सालाना संकट बन चुका वायु प्रदूषण

देश में वायु प्रदूषण एक गम्भीर सलाना संकट बन गया है। इसे लेकर पर्यावरणविद् भी कहने लगे हैं कि शासन-प्रशासन इस समस्या का समाधान करने के बजाय हर साल सेमिनारों में लाखों-करोड़ों रुपये ख़र्च करके सिर्फ़ और सिर्फ़ प्रदूषण का रोना रोकर बचकर निकलने की कोशिश करते हैं। दो महीने का रोना रोने के बाद ख़ुद ही मौसम साफ़ होने लगता है और सब शान्त होकर बैठ जाते हैं। यह कहानी हर साल की है। अगर शासन-प्रशासन में बैठे ज़िम्मेदार लोग सेमिनारों के ज़रिये चिन्ता व्यक्त करने के बजाय प्रदूषण कम करने की दिशा में काम करें, तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। उनका कहना है कि प्रदूषण की ज़हरीली धुन्ध के दंश का सामना लोगों को हर साल इसी तरह करना पड़ता है।

विडम्बना यह है कि जब हर साल अक्टूबर माह में वायु प्रदूषण कहर बनकर उभरता है और लोगों को साँस तक लेने में दिक़्क़त होने लगती है, स्कूलों और दफ़्तरों को बन्द करना पड़ता है। तब भी शासन-प्रशासन द्वारा वायु प्रदूषण से निपटने के उचित उपाय न करते हुए, इस ओर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना कि देना चाहिए। बल्कि सियासत करके उन पहलुओं पर बहस की जाती है, जिससे उनका ख़ुद का गला बच सके। ज़्यादा-से-ज़्यादा किसानों पर पराली जलाने को लेकर ठीकरा फोड़ दिया जाता है।

हालाँकि सर्वोच्च न्यायालय इस ओर हर साल केंद्र और दिल्ली सरकार का ध्यान दिलाता है और दोनों सरकारों की फटकार भी लगाता है। इस बार तो सर्वोच्च न्यायालय ने बाक़ायदा इस बात को लेकर भी दिल्ली सरकार और विशेषकर केंद्र सरकार की फटकार लगायी कि किसानों को दोष देना आपने फैशन बना रखा है। बेहतर हो जल्द-से-जल्द प्रदूषण कम करने के उपाय किये जाएँ। बता दें कि इस साल सर्वोच्च न्यायालय ने दीपावली पर पटाखों पर रोक का आदेश दिया था; लेकिन इस बार जिस तरह पटाखे जलाये गये, उससे एक बात तो यह साफ़ हुई कि सरकारें अपने वोट बैंक के चक्कर में धार्मिक मामलों में लोगों को छेडऩा नहीं चाहतीं।

हालाँकि इस विषय पर लोगों को ही सोचना होगा कि पटाखों से उन्हें ख़ुद को कितना नुक़सान होता है। बहुत हो, तो दस्तूर के तौर पर एक-दो पटाखा जलाकर भी दीपावली मना सकते हैं। वैसे तो दीपावली दीपों यानी प्रकाश का त्योहार है, न कि पटाखों का। लेकिन पटाखे जलाना और वो भी दूसरे से ज़्यादा जलाना अधिकतर लोगों के लिए अब नाक का सवाल-सा बन गया है। यही वजह है कि हर साल दीपावली पर करोड़ों पटाखे हमारे देश में लोग फोड़ देते हैं, जिसके चलते धुआँ-ही-धुआँ वातारण में छा जाता है, जो हर किसी को विकट नुक़सान पहुँचाता है।

हैरत की बात यह रही कि हर साल दिल्ली बनी गैस चैंबर जैसी ख़बरों की हर रोज़ भरमार देखने को मिलती है, जबकि सच्चाई यह है कि पूरे उत्तर भारत में इन दिनों प्रदूषण बढ़ता है, जिसकी वजह किसान नहीं, बल्कि फैक्ट्रियाँ, उद्योग, बढ़ते वाहन और सर्दियों में लोगों द्वारा तापने और खाना बनाने के लिए जलायी जाने वाली आग होती है। इस ओर भी सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार का ध्यान इस बार खींचा था। दिल्ली में हर साल सम-विषम (ऑड-ईवन) लागू करने का काम दिल्ली सरकार करती रही है, जिससे प्रदूषण का स्तर कम हो जाता है। लेकिन इस बार इसे लागू नहीं किया गया। इसकी जगह दिल्ली सरकार ने पानी का छिडक़ाव दीपावली के बाद कराया। इसके अलावा हर चौराहे पर कुछ लोगों को खड़ा करके, उनके हाथों में कुछ बोर्ड थमाये हैं, जिन पर लिखा है- ‘रेड लाइट ऑन, गाड़ी ऑफ’, ‘युद्ध, प्रदूषण के विरुद्ध’। इस तरह के बैनर लिये दिल्ली के हर चौराहे पर दो-तीन युवा आजकल खड़े दिखायी दे रहे हैं। इसके अलावा दिल्ली सरकार ने सीएनजी बसों को डीटीसी बेड़े में ठेके पर शामिल करके प्रदूषण रोकने की कोशिश इस बार की है। इससे कुछ युवाओं को रोज़गार भले ही दिल्ली सरकार से मिल गया है; लेकिन प्रदूषण रोकने के लिए ये उपाय नाकाफ़ी हैं। दिल्ली जैसे शहर में प्रदूषण रोकने के लिए निर्माण और पेट्रोल-डीजल के वाहनों पर रोक, फैक्ट्रियों के चलने पर रोक लगानी ही पड़ेगी। इससे ज़्यादा ज़रूरी चीन में निर्मित पटाखों पर रोक लगानी होगी। क्योंकि इन पटाखों से बहुत ख़तरनाक प्रदूषण वातावरण में फैलता है, जो जल्दी ख़त्म नहीं होता। सर्दियों में प्रदूषण इसलिए भी बढ़ जाता है, क्योंकि हवा में आर्द्रता बढऩे से कार्बन और जहरीली गैसें पिघल नहीं पातीं और पृथ्वी की सतह पर ही ये सब तैरते रहते हैं। हालाँकि दिसंबर के पहले सप्ताह में दिल्ली-एनसीआर में बारिश होने के चलते प्रदूषण कम हुआ है। लेकिन प्रदूषण का वर्तमान स्तर भी कम घातक नहीं है।