सुनयना: देवदूत की करूण कविता

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पिछले दिनों सीबीएसई का 12वीं का परिणाम आया। पहला स्थान पाने वाली दोनों लड़कियों के 500 में से 499 अंक आए। इसके बाद आईसीएस का परिणाम आया। इसमें प्रथम स्थान पाने वाली लड़की के इतिहास में पहली बार 100 प्रतिशत अंक आए। अखबारों के पन्नों पर इन बच्चों और इनके पालकों की रंगीन तस्वीरें छपी। चेहरे खुशी से चमक रहे थे। जाहिर है ऐसा होना भी चाहिए। ऐसे सारे बच्चों ने बताया कि उन्होंने कितनी लगन से दिन में कई-कई घंटे पढ़ाई की है। अधिकांश बच्चों ने बताया कि उन्होंने सबसे बड़ा त्याग किया है कि इस दिनों वे इंटरनेट पर सोशल साइट्स से दूरी बनाए हुए हैं। यह एक भारत है। वहीं जो दूसरा भारत है वह कुछ और बयान कर रहा है। वहां भी बच्चे हैं। वे भी पढ़ते हैं। उनके भी माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, सब कोई हैं पर फर्क यह है कि सब शारीरिक श्रम करके, खेती आदि करके अपना जीवन चलाते हैं। लगातार अभाव की जि़ंदगी जी रहे हैं।

पिछले दिनों एनडीटीवी के डॉ. प्रणव राय ने उत्तरप्रदेश के अमरैली जिले के मोहनलालगंज में सातवीं में पढऩे वाली एक लड़की सुनयना रावत का लंबा साक्षात्कार प्रसारित किया। यह साक्षात्कार भारत के प्रत्येक राजनीतिक दल के चुनावी घोषणापत्र और कार्यकलापों को उधेड़कर रख देता है। सुनयना, बोलती नहीं, गाती है। वह एक कविता की तरह है। दु:ख भरी कविता मगर नैराश्य नहीं, आशा से भरपूर लबालब भरी हुई। वह जिस तरह से बातों को रखती और समझाती है उससे लगता है जैसे कि कोई अदृश्य वैचारिक शक्ति उसमें प्रवेश कर गई है। उसका हंसता-मुस्कुराता चेहरा उसके व उसके परिवार के सामने आ रही विषमताओं को एक दस्तावेज की तरह सप्रमाण प्रस्तुत करता है। उसका हर उत्तर अंधे, बहरे और गूंगे होते जा रहे भारतीय समाज के लिए  एक सबक है, एक चुनौती है। अपनी आज की स्थिति को बयान करते हुए वह कहती है, आज रोज़गार नहीं है। खेत खाली हैं। सब खेत खाली पड़े है रोजगार कैसे मिले? पहले घर चलाने लायक अनाज हो जाता था, अब नहीं होता। पहले फसल घर लाते थे। बेच भी लेते थे। बात को समझाते हुए वह बिना कटुता लाए बताती है, जब खाने को ही नहीं मिलेगा तो बेचेंगे क्या? इसके बाद वह अपनी उसी काव्यात्मक लहजे में जो कुछ करती है, वह दहला देता है। सुनयना कहती है, वैसे अगर जानवर बन गए सब, पूरे गांव के तो हम लोगों का बहुत फायदा रहेगा। इतना ही कहना है उसकी इस यंत्रणा के लिए जिम्मेदार गाय व अन्य पशुओं को लेकर वह बताती है, गाय बंधने लगे तो अच्छा है। एकाध साल  पहले तक ऐसा नहीं था लोग गाय बांधकर रखते थे। अब हम लोग खाद-पानी वगैरह डालकर फसल लगाते हैं, लेकिन गाय खा जाती हैं। बचा-खुचा हमें मिलता है। गाय भी क्या करें, उनको भी तो जीना है। गौशाला में पानी है तो चारा नहीं। क्या वहां मरने भेजें। सबको उन्हें चारा देना चाहिए, बांधना चाहिए।

यह तो एक प्रश्र का जवाब है जो सुनयना दे रही है। उसके पास अपनी समझ है। कोई बाहरी विचार उसे प्रभावित नहीं कर पाया है। वह सहज है। प्राइवेट स्कूल में अंगे्रजी मीडियम में पढऩा चाहती है। पर उसके पास जूते नहीं है। किताबों के लिए भी पैसे नहीं है। 300 रुपए प्रतिमाह फीस के भी नहीं है। पर वह डॉक्टर बनना चाहती है। कम पैसों में गांव वालों का इलाज करना चाहती है। शहर के डॉक्टर बहुत पैसा लेते हैं। खलील जिब्रान की पंक्तियां हैं ‘आपके बच्चे/सिर्फ आपके नहीं हैं/जिंदगी ने खुद ही को चाहा है/खुद इंतजार करती बैठी है/वे बच्चे उसी कामना उसी इंतजार की संतानें हैं/’

पर सुनयना तो इस उम्र में सिर्फ अपने परिवार की नहीं पूरे गांव की सोच रही है। सिर्फ उसका अपना परिवार नहीं, पूरा गांव और उसकी भुखमरी की स्थिति में ले जाने वाली गाय भी उसकी अपनी है। वो एक बार भी उन गायों से नाराज़गी नहीं जताती। वह सहजीवन व सह अस्तित्व को न सिर्फ जानती है, बल्कि उसे जीती भी है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, मायावती, अखिलेश यादव और तमाम नेताओं के पास सुनयना के लिए, उसके भविष्य के लिए शायद आश्वासनों के अलावा और कुछ नहीं है। राहुल गांधी ने इस साक्षात्कार पर टिप्पणी भी की है। परन्तु बड़ी बात यह है कि आखिर हम अपने देश के बच्चों के साथ कर क्या रहे हैं? अगर 12 साल के बच्चे की कल्पना में जानवर बन जाने का विचार आ रहा है तो यह बेहद शर्म की बात है। सुनयना बता रही है कि गांव में मनरेगा बंद है। वह कहती है जब घर में खाने को भी नहीं है तो क्या बतायें कि कितनी आमदनी है। एक गैस सिलेंडर उसके परिवार को मायावती ने दिया, एक उन्होंने स्वयं खरीदा और एक मोदी ने दिया। पर तीनों खाली हैं, चूल्हे पर खाना बन रहा है। सिलेंडर 900 रु  का आता है और खरीदने को पैसे नहीं है। परन्तु हमने एक ऐसी व्यवस्था खड़ी कर दी है, जिसमें गायों की संख्या का पता लगाने के लिए पहले उनके गांव गिने जाते हैं और फिर उनमें चार का भाग दिया जाता है। पहले 900-1000 सिलेंडर के भरिए। फिर खाते में जब भी गैस कंपनी या बैंक चाहे, सब्सिडी का धन वापस आएगा। सीधे नकद हस्तांतरण की वकालत करने वाले सोचें कि यदि इसे राशन पर भी लागू कर दिया गया तो लाखों लोग भूखे मर जाएंगे। झारखंड में इस विभीषिका को देख भी चुके हैं। वास्तविकता तो यही है कि सुनयना एक दुखान्त कविता की तरह भारतीय ग्रामीण समाज की जो तस्वीर प्रस्तुत कर रही है, वह हम सबके लिए एक सबक है। अभी वह किसी विचारधारा की प्रशंसक या विरोधी नहीं है। वह किसी भक्त मंडली की सदस्य भी नहीं है। उनके अनुभव इतने पवित्र हैं कि उन पर संदेह किया ही नहीं जा सकता। परन्तु क्या उसकी बात सुनी जाएगी?

स्पेनी कवि फेदेरिको मायोर लिखते हंै ‘तेरे बच्चे की आंखे/सब देख चुकी हैं, /भयंकर विभीषिका/हिंसा की/भूख की/युद्ध की/देख चुकी हैं/घाव, खून, घृणा, निर्दयता।’

हमारे आपके बच्चे अपनी पढ़ाई में जुटे एक बेहतर भविष्य, जो उन्हें शायद अमेरिका में मिलेगा, के लिए प्रयासरत हैं। पर सुनयना अपने घर से एक किलोमीटर दूर अपने खेत में पहुंचने को व्याकुल है। वहां उसकी मां है। उसे स्वयं खेत में बचा-खुचा भूसा भरकर लाना है, जिससे कि उसके घर में बंधी चार गायों को पेट भर सके। सुनयना का यह साक्षात्कार पत्रकारिता को सम्मान प्रदान कर रहा है और समझा रहा है कि वास्तव में इसका स्वरूप क्या होना चाहिए। सुनयना की आवाज और लहजा बेहद सौम्य और मिठास भरा है। परन्तु उसके सवाल उतने ही कठोर व तीखे हैं। किसके पास इनका समाधान है? राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा है, ‘मोदी जी, देखिए आपकी नीतियों ने सुनयना के साथ क्या किया है।’ वे आगे लिखते हैं ‘न्याय उसके साहस और धैर्य के प्रति सम्मान है। न्याय गरीबी की बेडिय़ों को तोड़ेगा। न्याय सुनयना और उसके जैसी करोड़ों का जीवन रूपांतरित करेगा’ सवाल यह है कि यदि कांग्रेस सत्ता में नहीं आई तो सुनयना का जीवन नहीं बदलेगा?

कोशिश करनी होगी कि किसी भी राजनीतिक या सामाजिक परिस्थिति में सुनयना की स्थिति बेहतर हो। उसके अंदर जो कोमलतम है, निर्मलतम है, वह बची रहे क्योंकि वही भारत का भविष्य है। बाकी सब गैरज़रूरी है। इस साक्षात्कार ने अवसर दिया है कि देश अपनी प्रत्येक सुनयना और सुनयन से माफी मांगे। वे सारे बच्चे जो आज बेहतर स्थिति में हैं, सुनयना जैसों के बारे में सोचे। उम्मीद अब बच्चों से ही है। एक बार फिर एनडीटीवी के डॉ. प्रणय राय को धन्यवाद। जापानी कवि तानिकावा सुंतारों कहते हैं,

‘एक बच्चा अभी भी है कुछ आशा/यहां तक कि हमारे दायित्व से बोझिल पृथ्वी पर/हमारे सारे भय के बावजूद/एक बच्चा अभी भी है खुशी की वजह/कितना भी अविश्वास हम क्यों न करें/ईश्वर के होने पर/बच्चा फिर भी है एक देवदूत/’

सुनयना के सिर पर रखे भूसे के बोरे से डगमगाती सुनयना के साथ भारत भी डगमगा रहा है।