सुप्रीम कोर्ट के फैसले से मिला बढ़ावा खोजी पत्रकारिता को

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समाज की भलाई के लिए एक पत्रकार को सच्चाई की तह तक जाना ही चाहिए। यही सोच ‘तहलका’ की भी रही है। राफेल जेट विमान सौदे के समझौते से संबंधित तमाम दस्तावेजों की समसामयिकता जांचने के लिए मीडिया में प्रकाशित दस्तावेजों को भी जांच के दायरे में शामिल करके पूरे मामले को पूरी समग्रता से देखने जानने का सुप्रीम कोर्ट का फैसला नि:संदेह खोजी पत्रकारिता के लिए बड़ा कदम है।

दिसंबर में ही एपेक्स कोर्ट ने वह याचिका रद्द कर दी थी जिसमें रु पए 59000 करोड़ के राफेल विमान सौदे में व्यवसायिक पक्षपात का आरोप लगाया गया था। यह सौदा 2016 में फ्रांस के साथ 36 जेट खरीदने को लेकर हुआ था। इस सौदे की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट के तीन सदस्यों की पीठ कर रही थी। इसकी अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई कर रहे थे। उनका फैसला स्वागत योग्य है।

सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी आपत्तियों को खारिज कर दिया जिनमें कहा गया था कि ‘गुम हो गए दस्तावेज़ों’ का संज्ञान न लिया जाए। रक्षा मंत्रालय ने भी समीक्षा बैठक पर इस आधार पर आपत्ति जताई कि ‘गोपनीय मामला जनता की परिधि में आ जाएगा। अदालत ने कहा कि बतौर साक्ष्य इसकी प्रांसगिकता है।

अदालत ने कहा, ‘ऑफीशियल सीके्रटस एक्ट’ में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि जिसके आधार पर शासन एक्जक्यूटिव ‘गोपनीय कागज़ात’ का प्रकाशन रोक सकता हो। अपनी जांच में उन दस्तावेजों को शामिल करना अनुचित नहीं है जिनके बारे में पहले कहा गया था कि वे ‘खो’ गए हैं। फिर इनकी गैरकानूनी तौर पर ‘फोटो कापी’ किए जाने की बात कही गई। इन बातों को दरकिनार कर इन्हें देखा जाना चाहिए।

इविडेंस एक्ट (साक्ष्य कानून) और ऑफीशियल सीक्रेट्स एक्ट (शासकीय गोपनीय कानून) के तहत भी कुछ याचिकाएं बतौर दावे के आई थीं लेकिन अदालत ने उस सिद्धांत को ही सर्वोपरि माना जिसमें यह आवश्यक नहीं कि यह जाना जाए कि साक्ष्य कब, कहां और कैसे मिला।

दस्तावेजों को बतौर साक्ष्य विचारार्थ लेना प्र्रेस की आज़ादी को मान्यता देता है और जनहित में इसके महत्व को कबूल करता है। इस फैसले से यह भी स्पष्ट है कि ऑफीशियल सीक्रेट्स एक्ट लगा कर कानूनी छानबीन या जनहित के मुद्दों को कम करके आंका नहीं जा सकता।

यदि सरकारी कागजात लीक होते हैं तो उसकी जिम्मेदारी उस पर आनी चाहिए जिसने उसे लीक किया। इसकी जिम्मेदारी को उन मीडिया घरानों पर नहीं डाला जा सकता जिन्होंने उसे प्रकाशित या प्रसारित किया। यह नहीं है कि गुम हो गए दस्तावेज हासिल कैसे किए गए बल्कि यह देखना ज्य़ादा ज़रूरी है कि उन दस्तावेजों में क्या महत्वपूर्ण है। ‘राष्ट्रीय हित’ के नारों से अदालत की छानबीन नहीं रु केगी।

ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर ‘अभिव्यक्ति की आज़ादी’ भी बरकरार रखी। इन्फारमेशन टेक्नॉलॉजी एक्ट की धारा 66ए जिसका इस्तेमाल पुलिस, सरकार की आलोचना करने वालों और राजनीतिक नेताओं की गिरफ्तारी के लिए करती थी उस कानूनी धारा को सुप्रीमकोर्ट ने खत्म कर दिया। अदालत ने माना कि इस एक्ट की भाषा ऐसी है कि इसका उपयोग गलत तरीके से भी किया जा सकता है। इसलिए तार्किक पाबंदियों के साथ इसे संविधान की धारा 19(2) के ही तहत  रखा है।

सुप्रीमकोर्ट के फैसले के मद्देनज़र सरकार को इसकी साक्ष्म जांच परख का स्वागत करना चाहिए, क्योंकि राफेल जेट सौदे पर अंतिम फैसला अभी आना है।