आ अब लौट चलें…

मौत का पर्याय बन चुकी वैश्विक महामारी (कोविड-19) से पलायन के ऐसे दौर की किसी ने कल्पना नहीं की होगी। अगर स्थिति का अन्तर भुला दें, तो यह कमोबेश देश विभाजन के बाद हुए पलायन जैसा ही है। तब अपना घर छोडऩा पड़ा था, अब अपने घर पहुँचने की लालसा है। पलायन रोकने के लिए जिस दूरदर्शिता की दरकार थी वह न केंद्र के पास रही न राज्य सरकारों के पास। नतीजतन देश के ज़्यादातर हिस्सों में पलायन का वह भयावह दौर शुरू हुआ जो कल्पना से परे था। गोद में बच्चा और सिर पर गठरी लादे कोई महिला भीड़ के बीच सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने गाँव और घर पहुँचना चाहती है। मास्क लगाए छोटे-छोटे बच्चे कदम से कदम मिलाकर अपने घर पहुँचने की ललक में चले जा रहे हैं। न रुकने का ठोर, न खाने का ठिकाना। मिल गया तो खा लिया, वरना मंज़िल की तरफ आगे कदम बढऩे ही हैं।

रेलवे लाइनों पर सैकड़ों हज़ारों का रैला, राष्ट्रीय राजमार्गों पर वाहन से ज़्यादा मजबूर लोगों की पलटन दिखती है। घर की तरफ जाते देख अन्य लोगों में भी हूक उठती है और देर सबेर वे भी काफिले में निकल पड़ते हैं। क्या राष्ट्र के नाम संदेश में इन्हें रोकने का जतन नहीं किया जाना चाहिए था। क्या उन्हें काफिला जुडऩे से पहले उन्हें जल्द सब कुछ ठीक होने का भरोसा नहीं दिलाया जाना चाहिए था। यह सब होता, तो इतने बड़े स्तर पर पलायन नहीं होता। जो लोग शहरों को छोडक़र सुरक्षित अपने घर पहुँचना चाहते हैं वे वहीं रहकर काम-काज करेंगे। नहीं तो, वे फिर उन्हीं नगरों और महानगरों का रुख करेंगे, जहाँ उन्हें काम मिलता है और वे मेहनत करके परिवार का भरण पोषण करते हैं। अगर गाँवों में आजीविका के भरपूर साधन हों तो करोड़ों लोग अपने घर छोड़ते ही क्यों? उन्हें ज़बरदस्ती कब तक रोका जा सकता है, जब धैर्य का बाँध टूटता है, तो कोई कुछ भी कदम उठाने के लिए तत्पर हो उठता है।

यह अंतहीन खोज जैसा ही है लेकिन जब काम वाला शहर छोड़ दिया, तो अपने देश, अपने गाँव और अपने घर पहुँचना लाजिमी ही है। भूखे-प्यास लोग बेतहाशा आगे बढ़ते जा रहे हैं। कहीं पुलिस की पिटाई भी खाते हैं, तो कहीं-कहीं शेल्टर होम में भेज दिये जाते हैं। यह मंज़र आज़ादी के बाद पहली बार देश ने देखा। अकाल, प्राकृतिक आपदा या फिर दंगों आदि के बाद छिटपुट तौर पर ऐसे पलायन होते रहे हैं, लेकिन मौज़ूदा प्रवृत्ति कुछ अलग ही दिखी।

महामारी से बचाव के लिए लॉकडाउन कारगर रहा है। इसे लेकर कोई तर्क-वितर्क नहीं है, पर कुल आबादी के एक बड़े हिस्से को क्या आॢथक पैकेज से संतुष्ट और लम्बे समय तक बिना काम रोके रखा जा सकता है? कदापि नहीं, तो फिर जान है, तो जहान के सूत्र पर लॉकडाउन को कितने समय तक खींचा जा सकता है। जान है और जहान भी को पहले लॉकडाउन के बाद अमल में लाया जाता तो आज पलायन का यह मंज़र नहीं देखने को मिलता। बिना किसी सरकारी सहायता के हज़ारों किलोमीटर दूर अपने राज्यों की तरफ निकल पड़े। गंतव्य तक पहुँचने की उन्हें कुछ उम्मीद रही होगी, लेकिन क्या उनके लिए यह डगर इतनी आसान थी। किसी को भी अपने घर जाने से कैसे रोका जा सकता है। जो स्वेच्छा से अपने घर जाना चाहते हैं, वे जा सकते हैं। राज्य सरकारें अपने लोगों को सुरक्षित अपने घरों तक पहुँचाने यह उनका फर्ज़ भी है। ये लोग किस मजबूरी में अपने घर पहुँचना चाहते हैं, इसके बारे में गम्भीरता से विचार नहीं किया गया। शुरू में सख्ती के कारण जो जहाँ है, वह वहीं रहे सम्बन्धित राज्यों की उन्हें सँभालने की ज़िम्मेदारी है। पर यह ज़्यादा समय तक नहीं चला। राज्य सरकारें इस वर्ग को उम्मीदों पर ज़रा भी खरी नहीं उतरी। हज़ारों लोगों के भूखे मरने की नौबत आने लगी। लॉकडाउन में जब काम ही नहीं, तो पैसा कहाँ से आएगा। जब पैसा नहीं तो क्या वह खुद खायेगा और क्या परिवार के लोगों को खिला सकेगा?

अब उम्मीद की कुछ किरण जगी है। अर्थ-व्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की कवायद पर गम्भीरता से अमल होने लगा है। रोज़ कमाने-खाने वाले लोगों को भी अब काम मिलने की उम्मीद होने लगी है। निजी क्षेत्रों में कार्यरत लोगों को फिर के काम बहाल होने और हाथ में पैसा आने की उम्मीद पैदा हुई है। लुधियाना से लेकर मुम्बई तक के अप्रवासी श्रमिकों को ज़िन्दगी फिर से पटरी पर आने का भरोसा होने लगा है।

कई राज्यों में केंद्र के दिशा-निर्देशों के मुताबिक, औद्योगिक इकाइयों में काम शुरू होने लगा है, सीमित संख्या में श्रमिकों को काम मिलने लगा है। राज्य सरकारें मज़दूरों की बदली सोच से आशान्वित होने लगी हैं। उदाहरण के दौर पर पंजाब में 11 लाख से ज़्यादा अप्रवासी लोग हैं। ये अर्थ-व्यवस्था की रीढ़ के तौर पर हैं। हर राज्य में कमोबेश ऐसा ही होगा। ज़्यादा-से-ज़्यादा औद्योगिक इकाइयाँ चलने लगें, इसके लिए सरकार काफी गम्भीर दिखती है।

पंजाब में कृषि का काम भी बाहरी राज्यों से आने वालों पर निर्भर है। गेहूँ की कटाई के बाद अब राज्य में (जीरी) चावल की पौध लगाने का काम शुरू होने वाला है। यह काम एक पखवाड़े पहले शुरू हो जाएगा। इसमें हज़ारों लोगों की ज़रूरत होगी. वे कहाँ से आएँगे? अगर पलायन नहीं रुकेगा, तो चावल की खेती प्रभावित होने का खतरा है। राज्य सरकार का मानना है कि अगर मज़दूरों को काम मिले, तो वे यहाँ रुक सकते हैं। वे यहाँ काम के लिए ही तो आये हैं और वही नहीं मिल रहा था। इसी के चलते वे पलायन को मजबूर हो रहे थे। अपने घरों में पहुँच सके लोगों ने फिर से काम के लिए इच्छा जतायी है, लेकिन उनका इतनी जल्दी आना मुश्किल होगा। मगर जो यहाँ हैं, उनके रुकने और काम करने में कोई परेशानी नहीं आने वाली। उम्मीद की जानी चाहिए कि अर्थ-व्यवस्था को धीरे-धीरे पटरी पर लाने के लिए ठोस कदम उठेंगे। सरकारों की मंशा भी इस दिशा में सकारात्मक ही लगती है। हरियाणा की स्थिति भी कमोबेश पंजाब जैसी ही है। यहाँ उद्योगों के अलावा कृषि में बाहरी राज्यों के लोगों पर निर्भरता है।

फिर से ज़िन्दगी को पटरी पर लाने की सोच और दूरंदेशी एक सीमित वर्ग में पनपी है। ऐसे लोग अब रुकना चाहते हैं। यह प्रतिशत अभी काफी कम है, लेकिन चौतरफा पलायन में इससे कुछ संदेश जाएगा। पलायन क्यों हो रहा था इसकी तह में जाना होगा। जहाँ-तहाँ फँसे कामगारों के पास काम नहीं था। मालिकों ने आधा अधूरा पैसा देकर उन्हें स्थिति के ठीक होने तक जाने को कह दिया। किराया न होने की सूरत में मकान खाली कर देने पड़े।

पहले चरण के 21 दिन में ही लगभग सारा पैसा खर्च हो गया। राज्य सरकारों का श्रमिकों के भोजन और रहने आदि की व्यवस्था के वादे चुनावी से ज़्यादा नहीं रहे। एक बड़ा वर्ग भूख से निढाल हो चुका था। उन्हें महामारी से मौत से पहले भूख के ज़िन्दगी निगलने का खतरा सता रहा था। उनकी सोच हो गयी कि जब मरना ही है, तो क्यों न अपने घरों की तरफ रुख किया जाए। मौत दो दोनों तरफ ही है। ऐसे में सरकारों को आगे आकर उन्हें काम मिलने का ठोस भरोसा दिलाना था, पर ऐसा नहीं हुआ। कोई अपना घर ऐसे ही तो नहीं छोड़ता। आजीविका के लिए हज़ारों किलोमीटर दूर रह परिवार के भरण-पोषण वाले ये लोग बड़े जीवट वाले होते हैं। घर जाने से पहले अगर काम मिले तो वे रुकने पर विचार कर सकते हैं। उन्हें काम देगा कौन? कौन इसकी व्यवस्था करेगा। यह सब सरकार पर निर्भर करता है।

पलायन कर रहे लोगों को यूरोपीय देशों में महामारी में बड़े पैमाने पर होने वाली मौतों की भी कुछ-कुछ जानकारी कहीं से मिलती ही है। यहाँ कमोबेश अभी तो वैसी स्थिति नहीं है और शायद वैसी हो भी न, लेकिन यह भविष्य के गर्भ में है। पलायन रुके, कामगारों को काम मिले। ज़िन्दगी पहले जैसी होने में समय लगेगा, लेकिन उन्हें इस बात का भरोसा तो हो जाए कि वे कोरोना से पहले भूख से न मर जाएँ। खाने के अलावा उन पर परिवार की भी ज़िम्मेदारी है। लिहाज़ा उन्हें काम मिलना चाहिए और यह सब सरकार के भरोसे है। ऐसा नहीं कि श्रमिकों को व्यवस्थित तरीके से घर पहुँचाने के लिए जतन नहीं हुए। कोई तीन लाख लोग विशेष श्रमिक गाडिय़ों से अपने-अपने घरों को पहुँच चुके हैं। यह संख्या करोड़ों में है। सोशल डिस्टेंस आदि के चलते संख्या सीमित रखनी होती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह सिलसिला अब कम होगा, क्योंकि एक वर्ग को लगने लगा है कि शायद ज़िन्दगी ढर्रे पर आने वाली है। जो अपने घर पहुँच गये वे काम पर लौटना चाहते हैं और जो जाना चाहते हैं, उन्हें काम मिलने की उम्मीद होने लगी है।