हैरान होने की ज़रूरत नहीं मौत के आंकड़े बढ़ रहे हैं

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मुझे उस समय गहरा झटका लगता है जब देश के नेता विकास और लंबी आयु की बातें करते हैं। इसके अलावा अपने झूठ के पुलिंदे में वे और डाल भी क्या सकते हैं। उनके इन झूठे दावों के विपरीत जितना इंसानी नुकसान इन दिनों हुआ है उतना इससे पहले कभी नहीं हुआ था। हां, आज कथित विकास के समय में हम मरने के ज़्यादा नज़दीक हैं।

वातावरण प्रदूषण हमारे हर अंग को खत्म कर रहा है। इसके अलावा शोर का प्रदूषण हर दिल पर असर डाल रहा है। इन महीनों में मैं जहां-जहंा भी गई स्थानीय  निवासी बंदरों और गली के कुत्तों से परेशान दिखे। ये जानवर चलते फिरते लोगों पर हमले कर देते हैं और घरों में घुसकर भारी तोड़ फोड़ करते हैं।  फिर भी उनकी रोकथाम के लिए कुछ भी नहीं किया जा रहा। क्या नगर निगम को इस पर कार्रवाई नहीं करनी चाहिए? उसे मानव को इन जानवरों से नहीं बचाना चाहिए?

असल में हम डेंगू और दूसरे वायरल बुखारों पर तो चिंता जताते हैं पर ‘रेबिज’ पर बात नहीं होती। क्यों? वह क्या चीज़ है जिसने हमें ‘रेबिज़’ जैसी खतरनाक बीमारी को अनदेखा करने का आदी बना दिया। पहले गली में घूमते अनाथ जानवरों को घरों के निकट फटकने नहीं देते थे पर आज कौन ध्यान रखता है। ‘रेबिज’ ऐसी बीमारी है जिसका कोई इलाज नहीं और मरीज़ बहुत ही दर्दनाक मौत मरता है।

पुराने ज़माने के शासक इन जानवरों को एक साथ मारने का आदेश देते थे पर आज यह काम धीरे-धीरे करते हैं। उन्हें यह साबित करना होता है कि  वे इन प्राणियों की हत्या के कितने विरोधी हैं। पर देखिए जेलों में  क्या कुछ हो रहा हे। क्या यह सही समय नहीं है जब भीड़ भाड़ भरी जेलों की जगह खुली जेलों में कैदियों को रखा जाए ताकि वे धीमी मौत न मरें और सभी स्वस्थ रहें।

प्रशासन व्यवस्था जिन्हें मारती है उन मौतों की अनदेखी भी नहीं होनी चाहिए। उत्तरप्रदेश में मार्च 2017 से अब तक 1100 पुलिस मुठभेड़ों में 50 से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं। राज्य का आतंकवाद अपने चरम पर है, और जो पुलिस से बच गए उन्हें सत्ताधारी दल के नज़दीक माने जाने वाले लोगों ने गलियों में पीट-पीट कर मार डाला। असल में आम लोगों को आतंकित करने के लिए कई राजनेताओं ने अपनी निजी सेनाएं गठित कर ली हैं। जैसे-जैसे 2019 के चुनाव नज़दीक आते जा रहे हैं तो इस बात की आशंका बढ़ रही हे कि ये निजी सेनाएं उन क्षेत्रों में खूब उत्पात मचाएंगी जहां उनके नेता को कम वोट मिलने का डर होगा। पर किसे फर्क पड़ता है कि उन दंगों में कितनी बड़ी मात्रा में लोग मारे भी जाते है। देखिए अयोध्या के आसपास क्या हो रहा है? बाबरी मस्जिद विवाद में अभी अदालत का फैसला आना है, पर शिवसैनिकों का जमवाड़ा वहां हो गया है। उन्होंने मुसलमानों और दलितों को इतना डरा दिया है कि वे  लोग अपने घर-बार छोड़ कर भाग रहे हैं।

कश्मीर, पूर्वोत्तर भारत और नक्सली क्षेत्रों में हत्याओं का सिलसिला जारी है। इन मौतों के बारे में सरकार की तरफ से कोई पारदर्शिता नहीं है। आज सरकार का आतंक विश्वविद्यालयों में देखा जा सकता है जहां छात्रों के साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। राजनैतिक माफिया का दखल विश्व विद्यालयों की कक्षाओं से लेकर छात्रावासों तक में हो गया है। किराए के राजनैतिक गुंडे विश्वविद्यालयों में मारपीट कर रहे हैं और पढ़ाई का वातावरण खत्म किया जा रहा है।

 हैदराबाद की सेंट्रल यूनिवर्सिटी के परिसर में या जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रांगण में या फिर दिल्ली विश्वविद्यालय में पिछले दिनों जो कुछ हुआ वह यह स्पष्ट दिखाता है कि सरकारें विद्रोही आवाज़ों को दबाने के लिए किस हद तक जा सकती है। हैदराबाद सेंट्रल यूनिवर्सिटी में रोहित बेमुला की मौत के बाद दक्षिण पंथी उत्पातियों ने जो किया वह सामने है। इसके साथ ही उस छात्र के बारे में ज़्यादा बताने की ज़रूरत नहीं जो गायब हो गया।

हम उन लोगों की मौत की बात करने से क्यों कतराते हैं जो भूख से मर गए। कुपोषण से होने वाली मौतें मुझे और आपको हिला सकती हैं पर इन क्रूर राजनेताओं के लिए ये महज आंकड़ें हैं।  ये राजनेता ‘वोट-बैंक’ और ‘मनी बैंक’ की बात कर सकते हैं पर ‘रोटी और दूध बैंक’ की नहीं। रोटी, दूध कहां से आएगा जिससे कुपोषण को खत्म किया जा सके, इस पर बात नहीं होगी।

देश की बिडम्बना देखिए कि वे किसान जो हम सबका पेट पाल रहे हैं वे रोज़-रोज़ के तनावों से तंग आ कर आत्महत्या कर रहे हैं। पर सरकार ने उनके लिए क्या किया? उन्हें केवल झूठे आश्वासन दिए। हमारी सीमा से लगते गांवों में भी लोग मर रहे हैं। यह भी देखना होगा कि हमारे कितने नेताओं ने अपने बच्चे सेना में  भर्ती करवाए हैं। यह गिनती अगर शून्य न भी हो तो भी इक्का-दुक्का ही होगी। उनमें से किसी के बेटे -बेटियां सेना में सिपाही नहीं हैं।

इस रोशनी में देखें तो राजनेताओं को एलओसी के पास रहने वालों की समस्याओं का क्या पता? राजनेता सीमा पर जा कर केवल वहां तैनात फौजियों के साथ औपचारिक बातचीत करके लौट आते हैं। वे यह नहीं सोचते कि सैनिकों पर खतरे ज़्यादा हैं। बंकरों में  लबें समय तक बैठे रहना उनमें तनाव को बढ़ता है। उनके पास इस तनाव से निकलने का कोई साधन नहीं होता। शायद यही कारण है कि सेना में आत्महत्या की घटनाएं बढ़ रही हैं और वे अपने साथियों पर भी गोली चला रहे हैं।

समझ में नहीं आता कि हमारे राजनेता सीमा क्षेत्रों में जल्दबाजी में ही क्यों जात हैं? वे वहां 10-15दिन काटें और  सैनिकों के साथ बातचीत करें। उन्हें वापिस लौटने की इतनी जल्दी क्यों रहती है? बस औपचारिकता पूरी हुई और वे अपनी आरामगाह में लौटने को आतुर हुए नहीं।

फिर भी ये राजनेता कितनीआसानी से मारने के आदेश दे देते है। वे कूटनीति और कूटनीतिज्ञों का इस्तेमाल क्यों नहीं करते। आज के राजनेता जो कदम उठाते हैं वे अंतरराष्ट्रीय हथियार बेचने वालों के पक्ष में जाते हैं।

आप कोई भी ऐतिहासिक या पौराणिक पटकथा पढें़ तो पाएंगे कि उन दिनों भी युद्ध अंतिम विकल्प होते थे। सबसे पहले बातचीत, विचार विमर्श और वार्ताओं के कई दौर चलते। उस दौरान सभी कूटनीतिज्ञ उपाए किए जाते। आखिर युद्ध से मौतें और तबाही ही तो होती है।