हिमाचल में सत्ता में बैठी भाजपा को कांग्रेस की चुनौती

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देश के बड़े नेताओं के प्रचार में जुटने के साथ ही प्रदेश में चुनावी सरगर्मी उफान पर पहुँच चुकी थी। चार सीटों वाले हिमाचल में 19 मई को मतदान के साथ ही 45 प्रत्याशियों का भाग्य ईवीएम में कैद हो गया। मुख्य मुकाबला भाजपा-कांग्रेस में है जबकि कुछ निर्दलीय और अन्य दलों के उम्मीदवार भी मैदान में हैं।

सबसे ज्यादा उम्मीदवार मंडी सीट पर हैं, जहां 17 प्रत्याशी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। सबसे कम छह उम्मीदवार शिमला सुरक्षित सीट पर हैं जबकि कांगड़ा और  हमीरपुर संसदीय क्षेत्रों में 11-11 उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। भाजपा, कांग्रेस के अलावा  माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी, राष्ट्रीय क्रांतिकारी पार्टी, स्वाभिमान पार्टी और बसपा ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं।

सभी उम्मीदवार पिछले करीब एक महीने से पूरी ताकत से अपनी जीत सुनिश्चित करने में जुटे रहे हैं। देश के अन्य हिस्सों में चुनाव प्रचार से निपटते ही नरेंद्र मोदी, राहुल गांधी, अमित शाह, प्रियंका गांधी जैसे बड़े नेता हिमाचल में प्रचार करने पहुंचे हैं।

नामांकन के ही बीच दो बड़ी राजनीतिक ”घटनाएं” हुई हैं। एक तो यह कि पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह मंडी से कांग्रेस प्रत्याशी आश्रय सिंह के चुनाव प्रचार में जुट गए हैं इससे पूर्व कहा जा रहा था कि वे आश्रय को टिकट दने से खुश नहीं हैं, और दूसरा यह कि दो बार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष और तीन बार सांसद रहे बिलासपुर के सुरेश चंदेल भाजपा छोड़ कांग्रेस में आ गए हैं।

पहले जिक्र मंडी का। यह मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर का गृह जिला है। उनके सामने अपनी गृह सीट मंडी ही नहीं पिछली बार जीती चारों सीटें भाजपा की झोली में डालने की चुनौती है। भाजपा ने पिछली बार जीते राम स्वरुप शर्मा को ही मैदान में उतारा है। प्रदेश में 2014 जैसी मोदी लहर नहीं है। जनता करीब डेढ़ साल की जयराम सरकार के कामकाज के अलावा देश के मुद्दों पर वोट करेंगी।

हाल ही में विधानसभा सत्र में सरकार ने एक सवाल पर यह चिंताजनक जानकारी जाहिर की थी कि इस गरीब प्रदेश में बेरोज़गारों का आंकड़ा 7.50 लाख (सरकारी दफ्तरों में दर्ज बेरोज़गार) के आसपास पहुँच चुका है। पूरे देश की तरह इस पहाड़ी सूबे में भी बेरोज़गारी सबसे बड़ा मुद्दा है। परवाणू-राजमार्ग पर सड़क निर्माण में मजदूरी कर रहे पच्छाद के सुरेंद्र ने कहा – ”मैंने दसवीं पास की है लेकिन नौकरी नहीं मिलने पर मजदूरी कर रहा हूँ। मेरा बीए पास भाई भी बेरोज़गार है। सभी नौकरी का वादा करते हैं लेकिन हकीकत में यह झूठ है।”

राजनीतिक विश्लेषक बीडी शर्मा भी बेरोज़गारों की इस भीड़ को चिंता की नजर से देखते हैं – ”इस प्रदेश में सरकारी क्षेत्र ही रोज़गार का सबसे बड़ा सहारा है। निजी क्षेत्र सीमित है। कुछ उद्योग हैं लेकिन वहां 70 फीसद रोज़गार हिमाचल के लोगों को देने के सरकारी फैसले का पालन पूरी तरह नहीं होता। बेरोज़गारी हर चुनाव में मुद्दा रहती है जो जाहिर करता है कि सभी दल इसपर उतना फोकस नहीं कर पाए जितनी ज़रुरत है।”

हिमाचल से सेना में बड़ी संख्या में जवान (अधिकारी भी) हैं। कुछ रोजग़ार की ज़रुरत  इसका कारण है, कुछ देशभक्ति का अनोखा जज्बा। क्या चुनाव में बेरोज़गारी मुद्दा है,  इस सवाल पर सुनिए मंडी-कुल्लू मार्ग पर औट में बीए पढ़े भलखू राम ने क्या कहा – सरजी, सच बताऊँ। चुनाव में रोजगार मज़ाक का मुद्दा है। कोई इस मसले गंभीर नहीं।” क्या वो राहुल गांधी की 72,000 वाली ”न्याय योजना” के बारे में जानते हैं, भलखू राम ने कहा – ”राहुल सत्ता में आते हैं तो मेरा सुझाव है कि उन्हें देश के हर बेरोज़गार के लिए न्यूनतम वेतन देने वाली एक कानूनी योजना लानी चाहिए।”

क्या भाजपा का राष्ट्रवाद को चुनावी मुद्दा बनाना सही है, इस सवाल पर काँगड़ा के गगरेट में राम सिंह परमार का कहना था – ”हमारे संयुक्त परिवार में छह सदस्य आर्मी में हैं। पिता और तायाजी भी सेना से रिटायर हुए। जिस खराब तरीके से पीएम और भाजपा के नेता चुनाव में सेना के नाम का इस्तेमाल कर रहे हैं उससे ऐसा लग रहा है मानों देश की सेना उनकी निजी सेना हो। इस तरीके से सेना का मान घटा है।”

हालांकि, ज्वालामुखी के बस अड्डे पर अशोक शर्मा का मत कुछ ऐसा था – ”सेना को चुनावी राजनीति में नहीं लाना चाहिए था। यह गलत है लेकिन मोदी धाकड़ नेता हैं इसमें दो राय नहीं।”

लोगों में राहुल गांधी की ”न्याय योजना” की जानकारी टीवी के जरिये ही पहुँची है। कांग्रेस के लोग अब चुनाव सभाओं में इसका जि़क्र करने लगे हैं लेकिन ठीक से लोगों को समझा नहीं पाते। ”ऐसा लगता है वे कोई खैरात बाँटने की बात कर रहे हों। $गरीबी से निबटने और मार्केट को मदद करने में यह योजना कारगार हो सकती है लेकिन कांग्रेस के स्थानीय नेता ही इसके बारे में बेहतर तरीके से नहीं जानते तो लोगों को क्या समझायेंगे,” यह कहना था भगवान सिंह परसीरा का, जो कालेज से लेक्चरर  रिटायर हुए हैं।

भाजपा को इस चुनाव से पहले एक झटका लगा है। उसके दो बार प्रदेश अध्यक्ष और तीन बार सांसद रहे सुरेश चंदेल अपना राजनीतिक करियर बचाने के लिए कांग्रेस  गए। वो हमीरपुर से लोकसभा टिकट चाहते थे। खूब जुगाड़ भी किया लेकिन दाल नहीं गली। कांग्रेस ने पहले भी तीन बार हार चुके अपने पुराने महारथी पूर्व मंत्री राम लाल ठाकुर पर भरोसा जताया।

चंदेल अब कांग्रेस में आ गए हैं क्योंकि भाजपा में उनका कमोवेश हर रास्ता बंद हो चुका था। लेकिन उनकी एक और दिक्कत है। कांग्रेस में उनके गृह जिले बिलासपुर से लेकर दूसरी जगह के कांग्रेसी भी उनको दिल से अपना नहीं रहे। बिलासपुर के विधायक बम्बर ठाकुर तो खुले रूप से उनका विरोध कर चुके हैं।

भाजपा के बिलासपुर में एक नेता ने नाम न छपने की शर्त पर कहा – ”चंदेल ऑउटडेटेड हो चुके हैं। उनके नाम पर न तो कोई वोट देगा न उनके जाने से हमारी पार्टी पर कोइ फर्क पड़ेगा।” हालांकि, सच यह भी है कि जब चंदेल की राजनीति का इकबाल ऊंचा था, उन्हें मुख्यमंत्री पद का गंभीर उम्मीदवार माना जाने लगा था। लेकिन ”पैसे लेकर संसद में सवाल पूछने ” वाले स्टिंग ने उनके राजनीतिक जीवन पर ग्रहण लगा दिया और करीब दस साल से वो राजनीति के बियाबान में ही गोते लगा रहे थे।

हिमाचल में चार सीटें हैं लोक सभा की लेकिन जिन दो सीटों पर सबकी सबसे ज्यादा नज़र है वे हैं हमीरपुर और मंडी। मंडी में तो कांग्रेस की तरफ से पूर्व केंद्रीय मंत्री सुख राम के पोते आश्रय मैदान में हैं। आश्रय के पिता अनिल शर्मा ने भाजपा सरकार में मंत्री पद से तो इस्तीफा दे दिया लेकिन अभी भी वे भाजपा के ही विधायक हैं। इस सीट पर पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह की बहुत पकड़ है। वैसे खुद वीरभद्र सिंह की पत्नी प्रतिभा सिंह इस सीट पर वीरभद्र सिंह के बूते दो बार सांसद रह चुकी हैं। वैसे वो दो बार हारी भी हैं।

वीरभद्र सिंह को सुख राम का दशकों पुराना विरोधी माना जाता है। कांग्रेस के भीतर लोगों का मानना है कि यदि वीरभद्र सिंह पूरी ताकत से आश्रय के पक्ष में आ जाएँ तो भाजपा के राम स्वरुप के लिए आश्रय बहुत मजबूत प्रतिद्वंदी साबित हो सकते हैं। वीरभद्र सिंह ने आश्रय के नामांकन में शामिल होकर सबको चैंका दिया।

मुख्यमंत्री और सुख राम दोनों मंडी जिले से हैं लिहाजा न्यूट्रल हलकों से जिसे ज्यादा वोट पड़ेंगे उसका पलड़ा भारी रहेगा। जय राम को मुख्यमंत्री होने के नाते मंडी के सराज से बड़ा समर्थन मिलने की उम्मीद है। सुख राम संचार क्रांति के दौरान इलाके के लोगों को दी गईं नौकरियों के भरोसे हैं।

सुख राम के दल बदलने से जरूर कुछ लोगों में नाराज़गी है। जोगिन्दर नगर में ललित कुमार ने कहा – ”वो अपने समय में बड़े नेता थे इसमें कोइ शक नहीं। लेकिन जिस तरह उन्होंने परिवार मोह में दल बदले हैं, उसे मैं अच्छा नहीं मानता। दूसरे मुख्यमंत्री होने के नाते जयराम ने मंडी जिले में बहुत काम किये हैं जिसका लाभ भाजपा को  मिलेगा।”

भाजपा ने वीरभद्र सिंह के गढ़ रामपुर में छह बार के विधायक सिंघी राम को अपने पाले में करके जरूर कांग्रेस के इस मजबूत इलाके में वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की है।

हालांकि कुल्लू जिले के आनी में कुशल और रामपुर में विकास धोलता ने एक सी बात कही – ”राजासाहब (वीरभद्र सिंह) के ऊपर निर्भर है आश्रय की जीत। राजासाहब ने खुले मन से साथ दिया तो रामसरूप (भाजपा प्रत्याशी) के लिए दिक्कत पैदा हो सकती है।” वैसे रामस्वरूप के समर्थकों को उम्मीद है कि जयराम के मुख्यमंत्री होने और उनकी ईमानदार नेता की छवि के बूते वे जीत जाएंगे।

दूसरी वीआईपी सीट हमीरपुर है जहाँ भाजपा के युवा तुर्क माने जाने वाले तीन बार के सांसद अनुराग ठाकुर मैदान में हैं। हिमाचल में इसी सीट पर लोगों की सबसे ज़्यादा नजऱ है। अनुराग को भाजपा में भविष्य का नेता माना जाता है। लोकप्रिय भी हैं और गतिशील भी। क्रिकेट में हिमाचल को अंतर्राष्ट्रीय स्तर के नक्शे पर लाने का श्रेय अनुराग को ही जाता है।

नादौन में वरिष्ठ पत्रकार कपिल बस्सी ने कहा – ”अनुराग निश्चित ही हैवीवेट कैंडिडेट हैं। रेल विस्तार से लेकर क्रिकेट और केंद्रीय योजनाओं को अपने हलके में लाने का श्रेय उन्हें जाता है। उनके पिता पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम धूमल का पूरे हलके में खासा जनाधार हैं जिसका लाभ भी अनुराग को मिलेगा।”

हालांकि बिलासपुर में रामनाथ जोगी ने कहा – ”कांग्रेस के राम लाल इस सीट पर तीन बार हार चुके हैं लिहाजा जिले में लोगों के मन में उनके प्रति सहानुभूति है।” वैसे ऊना से लेकर हमीरपुर तक अनुराग के समर्थक ज्यादा दिखे और वे उन्हें एक ऊर्जावान एमपी मानते हैं।

कांगड़ा सीट पर इस बार दिग्गज शांता कुमार की भूमिका भाजपा के लिए वोट मांगने तक सिमट गई है। पार्टी ने इस उम्रदराज नेता को इस बार टिकट नहीं दिया। उनकी जगह उनके ही समर्थक माने जाने वाले गद्दी समुदाय के किशन कपूर को मैदान में उतारा गया है जो भाजपा सरकार में मंत्री भी हैं।

इस सीट पर जातिगत समीकरण बहुत अहम् रहेंगे। कांग्रेस ने चैधरी (ओबीसी)  समुदाय के पवन काजल को टिकट दिया है। पवन विधायक हैं और जिस काँगड़ा हलके से वे जीते हैं वहां चैधरी समुदाय में उनकी गहरी पैठ मानी जाती है।

वैसे तो कांगड़ा से भाजपा प्रत्याशी किशन कपूर को पूर्व मुख्यमंत्री और कांगड़ा सीट से वर्तमान सांसद शांता कुमार का समर्थक माना जाता है, लेकिन कहा जाता है कि शांता इस सीट से राजीव भारद्वाज को टिकट की वकालत कर रहे थे जो उनके नजदीकी माने जाते हैं।

जातिगत जमा-जोड़ की बात की जाए तो कांगड़ा में करीब 4.50 लाख के करीब चैधरी (ओबीसी) आबादी है और इतने ही राजपूत हैं जबकि तीसरे नंबर पर ब्राह्मण आबादी है। गद्दी करीब 1.50 लाख हैं जो कांगड़ा जिले के अलावा चम्बा के चुराह और भटियात में भी हैं।

भाजपा टिकट के दावेदार राजपूत नेता कृपाल परमार भी थे जो पहले राज्य सभा के सदस्य रहे हैं। उनकी पूरी कोशिश के बावजूद टिकट उन्हें नहीं मिला। उधर कांग्रेस में चैधरी नेता और एक बार सांसद रह चुके चंद्र कुमार टिकट चाहते थे लेकिन नहीं मिल पाया। पिछले दो विधानसभा चुनावों में पवन काजल कांगड़ा जिले में नए चैधरी नेता के रूप में उभरे हैं।

किशन कपूर को टिकट मिलने से गद्दी समुदाय में खुशी है। जिला प्लानिंग बोर्ड के सदस्य चुन्नी लाल भंगालिया कहते हैं – ”पूरा समुदाय किशन के समर्थन में खड़ा है। यह खुशी की बात है कि भाजपा ने उनके समुदाय से किसी को टिकट के लिए चुना।”

हालांकि, काँगड़ा बस अड्डे पर खुशी राम ने कहा – ”काजल ने पिछले छह साल में काफी काम किये हैं। लोक सभा में उनके जाने से हमारी कॉम्यूनिटी को मजबूत आवाज मिलेगी।”

कांगड़ा सीट पर गद्दी और चौधरी समुदाय के बाहर के मतदाता जीत-हार का फैसला करेंगे। यदि पवन अपने समुदाय के वोटों में सेंध लगने से बचा सके तो काँगड़ा जिले में वे किशन कपूर को मुश्किल में डाल सकते हैं।

शिमला सीट प्रदेश की इकलौती आरक्षित सीट है। यहाँ समीकरण दिलचस्प हैं। कांग्रेस के विधायक उम्मीदवार धनी राम शांडिल सुख राम की खत्म हो चुकी पार्टी हिमाचल विकास कांग्रेस ( हिविकां) से 1999 जबकि 2004 में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लोक सभा का चुनाव जीत चुके हैं। डोगरा रेजिमेंट से कर्नल रिटायर हुए धनी राम की छवि एक ईमानदार और मिलनसार नेता की है। पूर्व सैनिकों में उनकी पैठ है।

भाजपा ने यहाँ से पच्छाद विधानसभा हलके से लगातार दूसरी बार जीते सुरेश कश्यप को टिकट दिया है। सुरेश भी सेना की पृष्ठभूमि के हैं और नान कमीशंड आफिसर रहे हैं। धनी राम और सुरेश दोनों की छवि बेदाग है। दोनों कोली कश्यप जाति से आते हैं जिनकी इस सीट पर सबसे ज्यादा वोट हैं।

वोटों का गुना-भाग इस सीट पर बड़ा दिलचस्प है। कांग्रेस ने हाल में नालागढ़ के मजबूत लीडर बाबा हरदीप सिंह को पार्टी में वापस ले लिया है। विधानसभा चुनाव में टिकट न मिलने से बागी हुए हरदीप निर्दलीय मैदान में उतर कर 9000 के करीब वोट ले गए थे। कांग्रेस को उम्मीद है कि यह वोट बाबा के पक्के वोट हैं जो कांग्रेस के खाते में आ सकते हैं।

सोलन जिले की तीन विधानसभा सीटों पर इस समय कांग्रेस के विधायक हैं जिनमें एक अर्की में पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह शामिल हैं। शिमला जिले की ग्रामीण सीट पर भी वीरभद्र सिंह के बेटे विक्रमादित्य सिंह विधायक हैं। वीरभद्र सिंह का शिमला जिले में जबरदस्त जनाधार माना जाता है।

इसके अलावा ठियोग सीट माकपा के राकेश सिंघा के पास है। माकपा का इस सीट पर कोइ उम्मीदवार नहीं लिहाजा माना जाता है कि माकपा का परम्परागत वोटर भाजपा को वोट नहीं डालता। इस लिहाज से यह वोट कांग्रेस के खाते में जा सकता  है।

हालांकि इसके यह मायने नहीं कि भाजपा यहाँ कुछ नहीं कर रही। विधानसभा अध्यक्ष राजीव बिंदल नाहन से विधायक हैं और मजबूत पकड़ वाले नेता माने जाते हैं। कहते हैं वे मंत्री बनना चाहते थे लेकिन पार्टी का फैसला उन्हें विधानसभा अध्यक्ष बनाने का हुआ। ”तहलका” की जानकारी के मुताबिक भाजपा पूरी ताकत इस सीट को बरकरार रखने के लिए लगा रही है।

लोगों से बातचीत करने पर लगता है कि लोग शांडिल की छवि से काफी प्रभावित हैं लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जो यह मानते हैं कि सुरेश कश्यप को प्रदेश में भाजपा की सरकार होने का फायदा मिलेगा।

अर्की में रत्ती राम ने कहा – ”शांडिल बहुत मजबूत उम्मीदवार हैं। उनकी छवि बहुत ईमानदार और शांत नेता की है। दो बार एमपी रहने के कारण वो पूरे क्षेत्र से वाकिफ हैं। एक बार मंत्री भी रहे हैं।” हालांकि,  नाहन में कविता शर्मा ने कहा बड़ी दिलचस्प बात कही – ”वोट तो मोदी के नाम पर पडऩा है। कोइ उम्मीदवार नहीं देखेगा न पार्टी। जो भाजपा को देंगे वो मोदी के नाम पर देंगे और जो कांग्रेस को देंगे वो मोदी के खिलाफ देंगे।’

दांव पर छवि

यह लोक सभा चुनाव मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के लिए एक बड़ी चुनौती है। सुख राम अपने पोते आश्रय के लिए जिस ताकत से मैदान में जुटे गए हैं उससे जयराम को अपने गृह जिले मंडी में ज्यादा वक्त देना पड़ रहा है। भाजपा को यहां कल्पना से  कहीं ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही है। जयराम डेढ़ साल से मुख्यमंत्री होने के बावजूद वीरभद्र सिंह, प्रेम कुमार धूमल या शांता कुमार की तरह प्रदेशव्यापी छवि वाले नेता नहीं हैं। कांग्रेस में वीरभद्र सिंह प्रदेश के किसी भी हिस्से में अपनी पार्टी के लिए वोट जुटाने की क्षमता रखते हैं और धूमल भी उसी श्रेणी के नेता हैं जिन्हें निचले और ऊपरी हिमाचल दोनों में बराबर का जनसमर्थन हासिल है। हालांकि सेब क्षत्रों में सीएम रहते आंदोलनकारियों पर गोली चलने का आदेश देने वाले शांता को ऊपरी हिमाचल में समर्थन नहीं रहा फिर भी वे व्यापक जनाधार वाले नेता अपने जमाने में रहे हैं। जयराम के सामने प्रदेश की चारों सीटों को फिर जीतने की कठिन चुनौती है। भाजपा के ज्यादातर उम्मीदवार पीएम मोदी के नाम पर वोट मांग रहे हैं। हमीरपुर में  जरूर अनुराग ठाकुर मोदी के नाम के साथ-साथ व्यक्तिगत छवि का भी लाभ उठा सकते हैं। तीन कबाइली इलाकों लाहौल स्पीति, किन्नौर और भरमौर का क्या रुख रहता है यह भी दिलचस्प रहेगा। परम्परागत रूप से कांग्रेस यहाँ मजबूत रही है।

दुनिया का सबसे ऊंचा मतदान केंद्र

दुनिया में सबसे ऊंचाई पर स्थित मतदान केंद्र हिमाचल में ही है। यह कबाइली जिले लाहौल स्पीति के टाशीगांग का मतदान केंद्र है। वहां मतदाताओं की संख्या महज 49 है और यह 15256 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। इससे पहले भी दुनिया का सबसे ऊंचा मतदान केंद्र लाहौल स्पीति में ही हिक्किम में स्थित था जो समुद्र तल से 15 हजार फुट की ऊंचाई पर है। तिब्बत की सीमा से सटे लाहौल और स्पीति जिले के इस गांव की जनसंख्या महज 483 है जिनमें 333 मतदाता हैं। इन दोनों मतदान केंद्रों पर मतदाता 19 मई को अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। गौरतलब है कि भारी बर्फबारी के कारण यह इलाका छह महीने दुनिया से कटा रहता है और इसे शीत मरुस्थल के नाम से भी जाना जाता है।

कुल 7723 मतदान केंद्र, 53,30,154 मतदाता

पहाड़ी प्रदेश हिमाचल में कुल 7723 मतदान केंद्र बनाए गए हैं। लाहौल स्पीति जिले का किंगर सबसे छोटा मतदान केंद्र है, जहां केवल 37 मतदाता हैं। प्रदेश में मतदाताओं की संख्या 53,30,154 है जिनमें 27,24,111 पुरुष और 26,05,996 महिला मतदाता हैं जबकि 47 थर्ड जेंडर मतदाता भी दर्ज हैं। इस बार नए मतदाताओं की संख्या 52,390 है। वैसे हिमाचल में तीस साल से कम आयु के मतदाताओं की संख्या 13,34,823 है। हिमाचल के मुख्य चुनाव अधिकारी देवेश कुमार के मुताबिक प्रदेश में 100 साल से ज्यादा उम्र के 999 मतदाता हैं। उनके मुताबिक – ”हमारे इन बुजुर्ग वोटर्स को मतदान केंद्रों तक लाने के लिए विशेष व्यवस्था की गई है। प्रदेश में इस बार 136 ऐसे मतदान केंद्र होंगे जिन्हें सिर्फ महिला कर्मी संचालित करेंगी और 10 मतदान केंद्र केवल दिव्यांग मतदान कर्मियों के लिए बनाए गए हैं।” प्रदेश के तीन  मंडी, हमीरपुर और लाहौल स्पीति ऐसे जिले हैं, जहां महिला मतदाताओं की संख्या पुरुष मतदाताओं से अधिक है। हमीरपुर में यह संख्या 1042 प्रति 1000 पुरुष मतदाता है, जबकि लाहौल स्पीति और मंडी में यह संख्या 1009 प्रति 1000  मतदाता हैं। कांगड़ा संसदीय क्षेत्र में 1874 मतदान केंद्र हैं, जहां मतदाताओं की कुल संख्या 1427338 होगी। मंडी संसदीय क्षेत्र में 2079 मतदान केंद्र और 1281462 मतदाता जबकि हमीरपुर संसदीय क्षेत्र में 1764 मतदान केंद्रों और 1362269  मतदाता और शिमला संसदीय क्षेत्र में 2006 मतदान केंद्र और 1250085 मतदाता हैं। निष्पक्ष मतदान के लिए प्रदेश में 207 फ्लाइंग स्क्वायड बनाए गए हैं।