सेना की पकड़ से बाहर नहीं हैं इमरान खान

0
1051

यह सच है कि देश के गठन के बाद 71 सालों से पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति में पाकिस्तानी सेना एक प्रमुख भूमिका निभाती रही है। यह 30 साल से अधिक समय तक प्रत्यक्ष सेना शासन के अधीन रहा और यह भी सुनिश्चित है कि चुनी हुई सरकार भी इसके अप्रत्यक्ष नियंत्रण में है।

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि देश के चुने हुए किसी भी प्रधानमंत्री ने पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा नही किया है और देश की स्थापना के बाद कम से कम 30 प्रधानमंत्री हुए हैं। इसके अलावा इस अवधि के दौरान 15 राष्ट्रपति और तीन संविधानों को भी देखा गया है। इतिहास में यह दूसरी बार है कि चुने हुए प्रधानमंत्री ने स्थान ग्रहण किया है।

हाल ही में सपंन्न हुए चुनावों के अभियान में यह स्पष्ट हुआ कि सेना क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने इमरान खान की अगुवाई वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) का समर्थन कर रही थी। इसलिए पाकिस्तान नेशनल असेंबली के चुनावों के आए नतीजों से कोई हैरानी नहीं हुई। इमरान खान ने न केवल सेना के साथ गठबंधन किया बल्कि वे उसकी भाषा भी बोल रहे थे। पाकिस्तान के मुस्लिम-लीग-नवाज (पीएमएलएन) के अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी नवाज शरीफ को भारत के समर्थक और सेना विरोधी के रूप में पेश कर रहे थे। मतदान से एक दिन पहले भी वह यह कह रहे थे कि नवाज शरीफ के दिमाग में पाकिस्तान की बजाए ‘भारत के हित’ हैं।

यह सर्वविदित है कि जब नवाज शरीफ प्रधानमंत्री थे तो वे खुद को महत्वपूर्ण साबित करने की कोशिश कर रहे थे। यह शक्तिशाली सेना को पंसद नहीं था। जिस तरह से उन्हें प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए मज़बूर किया गया और उन्हें चुनाव लडऩे और जीवन भर कोई सार्वजनिक पद ग्रहण करने से रोका गया इससे स्पष्ट है कि उन्हें जानबूझकर हटाया गया है। उनके खिलाफ यह आरोप था कि उन्होंने अपने आयकर रिटर्न में यह घोषित नहीं किया था कि उन्हें बेटे की कंपनी से कुछ धन मिला था। उन्हें न तो धन मिला था और न ही उनके खिलाफ कोई भ्रष्टाचार का आरोप था। फिर भी देश की सर्वोच्च अदालत ने उन्हें शरियत कानून के तहत ईमानदार नहीं होने के कारण दोषी ठहराया। इसने उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए अयोग्य घोषित कर दिया और उन्हें कार्यालय छोडऩे के लिए मज़बूर कर दिया। यह व्यापक तौर पर माना जाता है कि सेना ने न्यायपालिका के माध्यम से कार्रवाई की थी और यह ”न्यायिक तख्तापलट’ था।

जैसे इतना ही काफी नहीं था, राष्ट्रीय उत्तरदायित्व आयोग ने फैसला सुनाया कि उन्होंने लंदन में ‘अनधिकृत धन’ से अपार्टमेंट खरीदे थे और उन्हें 10 साल जेल की सज़ा सुनाई। उनकी बेटी मरियम जिसे उनका उत्तराधिकारी भी माना जाता है उसे सात साल जेल की सज़ा दी गई। ‘पनामा पेपर’ के माध्यम से यह खुलासा किया गया था जिसमें यह बताया गया था कि शरीफ परिवार द्वारा विदेशों में रखे अवैध धन से अपार्टमेंट खरीदे गए थे। उनके खिलाफ भ्रष्टाचार का कोई आरोप साबित नहीं हुआ।

हाल के चुनाव में उनका किसी भी सार्वजनिक कार्यालय के लिए चुनाव लडऩे में उनकी अयोग्ता और जेल की सज़ा मुख्य मुद्दा बन गया था। वास्तव में उन्होंने लंदन में बीमार पत्नी को छोड़कर चुनावों की पूर्व संध्या पर पाकिस्तान पहुंच कर सहानुभूतिपूर्ण वोट बटोरने का एक बड़ा दांव चला था। जैसे ही वे और उनकी बेटी मरियम पाकिस्तान पहुंचे उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि उनका यह दाव असफल हो गया और उनकी पार्टी चुनाव हार गई। अब वह लंबे समय तक जेल में रहेंगे।

जबकि पीएमएल की पंजाब प्रांत में महत्वपूर्ण पकड़ रही है जो अपने आकार और सीटों के संख्या के कारण देश की राजनीति को प्रभावित करता है। पूर्व मुख्यमंत्री और नवाज शरीफ के भाई शाहबाज शरीफ की हार के साथ शरीफ परिवार की पकड़ कमज़ोर हो गई है। उन्हें प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया जाता यदि पार्टी ने नेशनल असेंबली चुनाव जीता होता।

भारत और भारतीयों के साथ उनके मेलजोल के कारण इमरान खान और उनकी पार्टी की जीत अपेक्षाकृत भारत के लिए लाभदायक हो सकती है। पाकिस्तान का अन्य कोई प्रधानमंत्री इमरान खान की तरह लंबी अवधि के लिए भारत में नहीं आया। राष्ट्रीय क्रिकेट खिलाड़ी के रूप में और फिर राष्ट्रीय टीम के कप्तान के रूप में अक्सर भारत आते रहे और यहां उनके मित्रों और प्रशंसकों का विस्तृत दायरा है। अपने क्रिकेट करियर के बाद भी वह देश के विशेषज्ञ कमेंटेटर के रूप मे भारत आते रहे हैं। वह दोनों देशों के बीच संबंधों के सुधार के बड़े समर्थक रहे हैं और उन्होंने संबंधों को मज़बूत करने के लिए इंग्लैंड और आस्ट्रेलिया के बीच ‘एशेज कप’ की तरह नियमित क्रिकेट टूर्नामेंट का सुझाव भी दिया था।

हालांकि चुनाव अभियान के दौरान भारत के प्रति उनके दृष्टिकोण में विशेष बदलाव आया। उन्होंने भारत की आलोचना की और भारत पर पाकिस्तान की सेना को कमज़ोर करने के लिए सब कुछ करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि नवाज शरीफ ने भी मुंबई हमले में पाकिस्तान की भूमिका को स्वीकार कर ऐसा करने की कोशिश की है। दिलचस्प बात यह है कि इस बार चुनावी दौड़ में भारत अतीत की तरह प्रचार अभियान को मुख्य केंद्र नहीं था। मैदान मे सभी तीन प्रमुख दलों ने भारत के साथ बातचीत की मांग की और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के सुझाव के अनुसार कश्मीर मुद्दे को सुलझाने की मांग की।

इमरान खान के नेतृत्व वाली पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के दो मुख्य प्रतिद्वंद्वियों पाकिस्तान मुस्लिम-लीग-नवाज और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) ने अपनी हार के लिए बड़े पैमाने पर सेना द्वार की गई हेरा-फेरी और हस्तक्षेप को जिम्मेवार ठहराया है। उन्होंने नतीजों को मानने से इंकार किया इसके अलावा वे और कर भी क्या सकते थे। सेना ने दोनों पार्टियों का लंबे समय तक परीक्षण किया और वे किसी ऐसे व्यक्ति को वापस लेना चाहते थे तो उनके दबाव में रहे। यह देखना बाकी है कि इमरान खान अपने अनुभव और अंतरराष्ट्रीय समझ के साथ भारत के साथ अपने संबंधों को सुधारेंगे या बाड़ लगाने की कोशिश करेंगे। यह तब तक संभव नहीं जब तक वह अपनी राजनीतिक शक्ति पा नहीं लेते।

हालांंिक भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए यह बड़ी बात है कि पाकिस्तानी मतदाताओं ने चरमपंथी तत्वों को बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इससे भारत के विभिन्न हिस्सों में चरमपंथी तत्वों के लिए समर्थन में कमी आई है। पाकिस्तानी मतदाताओं ने ऐसे तत्वों के प्रतिनिधियों को खारिज कर दिया है।

मुंबई हमले के मास्टर माइंड और अंतरराष्ट्रीय आतंकी हाफिज सईद ने अल्लाह-हो-अकबर तेहरिक (एएटी) के बैनर तले नेशनल असेंबली और प्रांतीय विधायिकाओं के लिए 265 उम्मीदवारों को चुनाव में उतारा। उनके बेटे और दामाद भी उम्मीदवार थे। पर पार्टी को हार मिली। जो इस तरह के आतंकवादी समूहों के लिए जन समर्थन की कमी को दर्शाता है। हालांकि पार्टी को सेना का समर्थन भी प्राप्त था। परन्तु इसके खिलाफ जनता की राय एक सबक है कि आम लोग हिंसा से घृणा करते हैं वे शांति चाहते हैं।

इमरान खान जानते हैं कि वे सेना की मदद और समर्थन के बिना लंबे समय तक इस पद पर रहने की वे उम्मीद नहीं कर सकते, इसलिए उन्हें नाजुक संतुलन बनाना होगा। यही कारण है कि भारत निकट भविष्य में किसी भी प्रमुख नीतिगत बदलाव की उम्मीद नहीं कर सकता है।

जबकि इमरान खान को स्थापित होने और अपने पांव जमाने के लिए समय चाहिए, भारत पाकिस्तान के साथ अपने संबंधों के बारे में किसी भी प्रकार के नीति बदलाव की उम्मीद नही कर सकता है, इस प्रकार पड़ोसी देश में सरकार में बदलाव होने के बावजूद ”शासन परिवर्तन’’ नहीं हुआ है और भारत को इसके साथ संबंधों में सुधार की संभावनाओं पर ज़्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए।