हिंदी का सम्मान कभी कम न होगा: हिमानी | Tehelka Hindi

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हिंदी का सम्मान कभी कम न होगा: हिमानी

2018-04-15 , Issue 07 Volume 10

हालांकि आज किसी व्यक्ति की काबिलियत उसके अंग्रेजी ज्ञान से आंकी जाती है, तब भी हिंदी में अच्छा साहित्य लिखा और पढ़ा जा रहा है, लेखिका एम जोशी हिमानी ने तहलका को बताया। उत्तराखंड में जन्मी हिमानी हिंदी कहानीकारों में आज जाना माना नाम है। वर्ष 1991 में उनकी पहली कहानी अधिकार एक साप्ताहिक में छपी थी हंसा आएगी ज़रूर और पिनड्रॉप साइलेंस जैसे संग्रह प्रकाशित होने तक हिमानी के लेखन में एक बात बारंबार मिलती है वह है उनके पात्रों का सामान्य जीवन और रोज़मर्रा की जि़न्दगी से उनका जूझना। ‘सभी कहानियों के पात्र तथा घटनायें मेरे आसपास की होती हैं,’ हिमानी ने कहा। अब्दुल वासे से हुई लेखिका की बातचीत के कुछ अंश:

आपको लिखने का शौक कब और कैसे हुआ?
बचपन से मैंने अपने घर में ‘कल्याण’ पत्रिका को आते देखा था। मैं उसके रंगीन चित्रों के प्रति अत्यंत आकर्षित रहती थी। मेरे जीवन में ‘कल्याण’ मासिक तथा वार्षिक ‘कल्याण’ ग्रन्थ ने पुस्तकों के प्रति जिज्ञासा तथा प्रेम को बढ़ाया। मैं पन्द्रह वर्ष की अवस्था में हाईस्कूल करने के बाद गांव से लखनऊ आ गई थी। यहां के खुले वातावरण व मुझे मिली स्वतंत्रता ने मुझे पुस्तकों का दिवाना बना दिया। अपने जीवन में सबसे पहले मैंने शरत्चन्द्र का उपन्यास ‘देवदास’ पढ़ा था।
लेखन की तरफ धीरे धीरे मेरा झुकाव बढ़ा। कुछ बाल कहानियां लिखीं जो स्वतंत्र भारत, नवजीवन सरीखे पत्रों के रविवारीय परिशिष्टों में छपीं।
वर्ष 1991 में मेरी पहली कहानी अधिकार साप्ताहिक हिन्दुस्तान में छपी। बाद में यह कहानी उस वर्ष की श्रेष्ठ कहानी संग्रह में छपने के लिए चुनी गई और प्रकाशित हुई।

कहा जा रहा है कि पिन ड्राप साइलेंस नामक कहानियों का संग्रह आपको मंझी हुई कहानीकार के रूप में पेश करता है। इन नौ कहानियों में आपको कौन सी कहानी सबसे ज़्यादा अच्छी लगती है?
पिनड्राप साइलेंस की सारी कहानियां मेरे दिल के करीब हैं इसलिए किसी एक को सबसे अच्छी कहना मेरे लिये नामुमकिन है। इन सभी कहानियों के पात्र तथा घटनायें मेरे आसपास की हैं।
कहानी गियर वाली साइकिल के पात्र मौर्या साहब तो मेरे सीनियर रहे हैं। उन जैसा व्यक्तित्व मैंने जिंदगी में कहीं और नहीं देखा। इसलिए मुझे उस कहानी को लिखने के लिए बहुत मेहनत नहीं करनी पड़ी। मौर्या जी को मैं याद करती रही और लिखती रही ज्यों का त्यों। मौर्या जी के अनुरोध पर मुझे पात्र का नाम भी ज्यों का त्यों रखना पड़ा। मौर्या जी रिटायर हो गये हैं। जब भी मिलते हैं कहते हैं- आपने मुझे अमर कर दिया।
पिछले साल मैं लन्दन गई थी। वहां मेरे मित्र बीबीसी के पूर्व प्रोड्यूसर, एंकर ललित मोहन जोशी ने ‘गियर वाली साईकिलÓ का पाठ भी मुझसे कराया था। मौर्या जी वर्षों पहले सूचना विभाग में जोशी के भी सहयोगी रह चुके थे।
मिलाई, अधिकार, आफिस का आखिरी दिन, राबर्ट तुम कहां, हे रामावतार। .. सभी कहानियों के पात्र मैंने अपने इर्द गिर्द से उठाये हैं इसलिए किसे नंबर एक पर रखूं?

हंसा आएगी ज़रूर लिखने के पीछे आपकी क्या मंशा थी? कहानी और इसके पात्र काल्पनिक हैं या आपके जीवन पर आधारित है?
हंसा का चरित्र कोई एक पात्र नहीं है। कई पात्रों का निचोड़ है। हंसा आयेगी जरूर मेरे जीवन की कहानी कतई नहीं है। हां उसे प्रामाणिक बनाने के लिए मैंने उसे आत्मकथात्मक शैली में जरूर लिखा है।
मैं भारतीय थल सेना के सैनिक रहे अपने पिता की जन्मजन्मातर तक ऋणी रहूंगी, जिन्होंने मुझे कालेज में पढऩे का मौका दिया, मर्दों के बीच में जाकर नौकरी करने का अवसर दिया, जिस कारण मैं अपने नज़रिए से इस दुनिया को देख पाई और खुद का और जरूरत पडऩे पर दूसरों का भी संबल बन पाई।
मैं अपने खानदान की पहली स्त्री हूं जो शासकीय सेवा में है। यह संभव हुआ, मेरे माता पिता के त्याग और प्रोत्साहन के कारण।
मैंने हमेशा महसूस किया औरतों का शोषण कई प्रकार से और कई स्तरों पर होता रहा है और शायद होता रहेगा। आज कई कानून बन गये हैं, समाज में जागरूकता आई है फिर भी हर तरह स्त्री ही दु:ख भोगती है।
यह उपन्यास मैंने अपने बालपन में देखी सच्ची घटना से प्रेरित होकर लिखा है। बरबाद हो चुके रजवाड़ा परिवार का संभ्रान्त व्यक्ति अपने पुत्र की ग़ैरमौजूदगी में अपनी नवविवाहिता पुत्रवधू से संबंध बनाता है जिसकी परिणिति वधू के गर्भवती होने के रूप में होती है। राज खुलता है। पंचों के सामने बहू सच बता देती है। उसके मायके वालों को बुलाया जाता है। वे बेटी को ले जाने से साफ इंकार कर देते हैं।
अंतत: उस सत्रह अठारह साल की नववधू को जबर्दस्ती नारी निकेतन भेज दिया जाता है जहां वह पुत्र को जन्म देती है। बाद में कुछ वर्ष बाद एक सरदार ट्रक ड्राइवर उसको ब्याह कर पंजाब लेकर चला जाता है। फिर क्या हुआ उसके साथ कोई नहीं जानता।
मैं आज भी उस औरत की चीत्कार को महसूस करती हूं जब वह रो रोकर घर से न निकाले जाने की गुहार लगा रही थी। वह संभ्रान्त व्यक्ति कुछ समय के सामाजिक बहिष्कार के बाद भी हमेशा अपने घर में रहा। उसके पुत्र तक ने अपने पिता से कभी कोई प्रश्र नहीं किया।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 10 Issue 07, Dated 15 April 2018)

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