने लगातार चौथे महीने इसकी वृद्धि को बनाये रखा। मध्य प्रदेश (15 फ़ीसदी), राजस्थान (12 फ़ीसदी), बिहार (14 फ़ीसदी), पंजाब (12 फ़ीसदी) और उत्तर प्रदेश (10 फ़ीसदी) में बिजली की बढ़ी है। ला नीना और चक्रवाती तूफ़ानों के प्रभाव के चलते कई राज्यों में छिटपुट से लेकर तेज़ बारिश हुई। इससे ऊपरी भारत के अधिकांश हिस्सों में तापमान अधिक नहीं दर्ज किया गया और पिछले कई वर्षों के निचले स्तर पर आ गया है। उपभोक्ता विश्वास फिर से बहाल हो रहा है। डिजिटल और ओमनी-चैनल बिक्री के माध्यम से मूल्य वर्धित वस्तुओं और आवश्यक वस्तुओं के लिए बड़े बदलाव से पहले, ख़रीद व्यवहार से स्वास्थ्य और कल्याण उत्पादों के प्रति ऑनलाइन और ऑफलाइन वरीयता की उम्मीद बढ़ी है। बढ़ती माँग को पूरा करने के लिए सेवा वितरण बढ़ाने के लिए ई-कॉमर्स कम्पनियों और किराना स्टोर के बीच गठजोड़ का विस्तार होने की उम्मीद है। उत्साहित उपभोक्ता भी इसमें दिलचस्पी दिखा रहे हैं। आवासीय इकाइयों की बिक्री में 2021 में तेज़ उछाल के साथ हुआ, जो प्रॉपर्टी के क्षेत्र के लिए अच्छा संकेत हैं। पिछली तिमाही के स्तर से क़ीरीब दोगुना होने के पीछे की वजह अनुकूल ब्याज दरें, अभी भी संयमित आवास की क़ीमतें, डेवलपर्स निर्माण इकायों को बेचने के लिए भारी छूट और कुछ राज्यों द्वारा स्टाम्प शुल्क में कमी हैं।

कृषि क्षेत्र पर असर नहीं
केरोना महामारी से कृषि क्षेत्र पर असर नहीं हुआ है। हालाँकि केंद्र सरकार के पिछले साल बनाये गये तीन कृषि क़ीानूनों का विरोध कर रहे किसानों पर सरकार ने ध्यान देना क़ीरीब बन्द कर दिया है। लेकिन संकट के समय में कृषि क्षेत्र में आर्थिक पुनरुद्धार से नयेपन की उम्मीद भी कई लोग पाले हैं। कोरोना की दूसरी लहर ने अर्थ-व्यवस्था को कैसे प्रभावित किया है? महामारी में इस तरह के आकलन असमान आधार प्रभावों के चलते ठीक से सामने नहीं आ पाते हैं। इसलिए मापने की गति पर नज़र डालने के लिए पहले भी बताया गया है। अप्रैल और मई, 2021 के लिए उच्च आवृत्ति संकेतक डाटा लैग के मद्देनज़र कम है। लेकिन उनका सुझाव है कि दूसरी लहर का सबसे बड़ा असर इन्वेंट्री संचय के अलावा गतिशीलता, विवेकाधीन ख़र्च में कमी और बेरोज़गारी बढऩा है।

कृषि क्षेत्र और इससे जुड़े लोगों की स्थिति मज़बूत बनी हुई है। प्रमुख फ़सलों की बुवाई सामान्य रक़ीबे से अधिक हो गयी है। रबी की बुवाई 2021 में 651.9 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में की गयी, जो पिछले वर्ष की तुलना में 1.6 फ़ीसदी अधिक है और पूरे सीजन के सामान्य रक़ीबे से अधिक है। जलाशय का स्तर 56 फ़ीसदी के दशकीय औसत के मुक़ीाबले पूरी क्षमता का 68 फ़ीसदी था, यह रबी मौसम के लिए एक महत्त्वपूर्ण है। रबी की प्रमुख फ़सल गेहूँ ने बुवाई के रक़ीबे (2.0 फ़ीसदी) में वृद्धि दर्ज की है, जिसका मुख्य कारण प्रमुख उत्पादक राज्यों, विशेषकर हरियाणा (1.2 फ़ीसदी) और मध्य प्रदेश (12.7 फ़ीसदी) में अधिक बुवाई हुई। दलहन और तिलहन ने भी रक़ीबे में प्रभावशाली बदलाव दर्ज किया है। रिकॉर्ड ख़रीफ़ उत्पादन के साथ, 51.3 मिलियन टन चावल की ख़रीद हुई, जो एक साल पहले की तुलना में 26.2 फ़ीसदी अधिक रहा। इससे अनाज (चावल और गेहूँ) का बफर स्टॉक सामान्य से 3.7 गुना अधिक हो गया।
कुल माँग की स्थिति प्रभावित हुई है, भले ही कोरोना की पहली लहर से ज़्यादा असर रहा हो। अप्रैल में माल और सेवा कर (जीएसटी) संग्रह 1.41 लाख करोड़ रुपये था, जो जीएसटी की शुरुआत के बाद से सबसे अधिक था। ई-वे बिल घरेलू व्यापार का एक संकेतक है, जिसके अप्रैल 2021 में महीने-दर-महीने 17.5 फ़ीसदी पर दोहरे अंकों का संकुचन दर्ज किया गया, जिसमें अंतर्राज्यीय और अंतर-राज्यीय ई-वे बिलों में 16.5 फ़ीसदी और 19 फ़ीसदी की गिरावट आयी।
पेट्रोल और डीजल की बिक्री के शुरुआती आँकड़े अप्रैल में ईंधन की माँग में गिरावट की ओर इशारा करते हैं, जिसकी वजह राज्यों में तालाबंदी या कोरोना के चलते पाबंदियों का पालन करना है। डीजल की बिक्री में 1.7 फ़ीसदी की कमी आयी, जबकि अप्रैल 2021 में पेट्रोल की बिक्री में 6.3 फ़ीसदी की गिरावट आयी। अप्रैल में बिजली उत्पादन महीने-दर-महीने स्थिर रहा, लेकिन अप्रैल 2019 के पूर्व-महामारी आधार पर, यह 8.1 फ़ीसदी की वृद्धि का बेहतर संकेत है। औद्योगिक गतिविधि पर दूसरी लहर का सीमित प्रभाव देखने को मिला। साल-दर-साल आधार पर बिजली उत्पादन में 39.7 फ़ीसदी की वृद्धि हुई।

अप्रैल 2021 के मध्य से कच्चे तेल की अंतर्राष्ट्रीय क़ीमतों में तेज़ी के साथ, देश में भी पेट्रोल-डीजल की क़ीमतों में भी मई की शुरुआत से एक अंतराल के साथ वृद्धि हुई। 03 मई, 2021 से 12 मई, 2021 के बीच पेट्रोल और डीजल पम्प की क़ीमतें (चार प्रमुख महानगरों में क़ीमतों का औसत) 1.53 रुपये प्रति लीटर और 1.85 रुपये प्रति लीटर बढक़र क्रमश: 94.10 रुपये प्रति लीटर और 86.33 रुपये प्रति लीटर हो गयी। मुम्बई में एक लीटर पेट्रोल अब 99.71 रुपये और डीजल की क़ीमत 91.57 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से बिक रहा है। इस स्तर पर पेट्रोलियम क़ीमतें नयी ऐतिहासिक ऊँचाइयों को छू रही हैं। कृषि, औद्योगिक कच्चे माल और ऊर्जा क्षेत्रों में कटौती करते हुए अंतर्राष्ट्रीय कमोडिटी की क़ीमतें भी तेज़ वृद्धि दर्ज कर रही हैं। इससे घरेलू लागत की हालत बिगड़ती जा रही है।

यात्री वाहनों (पीवी) के अधिकांश मूल उपकरण निर्माताओं (ओईएम) ने अप्रैल में गिरावट दर्ज की, जो माँग की कमी को दर्शाती है। दुपहिया वाहनों की बिक्री में भी 33.5 फ़ीसदी कमी हुई, इससे पता चलता है कि ग्रामीण इलाक़ीों में भी माँग पर असर पड़ा है। वाहन पंजीकरण और वाणिज्यिक वाहनों की बिक्री जैसे अन्य वाहन संकेतकों ने दोहरे अंकों का संकुचन दिखाया। ट्रैक्टर की बिक्री जो लगातार बढ़ रही है, उसमें भी गिरावट दर्ज की गयी। इसके डीलरशिप में कमी देखी गयी। सार्वजनिक आवाजाही पर प्रतिबन्ध के साथ, माल ढुलाई और यात्री आन्दोलनों में नरमी देखी गयी।


01 मई, 2021 को समाप्त हुए लगातार छठे सप्ताह दैनिक विमान यात्रियों की औसत संख्या में कमी आयी। 17 अप्रैल से 01 मई को समाप्त सप्ताह के दौरान दैनिक हवाई सफ़र करने वालों की औसत संख्या 1,93,000 से कम होकर 1,26,000 हो गयी। रेलवे यात्री पंजीकरण अप्रैल के पहले सप्ताह से मंदी की स्थिति में लौट आये हैं।

2021 कैसा दिखेगा? रिकवरी हासिल का आकार आख़िर ‘वी’ आकार का होगा और वी का मतलब वैक्सीन है। भारत पहले ही दुनिया में सबसे बड़ा टीकाकरण अभियान शुरू कर चुका है। आगे की राह ख़तरे से भरी ज़रूर है; लेकिन भारत का भविष्य कोरोना की दूसरी लहर डिगा नहीं सकेगी, बल्कि उसके बाद नयी •िान्दगी का अवसर प्रदान करेगी।