‘साहित्य को विमर्शों में घटाकर नहीं देखा जा सकता’

हिंदी-कविता में 1990 के बाद तेजी से स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श व हाशिए पर पड़े मानव-समूहों की चिंताएं उभरी हैं. आप इन विभिन्न विमर्शों के उभार को तथा उन पर केंद्रित साहित्यिक आलोचना को किस तरह देखते हैं?
मैं इन सारे विमर्शों को 1990 के बाद के सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों से जोड़कर देखना चाहूंगा. ये सब अपना-अपना हक मांग रहे हैं, जो उचित है. यह लोकतंत्र का विकास है. लोकतंत्र का जिस तरह का विकास राजनीतिक व्यवस्था कर रही है और जो संसद व कार्यपालिका के माध्यम से सामने आ रहा है, वह शंकित करता है. उसके भीतर से जो असंतोष पैदा हो रहा है, उसी असंतोष की उपज हैं ये सारे आंदोलन. मैं इन्हें इसी स्वरूप में देखता हूं और इन विमर्शों का काफी हद तक स्वागत करता हूं. लेकिन साहित्य को विमर्शों में घटाकर नहीं देखा जा सकता. उस पैमाने पर हम साहित्य का मूल्यांकन कर ही नहीं सकते. यह आदिवासी कविता है, इसलिए अच्छी है, यह पैमाना ठीक नहीं. चूंकि यह अच्छी कविता है, इसलिए अच्छी कविता है, यही पैमाना उचित होगा.

दलित-विमर्श की दृष्टि से गद्य-साहित्य की अपेक्षा हिंदी-कविता पीछे रही है. आप इसका कोई विशेष कारण पाते हैं?
दलित लेखक सीधे अपनी वे बातें कहते हैं, जिनसे हम इतने परिचित नहीं हैं. मैं अपने गांव में उन लोगों को देखा करता था, जो पशुओं का चमड़ा निकालने का काम करते थे. जब मैं उनके पास मरा हुआ पशु लेकर जाता था तो यही समझाता था कि वे चमड़े को निकालकर उससे जूते या अन्य सामान बनाते होंगे. बाद में तुलसीराम की आत्मकथा में पढ़ा कि वे उस मरे हुए पशु का मांस भी निकालकर मोहल्ले में बांटते थे और वह खाया जाता था. यह मेरे लिए शर्म से जमीन में गड़ जाने वाला झटका था. यह झटका देने वाली सचाई मुझे उनकी आत्मकथा से ही पता चली. ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियां भी बड़े अच्छे रूप में सामने आईं. उनकी कविताओं ने भी अच्छा योगदान दिया है. मैं इसे विमर्श नहीं कहूंगा. केवल एक प्रवृत्ति मानूंगा. यह साहित्य की धारा का हिस्सा है, इसे विमर्श कहकर घटाया नहीं जा सकता. मैं यह जरूर कहूंगा कि मराठी दलित कविता ने अब स्थिर राह पा ली है और वह अपनी पूरी कविता की परंपरा को, जो दलितों ने नहीं लिखी है, समझने की कोशिश कर रही है. ऐसा हिंदी की दलित-कविता के साथ नहीं हुआ. शायद आगे कभी हो.

स्त्री-विमर्श आज की कविता के केंद्र में है. समाज में स्त्रियों की समस्याओं के प्रति काफी जागरूकता भी आयी है. आपकी क्या धारणा है?
स्त्री भी हमारे समाज में दलितों की तरह भयातीत थी. अब वह मुक्त होने की कोशिश कर रही है. लेकिन अभी भी तमाम सामाजिक वर्जनाएं हैं जो काम कर रही हैं. इसके अनेक भेद-उपभेद हैं. जब समाज में जनतांत्रिक चेतना पैदा हुई तो उन्हें भी लगा कि उनके भी कुछ हक हैं, अधिकार हैं. वे अपने अधिकारों से वंचित हैं. यह अधिकार की चेतना उनके भीतर प्रबल होती जा रही है. संपत्ति में अधिकार, परिवार में अधिकार, कार्य-क्षेत्र में अधिकार, समाज व राजनीति में अधिकार आदि-आदि. स्त्रियों ने समाज की विसंगतियों के बारे में काफी कुछ लिखा है. कई स्त्री रचनाकारों ने बहुत अच्छी कविताएं लिखी हैं. कहानियां तथा उपन्यास भी लिखे जा रहे हैं.

कुछ लोग कहते हैं कि आपने कविताओं में स्त्री-विमर्श को उतना स्थान नहीं दिया, जितना आज के समय की अपेक्षा है.
हो सकता है कि मेरे अपने सामाजिक परिवेश की सीमा होने के कारण ऐसा हुआ हो. मैं कोशिश यही करता हूं कि इन सरोकारों पर निरंतर विचार करूं. मेरी रचनाओं में दलित-प्रश्नों पर काफी ध्यान गया है. स्त्रियां मेरे यहां शोषिता-प्रताड़िता के रूप में कम आई हैं. लेकिन अन्य विविध रूपों में स्त्रियां भी मेरी रचनाओं में कई जगह आई हैं. ‘एक प्रेम कविता को पढ़कर’ कविता में स्त्री का एक बड़ा ही मार्मिक पक्ष सामने आया है. ‘नमक’ कविता भी स्त्री-पुरुष संबंधों पर केंद्रित है. मेरी कविताओं में मां के रूप में अनेक स्त्रियां आई हैं, क्योंकि मैं मां को स्त्री का एक बहुत ही महत्वपूर्ण रूप मानता हूं. मेरी कविताओं में मजदूर स्त्री का भी वर्णन है. स्त्री का केवल मध्यमवर्गीय रूप ही महत्वपूर्ण नहीं है.

कविता में विचार का होना कितना जरूरी है? आप इसकी अभिव्यक्ति के लिए किसी विचारधारा या वाद से जुड़े होने को कितना महत्वपूर्ण मानते हैं?
विचारधारा अलग चीज है, विचार अलग. विचारधारा को मैं छद्म-चेतना मानता हूं. विचार छद्म-चेतना नहीं है. विचार गलत हो सकता है, लेकिन वह छद्म है या धोखा है, ऐसा नहीं हो सकता. विचार कविता की अनिवार्यता है, केवल भाव कविता नहीं बन सकता. कविता के भाव में विचार हमेशा शामिल रहता है. बिना विचार के प्रगाढ़ भाव-बोध पैदा ही नहीं हो सकता. यदि होगा भी तो वह भावुकता में परिवर्तित हो जाएगा. भाव का अर्थ भावुकता नहीं है. भाव में विचार भी शामिल रहता है लेकिन आपको यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि हर कवि अपने ढंग से सोचता है, अपने विचार रखने की कोशिश करता है. मुक्तिबोध ने भी यही किया. अज्ञेय ने भी किया. आप उनके विचारों को अस्वीकार करने के लिए स्वतंत्र हैं. मैं विचारधारा या किसी वाद का समर्थन नहीं करता, क्योंकि सभी विचारधाराओं की सीमाएं होती है. कई संगठन बार जरूरी रचनात्मक आजादी नहीं दे पाते. पार्टियां नहीं दे पातीं. इसलिए पार्टी, संगठन, वाद, इन सबसे मुक्त होकर ही चलना चाहिए.

हमारा लोकतंत्र एक जटिल दौर से गुजर रहा है, जहां लोग एक बड़ा परिवर्तन चाहते हैं लेकिन उनकी सोच को समुचित नेतृत्व नहीं मिल पा रहा. आप इसे किस दिशा में जाता देख रहे हैं?
यह निश्चित ही चिंता का विषय है कि आज देश में कोई बड़ा आंदोलन क्यों नहीं उठ रहा ? हम केवल चुनाव तक ही सीमित होकर क्यों रह गए हैं. इस ढीले-ढाले जनतंत्र का क्या होगा, जो अपनी सारी शक्ति अंतत: तथाकथित चुनाव से ही अर्जित करता है. मैं चुनाव का विरोध नहीं कर रहा हूं, किंतु संकट यही है कि वह पूरी तरह से जनता के विचारों को प्रतिबिंबित नहीं कर पाता है. उसका जो भी परिणाम आता है, वह कैसे आता है, यह सभी लोग जानते हैं. मैं समझता हूं कि मनुष्य को स्वतंत्र रूप से सोचने के लिए अनुकूल परिस्थितियां हमें बनानी पड़ेंगी. इसमें कवि, लेखक, कलाकार अग्रणी भूमिका निभा सकते हैं. मैं अग्रिम दस्ते में नहीं हूं क्योंकि मैं बीते हुए समय का आदमी हूं. लेकिन एक बीते हुए समय के आदमी की तरह आने वाले समय की एक धमक सुनना चाहता हूं.

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